दिल्ली की सीमाओं पर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के जारी विरोध प्रदर्शन के बीच नीति आयोग और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ओर से आयोजित 2030 में भारतीय कृषि पर राष्ट्रीय परिचर्चा में एक चर्चा पत्र प्रस्तुत किया गया। इस पत्र में कहा गया है कि ट्रेड एरिया में किसानों के उत्पाद की आपूर्ति से पहले उसी दिन नकद या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किसानों को भुगतान किया जाना चाहिए जिससे दोनों पक्ष के बीच विवाद की संभावना कम हो जाएगी और निपटारे के लिए उप खंड मजिस्टे्रट के पास जाने की नौबत भी नहीं आएगी। नए अधिनियम में विनियमित एपीएमसी के क्षेत्राधिकार से बाहर एक ट्रेड एरिया स्थापित करने की बात कही गई है।
पत्र में अधिनियम के मुताबिक स्थापित इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग की बेहतर निगरानी और विनियमन की मांग की गई है। इस कार्य को किसी एजेंसी या मध्यस्थ के माध्यम से संपादित किया जा सकता है जो किसानों या एग्रीगेटरों और खरीदारों के बीच सौदा करवा सकता है। इस पत्र को जेएनयू की प्रोफेसर सीमा बाथला और पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने लिखा है। इसमें कहा गया है कि एक ओर जहां तीन कृषि कानूनों के दीर्घगामी प्रभाव होंगे, राज्य सरकारों को अपने स्तर पर कृषि बाजारों में निजी क्षेत्र के प्रवेश के लिए एक खाका तैयार करने की जरूरत है और संबंधित अधिनियमों में निर्दिष्ट नियमों के तीव्र क्रियान्वयन पर जोर देने की जरूरत है। पत्र में यह भी कहा गया है कि एग्रीगेटरों, किसान-उत्पादक कंपनियों, स्वयं सहायता समूहों, सहकारियों और कृषि स्टार्टअप के लिए उपयुक्त संस्थागत व्यवस्थाएं करनी होंगी जिससे किसानों के सौदा लागतों में कमी आएगी और उन्हें ग्रेडिंग और मानकीकरण सुविधां मुहैया करानी होगी।
पत्र में कहा गया है, ‘इस तरह के हस्तक्षेपों के लिए उचित वित्तीय सहायोग देना होगा जैसे नाबार्ड एफपीसी को देता है। भंडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण (डब्ल्यूडीआरए) की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी।’ पत्र में कहा गया है कि चूंकि ट्रेड एरिया में होने वाला कारोबार पूरी तरह से नियमन से बाहर है जैसा कि अधिनियमों में कहा गया है, ऐसे में डब्ल्यूडीआरए के पास वेयरहाउसों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया जाना जरूरी है ताकि वेयरहाउसों में रखे निजी स्टॉकों की जानकारी सरकार को रहे।