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आरक्षण के भंवर में फंसा महाराष्ट्र, ओबीसी संगठनों में नाराजगी

मराठा समुदाय के लोगों को कुनबी दर्जा देने के भाजपा नीत सरकार के फैसले ने बढ़ाई उलझन

Last Updated- September 11, 2025 | 10:43 PM IST
maratha reservation

हाल ही में दक्षिण मुंबई के प्रतिष्ठित आजाद मैदान में अनिश्चितकालीन हड़ताल करने वाले मनोज जरांगे पाटिल के प्रति नरम रुख अपनाते हुए महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने उनकी अधिकतर मांगें मान लीं।

जरांगे मांग कर रहे थे कि मराठा समुदाय को कुनबी के रूप में मान्यता दी जाए जो अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल एक कृषक जाति है। उन्होंने विशेष रूप से बंबई, सातारा और निजाम दौर के हैदराबाद गजट के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को लागू करने पर जोर दिया।

मराठवाड़ा शुष्क भूमि से घिरा क्षेत्र है जो 1948 में अपनी मुक्ति तक हैदराबाद के निजाम के शासन क्षेत्र में आता था। फडणवीस सरकार ने हैदराबाद गजट पर एक प्रस्ताव जारी किया और मराठवाड़ा में ग्रामस्तरीय समितियों के गठन की घोषणा की ताकि मराठा समुदाय के लोगों को कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी किए जा सकें। हालांकि उन्हें इस वंश से होने का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।

अ​धिकतक मांगें माने जाने के बाद जरांगे ने 5 दिन से चल रहा आंदोलन 2 सितंबर को खत्म कर दिया। लेकिन मामला यहीं शांत नहीं हुआ। अगले ही दिन महाराष्ट्र के मंत्री और जानेमाने ओबीसी नेता छगन भुजबल ने कैबिनेट की बैठक में शामिल नहीं होकर अपनी नाराजगी का इजहार कर दिया। सरकार ने आश्वस्त किया कि मराठों को आरक्षण दिए जाने से ओबीसी के लिए मौजूदा आरक्षण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई संगठनों ने आरक्षण के कोटे में अपनी हिस्सेदारी कम होने की आशंका पर चिंता जताई।

सरकार के प्रस्ताव जारी करने के फैसले ने महाराष्ट्र में भानुमती का पिटारा खोल दिया है। एक ओबीसी कार्यकर्ता ने कहा, ‘हैदराबाद गजट मराठों के बीच कुनबियों के लिए एक नया गूगल सर्च इंजन जैसा बन गया है।’

उन्होंने कहा कि गैर-कृषक एवं भूमिहीन जातियां चिंतित हो उठी हैं कि आरक्षण के लिए लाइन में लगे जमींदारों की भीड़ में उनकी जगह कहां बनेगी, उन्हें इसका कोई लाभ मिल भी पाएगा या नहीं। उदाहरण के लिए, जरांगे की मांगों पर राज्य सरकार की सहमति के बाद बंजारा समुदाय ने हैदराबाद गजट में रिकॉर्ड का हवाला देते हुए अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के तहत आरक्षण की मांग शुरू कर दी है।

इस बीच, मराठा आरक्षण के आंदोलनकारी ऐतिहासिक प्रमाण का हवाला देते हुए अपने रुख पर कायम हैं। वकील श्रीरंग लाले ने कहा, ‘मराठा और कुनबी अलग नहीं हैं। शिंदे समिति ने पहले ही सरकार को 58 लाख कुनबी रिकॉर्ड सौंप दिए हैं। ये सभी सरकारी रिकॉर्ड और ऐतिहासिक प्रमाण हैं जिन पर विवाद नहीं किया जा सकता है। अब यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सरकारी रिकॉर्ड को लागू करे।’ वह मराठों की आरक्षण से संबं​धित मांग का अध्ययन कर रहे हैं, जिसकी जड़ें 1980 के दशक की शुरुआत तक फैली हैं।

साल 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार ने मराठा समुदाय के कुनबी रिकॉर्ड की जांच के लिए न्यायमूर्ति संदीप शिंदे की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मराठों के ओबीसी के रूप में वर्गीकृत होने पर जोर देने के पीछे 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित शर्तें हैं। न्यायालय ने आरक्षण पर एक सीमा निर्धारित की थी और कहा था कि अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और पिछड़े वर्गों के लिए कोटा 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता।

राज्य सरकारों द्वारा इस सीमा को तोड़ने के प्रयास शायद ही कभी सफल हुए हैं। साल 2023 में बिहार सरकार ने राज्य में आरक्षण बढ़ाकर 65 फीसदी कर दिया था, मगर पटना उच्च न्यायालय ने इस फैसले को रद्द कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

पुणे के द यूनिक फाउंडेशन के रिसर्च फेलो चंपत बोड्डेवार ने कहा, ‘मराठा और कुनबी जैसी कृषक जातियों को अलग से 16 फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए। भले ही इससे अधिकतम 50 फीसदी आरक्षण की निर्धारित सीमा का उल्लंघन होता हो, लेकिन केंद्र सरकार को इसके लिए संविधान में संशोधन जैसे उपाय करने चाहिए। तमिलनाडु मामले की तरह ही इस अधिनियमित कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची के तहत रखा जाना चाहिए।’ 9वीं अनुसूची में डाले गए कानूनों को कुछ शर्तों की वजह से न्यायिक जांच से छूट मिली हुई है।

बोड्डेवार ने कहा कि अदालतों को यह समझना होगा कि कुछ समुदायों के पिछड़ेपन को खास तौर पर उदारीकरण के बाद लाए गए बदलावों के मद्देनजर निर्धारित करते समय अतिरिक्त मापदंडों पर विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मराठा और जाट जैसे कास्तकार समुदायों में लाखों लोग हैं, जो गंभीर आ​र्थिक संकट से जूझ रहे हैं।

महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भाऊसाहेब आजबे के अनुसार, जाति आधारित आंदोलन मुख्य रूप से आरक्षण पर ध्यान केंद्रित करते हैं। मगर उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य में किसानों की एकछत्र पहचान बनाई जानी चाहिए ताकि ग्रामीण संकट जैसे ढांचागत मुद्दों को हल किया जा सके।

आजबे ने कहा, ‘भाजपा जानबूझकर ओबीसी और मराठों के बीच दरार पैदा कर ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति कर रही है। इससे महाराष्ट्र में सामाजिक एकजुटता तहस-नहस हो रही है।’ सांस्कृतिक तौर पर वर्चस्व रखने वाला मराठा समुदाय महाराष्ट्र की कुल आबादी का लगभग 28 फीसदी है। मगर वह दशकों से आरक्षण की मांग कर रहा है और उसकी समस्याओं के समाधान के तमाम प्रयास विफल रहे हैं। दिग्गज मराठा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने लगभग डेढ़ दशक पहले केंद्रीय भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उपक्रम मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान एक ऐसा प्रस्ताव रखा था जिससे सभी की भौंहें तन गई थीं।

देशमुख ने एक जनसभा में कहा था, ‘अगर लाभ देने के लिए आ​र्थिक मानदंड पर विचार किया जाए तो लोग अपनी जाति पर जोर नहीं देंगे। आज हर कोई सोचता है कि उसे अपनी जातिगत पहचान से किस तरह लाभ मिल सकता है। इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर सहमति बनानी होगी ताकि भविष्य में कोई टकराव न हो।’

First Published - September 11, 2025 | 10:36 PM IST

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