facebookmetapixel
कंपस इंडिया अब ट्रैवल रिटेल में तलाश रही मौके, GCC पर बरकरार रहेगा फोकसलैब में तैयार हीरे की बढ़ रही चमक, टाइटन की एंट्री और बढ़ती फंडिंग से सेक्टर को मिला बड़ा बूस्टMCA ने कंपनी निदेशकों के KYC नियमों में दी बड़ी राहत, अब हर साल नहीं बल्कि 3 साल में एक बार करना होगा अपडेटहाइपरसर्विस के असर से ओला इलेक्ट्रिक की मांग और बाजार हिस्सेदारी में तेजी, दिसंबर में 9,020 स्कूटरों का हुआ रजिस्ट्रेशनदिसंबर 2025 में इलेक्ट्रिक दोपहिया बाजार में उछाल, TVS टॉप पर; बजाज–एथर के बीच मुकाबला तेजव्हीकल रजिस्ट्रेशन में नया रिकॉर्ड: 2025 में 2.8 करोड़ के पार बिक्री, EVs और SUV की दमदार रफ्तारEditorial: गिग कर्मियों की हड़ताल ने क्यों क्विक कॉमर्स के बिजनेस मॉडल पर खड़े किए बड़े सवालभारत का झींगा उद्योग ट्रंप शुल्क की चुनौती को बेअसर करने को तैयारभारत में राज्यों के बीच निवेश की खाई के पीछे सिर्फ गरीबी नहीं, इससे कहीं गहरे कारणमनरेगा की जगह आए ‘वीबी-जी राम जी’ पर सियासी घमासान, 2026 में भी जारी रहने के आसार

MP: मध्य प्रदेश की राजनीति में सिंधिया का घटता कद !

2020 के शुरुआती महीनों में सिंधिया और उनके समर्थकों के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने के बाद से ही वहां गुटबाजी चरम पर है।

Last Updated- August 24, 2023 | 5:42 PM IST
Jyotiraditya Scindia

अपने वफादार विधायकों के साथ कांग्रेस से भाजपा में आने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा के भीतर भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं कांग्रेस 2020 के झटके की भरपाई 2023 में करना चाहती है। संदीप कुमार

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा नरेंद्र सिंह तोमर को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रबंधन समिति का समन्वयक बनाए जाने को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है जो चुनाव के पहले अपने लिए बड़ी भूमिका तलाश कर रहे थे।

ग्वालियर-चंबल इलाके में भाजपा पहले ही गुटबाजी से जूझ रही है। 2020 के शुरुआती महीनों में सिंधिया और उनके समर्थकों के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने के बाद से ही वहां गुटबाजी चरम पर है।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर कहते हैं, ‘इसमें दो राय नहीं कि चंबल के स्थानीय भाजपा नेताओं को सिंधिया का पार्टी में आना रास नहीं आया है। अगर स्थानीय नेता ही उन्हें स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें पूरे राज्य की जिम्मेदारी किस आधार पर दी जा सकती है?’

वह कहते हैं, ‘सिंधिया को बड़ी भूमिका देने की मांग उनके समर्थकों ने छेड़ी थी। तथ्य तो यह है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आते समय सिंधिया ने जो कुछ मांगा था वह उनको मिल चुका है। उनके समर्थकों को मंत्री बनाया गया, विधानसभा चुनाव में टिकट दिए गए और चुनाव हारने वालों को निगम-बोर्डों में जगह दी गई। आप एक ही चीज के लिए दो बार सौदेबाजी नहीं कर सकते। अब उनकी हैसियत पार्टी के किसी अन्य नेता की तरह ही है। जब पार्टी ने नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय, फग्गन सिंह कुलस्ते या विरेंद्र कुमार खटीक को मध्य प्रदेश चुनावों में कोई बड़ी भूमिका नहीं दी तो सिंधिया के लिए इसकी उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही होगा।’

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के एक भाजपा नेता कहते हैं कि तोमर में जहां सांगठनिक कौशल है जो उन्हें इस भूमिका के लिए फिट बनाता है तो वहीं उन्हें भाजपा के दिग्गजों और सिंधिया समर्थकों के बीच तालमेल का अहम काम भी करना होगा।

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक राकेश दीक्षित कहते हैं, ‘सिंधिया और तोमर के बीच कोई विवाद नहीं होना चाहिए। दोनों ग्वालियर-चंबल इलाके से आते हैं लेकिन तोमर का प्रभाव ग्वालियर के उत्तर में भिंड-मुरैना में अधिक है जबकि सिंधिया का प्रभाव ग्वालियर के दक्षिण में गुना-शिवपुरी जिलों में है। तोमर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी करीबी माने जाते हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ भी उनके करीबी रिश्ते हैं। वह अतीत में सफल चुनाव प्रबंधन कर चुके हैं।’

वह कहते हैं, ‘तोमर हों या नहीं लेकिन सिंधिया का प्रभाव कम होना तय है। चूंकि चुनाव प्रक्रिया में उन्हें अहमियत नहीं मिल रही है इसलिए उनके लिए अपने समर्थकों को टिकट दिलवाना भी मुश्किल होगा। हम सभी जानते हैं कि इन बातों का उल्लेख उस सौदेबाजी में नहीं था जो उन्होंने विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ते और भाजपा में शामिल होते समय रखी थी। इसका अर्थ यह हुआ कि भाजपा नेतृत्व टिकट वितरण अपनी मर्जी से करेगा। सिंधिया अब पार्टी के खिलाफ नहीं जा सकते हैं।’

सिंधिया के करीबी माने जाने वाले एक भाजपा नेता गोपनीयता की शर्त पर कहते हैं, ‘तोमर के अनुभव और चुनावी विशेषज्ञता का कोई जवाब नहीं। सिंधिया भी ताजा घटनाक्रम से खुश ही हैं क्योंकि आखिर मकसद तो चुनाव जीतना ही है। बहरहाल भाजपा में आपके पास बहुत विकल्प नहीं रहते। शीर्ष नेतृत्व जो कह देता है वही करना होता है। अमित शाह हालिया भोपाल यात्रा में कह गए हैं कि हमें किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है। ऐसे में टिकट वितरण में भी जीतने की क्षमता ही देखी जाएगी न कि यह कि आप भाजपा नेता हैं या कांग्रेस से आए हैं।’

ग्वालियर और चंबल के आठ जिलों में 34 विधानसभा सीट हैं। 2018 में कांग्रेस ने इनमें से 26 जीती थीं जबकि भाजपा को सात और एक सीट बसपा को मिली थी। उस समय सिंधिया कांग्रेस में थे।

अब हालात बदल गए हैं। इस क्षेत्र में 20 फीसदी आबादी दलित है और कांग्रेस उसे अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है।

कमलनाथ की सरकार गिरने के बाद हुए विधानसभा चुनाव में 28 में से भाजपा को 19 और कांग्रेस को नौ सीटों पर जीत मिली थी। विश्लेषकों का मानना है कि सिंधिया के न होने से कांग्रेस पर टिकट वितरण में भी कोई दबाव नहीं होगा।

प्रियंका गांधी ने अपनी हालिया ग्वालियर यात्रा में पहली बार रानी लक्ष्मीबाई की समाधि के दर्शन किए। इसे इस बात का संकेत माना जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस सिंधिया की गद्दारी को भी चुनावी मुद्दा बनाएगी।

First Published - July 30, 2023 | 11:09 PM IST

संबंधित पोस्ट