दक्षिण दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में जब 35 साल के पवन पहाडिय़ा ने कोवैक्सीन टीके की खुराक के लिए अपना पंजीकरण कराया तब उन्हें यह नहीं लगा था कि अपनी पत्नी और भाई के बगैर ही अगले दिन टीकाकरण के लिए जाना पड़ेगा। वह कहते हैं, ‘मैं पिछले तीन दिनों से कोशिश कर रहा हूं। सौभाग्य से मुझे मेरे लिए एक स्लॉट मिल गया लेकिन मैं अपने परिवार के लिए बुकिंग नहीं कर पाया। मैंने अपनी पत्नी से वादा किया था कि हम एक साथ ही टीका लेंगे।’ पहाडिय़ा बताते हैं कि कैसे उनकी बेटी तब रोने लगी जब उसे पता चला कि वह उसकी मां के बगैर ही टीका लगवाने जा रहे हैं। वह कहते हैं, ‘मेरी बेटी महज 10 साल की है और वह अपनी मां के बारे में बहुत चिंतित है।’ कई लोगों की तरह ही वह भी राष्ट्रीय राजधानी में पर्याप्त टीके उपलब्ध कराने में सरकार की असमर्थता से निराश है।
फोर्टिस हॉस्पिटल के कर्मचारी भी स्वीकार करते हैं कि बीते सप्ताह के दौरान 250 खुराकों के दैनिक औसत से रोजाना टीकाकरण की संख्या में 30-40 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है हालांकि वे टीके की कमी पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं। शुक्रवार को दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कोविड टीकों की भारी कमी के बीच एक सप्ताह से भी कम समय में दूसरी बार केंद्र सरकार को आपात संदेश भेजा। उन्होंने कहा कि राजधानी में कोवैक्सीन स्टॉक लगभग खत्म हो गया जबकि कोविशील्ड का स्टॉक 18 से 44 साल के लोगों के लिए केवल दो या तीन दिनों के लिए चलेगा। पहाडिय़ा की तरह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) में बतौर इंजीनियर काम करने वाले संतोष सिंह एक हफ्ते से टीकाकरण के लिए पंजीकरण कराने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें स्लॉट मिलने में कोई कामयाबी नहीं मिली। सिंह ने कहा, ‘कई कोशिशों के बावजूद मैं पंजीकरण नहीं करा पाया हूं। मैं सभी विवरण भरता हूं लेकिन अंत में कुछ न कुछ गलती दिखती है और मैं कामयाब नहीं हो पा रहा हूं।’ दिल्ली में रह रहे पहाडिय़ा और सिंह जैसे हजारों लोगों को अपने और अपने परिवार वालों के लिए टीके के स्लॉट के लिए ऑनलाइन पंजीकरण कराने में समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
दिल्ली सरकार द्वारा संचालित इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर ऐंड बिलियरी साइंसेज (आईएलबीएस) में 45 साल से अधिक उम्र के लोगों और आवश्यक सेवाओं में कार्यरत लोगों को कोविशील्ड टीके लगाए जा रहे हैं और यहां सैकड़ों लोग एक शामियाने के नीचे बैठकर टीके के कूपन के लिए इंतजार कर रहे हैं। आईएलबीएस के चिकित्सा अधिकारी (कैजुअल्टी) चंदन गुप्ता कहते हैं, ‘हमने वॉक इन टीकाकरण बंद कर दिया है क्योंकि हमारे पास टीकों की कमी है। हम 1,000 टीके के अपने दैनिक औसत लक्ष्य से 30 फीसदी से अधिक पीछे हैं।’ राधिका देव और अरुण देव दोनों की उम्र 50-60 साल के बीच की है। दोनों सुबह 10 बजे टीकाकरण केंद्र पहुंचे लेकिन उन्हें अपराह्नï 2 बजे ही टीके लग पाए। उन्होंने कहा, ‘हमारी उम्र के लिहाज से इतने लंबे समय तक बैठना काफी थकाऊ है लेकिन कम से कम हमें टीका तो लग गया।’
अयान 23 साल के एक वास्तुकार हैं और उन्हें अपनी मां को टीका लगाने के लिए काम से एक दिन की छुट्टी लेनी पड़ी। वह खुश हैं और जब उनकी मां कहती हैं कि उन्हें टीका लग गया तो उन्हें और खुशी होती है। वह अपने और अपने भाई-बहनों के लिए टीके का पंजीकरण कराने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें सफ लता नहीं मिली है। वह कहते हैं, ‘मुझे उम्मीद है कि दिल्ली और केंद्र की सरकारें राजनीति में उलझाने के बजाय लोगों को बचाने के लिए एक साथ आएंगी।’
अस्पताल ने जब से वॉक इन टीकाकरण बंद कर दिया है तब से जो लोग बिना स्लॉट बुकिंग करके आते हैं उन्हें मायूसी के साथ लौटना पड़ता है। आईसीआईसीआई बैंक में नौकरी करने वाले जसविंदर कुमार और उनके सहकर्मी टीका लगवाने के लिए अपने कार्यालय से मेल मिलने के बाद बिना अपॉइंटमेंट के अस्पताल आ गए हैं। हालांकि उन्हें निराशा ही हाथ लगी जब गार्ड ने उन्हें बताया कि उन्हें पहले कोविन ऐप के जरिये स्लॉट बुक करना होगा तब उन्हें काफी निराशा हुई। कुमार कहते हैं, ‘हमें लोगों के ही संपर्क में रहना पड़ता है तब भी हम टीका नहीं लगवा पा रहे हैं।’
अस्पताल 24 घंटे चलते हैं और पहले जो लोग अपना पंजीकरण कराते थे उन्हें टीके लग जाते थे लेकिन अब टीके की आपूर्ति की कमी के कारण ऐसा करना मुश्किल हो गया है। इसके चलते अस्पताल में सिक्योरिटी सुपरवाइजर की नौकरी कर रहे बी एन झा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। झा कहते हैं, ‘जब मेरे स्टाफ उनसे कहते हैं कि टीके नहीं बचे हैं तो लोग नाराज हो जाते हैं। लेकिन हम क्या कर सकते हैं? अगर अस्पताल में टीके नहीं हैं तो मैं उन्हें वैक्सीन कूपन कैसे दे सकता हूं?’ वह लोगों से यह बात समझने का अनुरोध भी करते हैं कि इस वक्त टीके की कमी है। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा संचालित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में हालात थोड़े बेहतर हैं और यहां 45 साल और इससे अधिक उम्र के लोगों को टीके लगाए जा रहे हैं। जिन लोगों के साथ बिज़नेस स्टैंडर्ड संवाददाता की बातचीत एम्स के प्रतीक्षा कक्ष में हुई उन्होंने कहा कि उन्हें पंजीकरण कराने में कोई दिक्कत नहीं आई है। टीकों की कमी के बीच केंद्र ने कोविशील्ड की दो खुराक के बीच का अंतर बढ़ाकर 12-16 हफ्ते कर दिया है। पहले यह छह से आठ सप्ताह का होता था।
ब्रिटेन ने पहले ही ऐसा किया था जब कोविशील्ड टीके के क्लीनिकल साक्ष्यों में पाया गया था कि इसके टीके ने 12 हफ्ते के अंतर पर बेहतर प्रभाव दिखाया है। ऐसे में उम्मीद है कि इस व्यापक अंतर से भी टीके की आपूर्ति की कमी को पूरा करने का एक विकल्प मिलेगा। लेकिन दिल्ली के निवासियों को लगता है कि यह उनकी चिंताओं का समाधान नहीं है। उनकी इच्छा है कि केंद्र और राज्य सरकारें हाथ मिलाकर इस समस्या को कम करने और दिल्ली को इस संकट से बचाने की दिशा में काम करें।