एलएलपी अधिनियम, 2008 में प्रस्तावित संशोधनों के बाद वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) ट्रस्ट का ढांचा छोड़ सकते हैं। उम्मीद है कि वे लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) का रास्ता अपनाएंगे। इन बदलावों से अनुपालन आसान होगा, ढांचागत दिक्कतें दूर होंगी और भारत में अधिक विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
बजट के बाद एक कॉन्फ्रेंस में आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर ने संकेत दिया कि सरकार एलएलपी अधिनियम में संशोधन पर विचार कर रही है ताकि इसे एआईएफ के कामकाज की जरूरतों के साथ बेहतर ढंग से जोड़ा जा सके।
गज कैपिटल के मैनेजिंग पार्टनर और सह-संस्थापक तथा इंडियन वेंचर ऐंड अल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन (आईवीसीए) की नियामकीय मामलों की समिति के सह-अध्यक्ष गोपाल जैन ने कहा, ‘उद्योग लंबे समय से इसकी मांग कर रहा था। बजट के बाद की चर्चाओं में इसका जिक्र एआईएफ प्लेटफॉर्मों के लिए ढांचागत और परिचालन दिक्कतों को कम करने के स्पष्ट नीतिगत इरादे का संकेत है। एक मजबूत नियामकीय फ्रेमवर्क के दायरे में रहते हुए फंड स्ट्रक्चर में ज्यादा स्वायत्तता से व्यवसाय करने में आसानी होगी और वैश्विक पूंजी के लिए डेस्टिनेशन के तौर पर भारत की स्थिति मजबूत होगी।’
उद्योग के सूत्रों ने बताया कि लगभग 97 प्रतिशत एआईएफ अभी ट्रस्ट के तौर पर काम करते हैं, जिसका मुख्य कारण कम अनुपालन बोझ और इन्हें बनाने में आसानी है। बाजार कारोबारियों को उम्मीद है कि एलएलपी अधिनियम में बदलावों से भारतीय एआईएफ ढांचा वैश्विक मानकों के ज्यादा अनुकूल हो जाएगा।
एलएलपी ढांचे के तहत लिमिटेड पार्टनर (एलपी) आमतौर पर इंस्टीट्यूशनल और हाई-नेटवर्थ निवेशक होते हैं और उनकी लायबिलिटी सीमित होती है तथा वे रोजाना की प्रबंधन गतिविधि में हिस्सा नहीं लेते हैं। जनरल पार्टनर (जीपी) सक्रिय प्रबंधक के तौर पर काम करता है और फंड परिचालन के लिए जिम्मेदार होता है।
इसके अलावा, भारत में एलएलपी को ज्यादा कर-किफायती माना जाता है, जो एक नैचुरल पासथ्रू स्ट्रक्चर देते हैं जिसमें फर्म के शुद्ध लाभ पर कर लगता है, जबकि पार्टनरों को डिस्ट्रीब्यूशन पर कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं देना होता है। बाजार नियामक सेबी के आंकड़े से पता चलता है कि एआईएफ का निवेश सालाना आधार पर 27 प्रतिशत बढ़कर लगभग 6.45 लाख करोड़ रुपये हो गया।