तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) टैंकरों की वैश्विक कमी का असर भारत में गैस की आपूर्ति पर पड़ने लगा है। उद्योग जगत के अधिकारियों ने यह चेतावनी दी है।
भारत एलएनजी का चौथा सबसे बड़ा आयातक है। रूस से कूटनीतिक टकराव जारी रहने के कारण अंतरराष्ट्रीय खरीद बढ़ी है और यूरोप के देश जाड़े के पहले टैंकरों से आपूर्ति सुनिश्चित कर लेने की कवायद कर रहे हैं। वहीं परिवहन के लिए टैंकर की कमी होने के कारण भारत में एलएनजी का आयात घट रहा है।
मुंबई स्थित इस क्षेत्र के एक विशेषज्ञ ने कहा, ‘रूस और यूक्रेन के बीच टकराव शुरू होने के साथ ही रूस से जो गैस यूरोप को जाती थी, वह कम हो गई। यूरोप अब दूसरी जगहों से एलएनजी जुटाने की कवायद कर रहा है। इसी वजह से अचानक लिक्विट कार्गो वेसेल की मांग यूरोप की ओर से बढ़ गई है।’ विश्लेषक ने कहा कि यह संभावना है कि एलएनजी की ढुलाई करने वाले रूस के जहाज अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बाद काली सूची में आ गए हों और इसके कारण इन जहाजों की आपूर्ति कम हो सकती है।
हाजिर कारोबार के लिए उपलब्ध एलएनजी जहाजों की संख्या सीमित है। वैश्विक रूप से ज्यादातर एलएनजी बेड़े दीर्घावधि समझौतों से जुड़े होते हैं। परिणामस्वरूप हाजिर बाजार में इसकी अत्यधिक कमी है और अब इसमें और गिरावट आ गई है। शिपिंग कॉर्पोरेशन आफ इंडिया (एससीआई) के अपने बेड़े में गैस ढुलाई के लिए केवल एक जहाज है। एलएनजी की ज्यादातर जहाजों का परिचालन विदेशी जहाज कंपनियां करती हैं। हाजिर बाजार के लिए भारत के कारोबारी उनकी सेवाएं लेते हैं।
ओस्लो की निवेश बैंकिंग फर्म क्लार्कसंस सिक्योरिटीज ने हाल में कहा था कि एलएनजी कैरियरों की दरों में बढ़ोतरी हुई है और औसतन यह एक खेप के लिए 3,00,000 डॉलर से ज्यादा है। इस फर्म की शिपिंग एनर्जी और ऑफशोर एनर्जी में विशेषज्ञता है। वहीं अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने कहा है कि यूरोप में इस जाड़े के लिए गैस का भंडारण करीब करीब हो चुका है।
ऑल इंडिया लिक्विड बल्क इंपोर्टर्स ऐंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जयंत लापसिया ने कहा, ‘एलएनजी का बाजार कच्चे तेल के बाजार से भी ज्यादा उतार चढ़ाव वाला है। रूस नैटगैस का बड़ा निर्यातक है। रूस ने यूरोप को नैटगैस की आपूर्ति घटा दी है। इसलिए हाल के महीनों में गैस की कीमत करीब दोगुनी हो गई है। जंग की स्थिति के कारण जहाजों को जोखिम है और सैन्य कार्रवाई की वजह से वे हतोत्साहित हो रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि एलएनजी जहाजों की उपलब्धता कम हुई है और ढुलाई की दरें बढ़ी हैं।