पांच समृद्ध राज्यों में 40 फीसदी संगठित रोजगार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 2:05 PM IST

महामारी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में जो वृद्धि हो रही है वो अंग्रेजी वर्णमाला के ‘के’ आकृति जैसी लग रही है। इसका अर्थ है कि देश के सबसे धनी राज्यों में तेज वृद्धि नजर आ रही है लेकिन गरीब राज्य सुस्त अर्थव्यवस्था में फंसे हुए हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने इस बात का जायजा लिया है कि कैसे ‘के’ आकृति का सुधार राज्यों के बीच असमानता बढ़ा रहा है।  
दिसंबर 2020 में अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक आर्थिक सुधार की आकृति पर बहस की जिनमें अंग्रेजी वर्णमाला के शब्दों- जेड, वी, यू, डब्ल्यू या एल- की आकृति वाले सुधार की बात शामिल थी लेकिन जेपी मॉर्गन ने के-आकृति वाले सुधार की एक नई अवधारणा की पेशकश की। इस निवेश बैंक ने अमेरिका में बड़े और छोटे कारोबारों के बीच बढ़ते अंतर को दिखाने के लिए वर्णमाला के अक्षर की आकृति का इस्तेमाल किया।
उस वक्त से ही कोविड-19 महामारी ने अमीर और गरीब के बीच की खाई और बढ़ा दी है और इस अक्षर ने अर्थव्यवस्थाओं में विकास की विशेषताओं को दर्शाने के लिए एक बड़ा संकेत हासिल किया है। अब यह आकृति ही भारत की आर्थिक बहाली को दर्शाता है जो निस्संदेह रूप से जारी है और देश के सबसे अमीर राज्य और अमीर हो रहे हैं जबकि सबसे गरीब राज्य अब भी कम वृद्धि के दायरे में फंसे हुए हैं। यह रुझान नई संगठित नौकरियों में सबसे अधिक दिखाई देता है।
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के आंकड़ों के अनुसार,  वर्ष 2021-22 में भारत में संगठित क्षेत्र में जो 1.22 करोड़ नौकरियां जुड़ीं, उनमें से 40 प्रतिशत या 50 लाख नौकरियां पांच सबसे धनी राज्यों में थीं, जिनकी प्रति व्यक्ति आय सबसे अधिक है। इन राज्यों में दिल्ली, कर्नाटक, हरियाणा, तेलंगाना और गुजरात शामिल हैं। सबसे गरीब पांच राज्यों में ओडिशा, असम, झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार शामिल हैं जहां महज 10.6 लाख या 8.7 प्रतिशत रोजगार के मौके मिले।
महामारी से पहले की अवधि (2019-20) की तुलना में 2021-22 में शीर्ष पांच राज्यों की शुद्ध रोजगार वृद्धि 64 प्रतिशत रही जबकि निचले स्तर के पांच गरीब राज्यों में लगभग 1.5 गुना वृद्धि हुई। इससे कुल संगठित नौकरियों में शीर्ष पांच राज्यों की हिस्सेदारी वर्ष 2019-20 के 39.4 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2021-22 में 41.2 प्रतिशत हो गई। वहीं दूसरी तरफ निचले स्तर के पांच राज्यों की हिस्सेदारी संगठित नौकरियों के लिहाज से 9.4 प्रतिशत से घटकर 8.7 प्रतिशत रह गई।
नौकरी में कुल बढ़ोतरी, ईपीएफ डेटाबेस में जोड़े गए नए व्यक्तियों की संख्या में से इस अवधि के दौरान संगठित रोजगार से बाहर निकले लोगों की घटी संख्या दर्शाती है। अमीर राज्यों में हमेशा असंगठित रोजगार का एक बड़ा हिस्सा रहा है, लेकिन महामारी के बाद सबसे गरीब राज्यों में असंगठित रोजगार बढ़ गया है। उच्च स्तर के संगठित रोजगार अधिक आमदनी, खर्च और खपत के रूप में नजर आते हैं।
एक राज्य के लिए संगठित कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि अधिक संगठित रोजगार पैदा करती है। इसी वजह से अधिक संगठित रोजगार वाले राज्यों में संकट के दौरान उच्च वेतन वृद्धि और रोजगार की अधिक सुरक्षा देखी जा सकती है। अप्रत्याशित रूप से राज्यों की प्रति व्यक्ति आमदनी असंगठित नौकरियों के रुझान दर्शाती है।
भारत के पांच सबसे धनी राज्यों की प्रति व्यक्ति आय 1 अप्रैल, 2019 और 31 मार्च, 2022 के बीच तीन वित्त वर्षों के दौरान 8.2 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ी, लेकिन पांच सबसे गरीब राज्यों के लिए यह वृद्धि दर केवल 6.8 प्रतिशत रही। इसके साथ ही सबसे अमीर पांच राज्यों की प्रति व्यक्ति आमदनी पहले से ही सबसे गरीब पांच राज्यों की तुलना में 3.1 गुना अधिक थी जो अब 3.3 गुना अधिक है।
अमीर और गरीब राज्यों को उनके प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आधार पर स्थान दिया जाता है, जो सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य का विभाजन संख्या से करने पर निकलता है।
इस वित्त वर्ष में सबसे अमीर और सबसे गरीब लोगों के बीच बढ़ती असमानता का सिलसिला लगातार जारी है। वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही में, जुड़ी 47 लाख असंगठित नौकरियों में से 20 लाख या 42.5 प्रतिशत शीर्ष पांच राज्यों में थीं। इनमें से निचले पांच राज्यों की हिस्सेदारी और घटकर 8.4 फीसदी रह गई।

First Published : October 5, 2022 | 9:20 PM IST