facebookmetapixel
Advertisement
महंगा कच्चा माल… फिर भी रिकॉर्ड कमाई! आखिर कंपनियां कर क्या रही हैं?Gold, Silver Price Today: सोना ₹757 चढ़ा, चांदी ₹2266 चमकी; क्रूड की नरमी ने दिया सपोर्टएक के बाद एक संकट झेलने वाली Gopal Snacks की वापसी? ब्रोकरेज को दिखी 64% तेजीजुलाई में IPO की बरसात, ₹9,275 करोड़ का Manipal Health इश्यू आखिरी बड़ा दांवGIFT City में पड़े लावारिस पैसों के लिए बनेगा खास फंड, जानिए किसे मिलेगा पैसाTCS-Infosys से Wipro तक… 5 दिग्गज IT कंपनियों की रिपोर्ट ने बढ़ाई निवेशकों की चिंताIndiGo का राजस्व 19% बढ़ा, फिर भी ₹240 करोड़ का नुकसान क्यों हुआ?विदेशी निवेशक लौटे तो इन शेयरों में आ सकती है बड़ी तेजी, PGIM की रिपोर्टशेयर बाजार के नियमों में होगा बड़ा बदलाव, संसदीय समिति ने SMC Bill पर लगाई मुहरAI के दौर में बदला IT बिजनेस! Mphasis ने अपनाया ऐसा मॉडल, ग्राहकों को भी आ रहा पसंद

AMC एक, कुल खर्च अनुपात एक; फंडों के लिए खर्च के नए स्ट्रक्चर पर विचार

Advertisement
Last Updated- March 30, 2023 | 8:48 PM IST
SEBI

बाजार नियामक सेबी कुल खर्च अनुपात (TER) का नया स्लैब शुरू करने के लिए म्युचुअल फंडों से बातचीत कर रहा है, जिसका जुड़ाव कुल इक्विटी व डेट परिसंपत्तियों से होगा। यह मौजूदा स्लैब की जगह लेगा, जो किसी वैयक्तिक योजना की परिसंपत्ति से जुड़ा होता है। इस कदम से छोटी AMC के मुकाबले बड़ी AMC के लिए कम कुल खर्च अनुपात की सीमा तय हो जाएगी।

परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियां (AMC) किसी योजना के प्रबंधन के खर्च के तौर पर कुल खर्च अनुपात वसूलती है।

अगर नया मॉडल लागू होता है तो फंड हाउस को योजना की श्रेणी के आधार पर कुल खर्च अनुपात वसूलना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि किसी खास श्रेणी में आने वाली सभी योजनाएं (इक्विटी या डेट) के लिए एकसमान कुल खर्च अनुपात होगा। अभी सभी योनजाओं का कुल खर्च अनुपात उनके आकार के आधार पर अलग-अलग है। मौजूदा ढांचे के तहत किसी योजना की प्रबंधनाधीन परिसंपतियां जितनी कम होती हैं, कुल खर्च अनुपात की सीमा उतनी ही ऊंची होती है।

म्युचुअल फंड के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्टि की है कि सेबी ने एएमसी के साथ इस मामले पर चर्चा की है।

बुधवार को सेबी की बोर्ड बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच ने मौजूदा ढांचे के साथ दो समस्याओं का जिक्र किया था। पहला, यह AMC को योजनाओं के विखंडन की खातिर प्रोत्साहन देता है। दूसरा, इससे गलत जानकारी देकर योजनाओं की बिक्री को बढ़ावा मिलता है।

सेबी को शायद पता लगा है कि म्युचुअल फंड वितरक निवेशकों की रकम मौजूदा योजनाओं से निकालकर एनएफओ में डाल देते हैं ताकि ज्यादा कमीशन हासिल हो, जो निवेशकों के हितों के लिए हानिकारक है। नई योजनाओं का कुल खर्च अनुपात उनके छोटे आकार के कारण ज्यादा होता है, ऐसे में यह वितरकों को ज्यादा कमाई कराने में सक्षम है।

परिसंपत्ति से जुड़ाव वाले कुल खर्च अनुपात ढांचे का मामला बनाते हुए बुच ने कहा कि AMC मितव्ययिता का लाभ उठाते हैं और यह परिसंपत्ति वर्ग से जुड़ा हुआ है, न कि किसी योजना से।

उन्होंने कहा, मितव्ययिता का मामला किसी योजना से नहीं जुड़ा होता है बल्कि इसका जुड़ाव परिसंपत्ति वर्ग से होता है। परिसंपत्ति का आकार हालांकि बढ़ता है, लेकिन लागत काफी ज्यादा नहीं बढ़ती।

सेबी चाहता है कि कुल खर्च अनुपात में सबकुछ शामिल हो, ऐसे में वह फंड प्रबंधन शुल्क पर जीएसटी और ब्रोकरेज की लागत कुल खर्च अनुपात में शामिल करने पर विचार कर रहा है। बुच ने कहा, जब हम कुल खर्च अनुपात की बात करते हैं तो यह बिना किंतु परंतु के कुल खर्च होना चाहिए।

फंड हाउस को कुल खर्च अनुपात के ऊपर फंड प्रबंधन शुल्क पर 18 फीसदी जीएसटी वसूलने की इजाजत दी गई है। प्रतिभूतियों की खरीद व बिक्री पर पड़ने वाली लागत भी कुल खर्च अनुपात के बाहर वसूले जाते हैं। सेबी को लगता है कि ब्रोकरेज को कुल खर्च अनुपात से बाहर रखना दो मोर्चे पर परेशानी भरा है। पहला, यूनिटधारकों से दोहरी वसूली। अगर आप परिसंपत्ति प्रबंधन के लिए परिसंपत्ति प्रबंधन शुल्क वसूलते हैं तो फिर शोध के लिए आप ब्रोकर को बड़ी रकम का भुगतान क्यों करते हैं, जो आप खुद भी कर सकते हैं या आपसे करने की अपेक्षा की जाती है।

बुच ने कहा, हमें इस बात की संभावना लगती है कि ब्रोकरेज को प्रोफेशनल वजहों के बजाय अन्य वजहों से भुगतान किया जाता है। यह किसी के रेडार में नहीं आ रहा क्योंकि AMC का बोर्ड इस पर नजर नहीं डाल रहा। जब आप इसे कुल खर्च अनुपात में ले आएंगे तो AMC का बोर्ड स्वत: ही ब्रोकरों को होने वाले ऐसे भुगतान पर स्पष्टीकरण मांगेगा।

Advertisement
First Published - March 30, 2023 | 8:48 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement