Representative Image
चीनी उत्पादन के मामले में देश के अव्वल राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश का चीनी उद्योग कारोबार के दूसरे रास्ते तलाश रहा है। इसके लिए यहां की चीनी मिलें नवीकरणीय ऊर्जा और नए जमाने के अनुकूल ईंधन विकल्पों पर खास जोर दे रही हैं, जिनमें कंप्रेस्ड बायोगैस, एथनॉल, हाइड्रोजन और विमानन ईंधन तक काफी कुछ शामिल है। अब तो प्रदेश की चीनी मिलें एथनॉल मिश्रित पेट्रोल पर केंद्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना में हाथ बंटाने के लिए पेट्रोल बेचने की इजाजत भी मांग रही हैं।
पिछले कुछ समय से चीनी मिल मालिक प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से मिल परिसर में ही पेट्रोल पंप खोलकर एथनॉल मिला ई100 और ई20 पेट्रोल बेचने की अनुमति मांग रहे हैं। उनकी दलील है कि इससे प्रदूषण कम होगा, स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा मिलेगा और चीनी मिलों तथा आम उपभोक्ताओं को फायदा भी होगा। मिलें अभी तक एथनॉल को तेल मार्केटिंग कंपनियों तक बेचने के लिए मध्यस्थों का सहारा लेती हैं मगर पेट्रोल पंप चलाने की मंजूरी मिलने पर उन्हें मध्यस्थों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। सीधे एथनॉल मिला पेट्रोल बेचने पर उनका मार्जिन बढ़ेगा और नकदी भी आसानी से हाथ आ जाएगी। दूसरी ओर उपभोक्ताओं को एथनॉल मिला पेट्रोल अपने घर के पास ही मिल जाएगा और गांव-कस्बों में खेत से पेट्रोल की बिक्री तक का पूरा तंत्र तैयार हो जाएगा।
पर्यावरण के अनुकूल यानी हरित ऊर्जा के विकल्पों में कंप्रेस्ड बायोगैस काफी अहम है और उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को यह कमाई तथा कारोबार का बेहतरीन मौका दे रही है। जब चीनी बनाई जाती है तो गन्ने का रस इस्तेमाल करने के बाद तली में लुगदी बचती है, जिसे चीनी की मैली या प्रेस मड कहा जाता है। इसी तरह शीरा निकालने के बाद गाढ़े रंग का तरल या स्पेंट वाश बच जाता है। मिलों से ये दोनों और अन्य जैविक पदार्थ भारी मात्रा में निकलते हैं, जो जल प्रदूषण का बड़ा कारण बन सकते हैं। मगर इन्हें कंप्रेस्ड बायोगैस के संयंत्रों में कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो कमाई का नया स्रोत मिल सकता है। इनसे बायोगैस बनाई जाए तो मीथेन उत्सर्जन काफी कम हो सकता है और स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा मिल सकता है।
प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार केंद्र सरकार के साथ मिलकर कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्र लगाने पर कई तरह के प्रोत्साहन दे रही है। इनमें किफायती परिवहन के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प (सतत) योजना और तेल मार्केटिंग कंपनियों के द्वारा बायोगैस खरीद में मदद करने वाली नीतियां शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश का चीनी उद्योग पर्यावरण के अनुकूल विमानन ईंधन (सैफ) के उत्पादन में भी लगातार तरक्की कर रहा है। एथनॉल बना रहे चीनी कारखाने अल्कोहल-टु-जेट तकनीक इस्तेमाल कर विमानन ईंधन भी बना सकते हैं। कार्बन का कम उत्सर्जन करने वाली वैल्यू चेन की मांग पूरी दुनिया में बढ़ रही है और सैफ इसमें एकदम सटीक बैठता है। विमानन कंपनियां और नियामक विमानन ईंधन में सैफ के मिश्रण को अनिवार्य बना रहे हैं, इसलिए आगे चलकर इसकी मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी होना तय है, जिसका फायदा उठाने के लिए प्रदेश की चीनी मिलें अभी से तैयारी कर सकती हैं।
वास्तव में उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में काफी चुस्त है। सूत्रों के मुताबिक यह देश के उन चुनिंदा राज्यों में शुमार है, जहां पर्यावरण के अनुकूल विमानन ईंधन पर अलग से नीति बन रही है। इसके अलावा यह देश के चुनिंदा राज्यों में है, जो बायोमास से नवीकरणीय बिजली बनाने में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चीनी उत्पादन के दौरान मिलों में निकली गन्ने की खोई इसमें कच्चे माल का काम करती है और इलेक्ट्रोलिसिस के लिए वह हरित बिजली दे सकती है।
चीनी मिलें खुद को स्वतंत्र हाइड्रोजन केंद्र बनाने के लिए तैयारी कर रही हैं, जो ग्रामीण हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्लस्टर के तौर पर काम कर सकते हैं। इस हाइड्रोजन का इस्तेमाल बॉयलर चलाने में, वाहन ईंधन के तौर पर और कृषि क्षेत्रों में उर्वरक मिलाने के लिए किया जा सकता है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत वित्तीय सहायता के जरिये बायोमास से नवीकरणीय हाइड्रोजन के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाता है।
प्रदेश की चीनी मिलों का उत्पादन पिछले कुछ साल से काफी बढ़ा है। सितंबर 2025 में खत्म हुए चीनी सीजन 2024-25 के दौरान उत्तर प्रदेश में लगभग 29.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर गन्ना उगाया गया। गन्ने की औसत पैदावार तकरीबन 8.32 टन प्रति हेक्टेयर रही और कुल 24.94 करोड़ टन गन्ना प्रदेश में पैदा हुआ। चीनी मिलों ने इसमें से करीब 9.55 करोड़ टन गन्ने की पेराई की और 9.67 फीसदी औसत रिकवरी के साथ 92.5 लाख टन चीनी का उत्पादन किया। साथ ही भारी मात्रा में शीरा (बी-हेवी मोलासेस) भी तैयार हुआ।
आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 के चीनी सीजन के दौरान राज्य में 122 चीनी मिलें करीब 133 दिन तक चलती रहीं। इन मिलों से करीब 48.7 लाख टन शीरे और 180 करोड़ लीटर एथनॉल का उत्पादन हुआ। उद्योग ने वित्त वर्ष 2024-25 में उत्पादन के साथ लगभग 291.2 करोड़ यूनिट बिजली भी तैयार की और रोजाना लगभग 8.40 लाख टन गन्ने की पेराई की।
प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के साढ़े आठ साल के कार्यकाल में चीनी उद्योग ने जितना विकास और बदलाव किया है उतना उससे पहले की एक सदी में भी नहीं हुआ था। मार्च 2017 में प्रदेश में सरकार बदलने के बाद सबसे बड़ा बदलाव और सरकार की कामयाबी गन्ना बकाये के मामले में दिखी। पहले प्रदेश के गन्ना किसानों का तीन-तीन साल का बकाया मिलों के ऊपर रहता था मगर अब चीनी उद्योग उन्हें एकदम समय पर पूरा बकाया चुका रहा है। पिछले कुछ साल में हर साल गन्ना किसानों को 35,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान किया गया है और पुराना सारा बकाया निपटा दिया गया है।
गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में सबसे बड़ी बढ़ोतरी में से एक इस साल की गई। कुछ हफ्ते पहले ही योगी आदित्यनाथ सरकार ने सीजन 2025-26 के लिए गन्ने के एसएपी में 30 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की घोषणा की, जिससे इस नकदी फसल की जल्द पकने वाली किस्मों के लिए खरीद कीमत 400 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएगी। आम किस्मों के लिए एसएपी 390 रुपये होगा, जो पिछले सीजन में 360 रुपये क्विंटल था। पिछली बार गन्ने का एसएपी सीजन 2025-26 से ज्यादा सीजन 2021-22 में बढ़ाया गया था, जब आम किस्मों के लिए यह 315 रुपये से बढ़कर 340 रुपये हो गया था, जबकि जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए यह 350 रुपये प्रति क्विंटल था।
उत्तर प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2025 में गन्ने के राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) में 30 रुपये प्रति क्विंटल इजाफा कर दिया। पिछले कुछ साल के दौरान एसएपी में यह सबसे अधिक वृद्धि है और इसके कारण गन्ना सीजन 2025-26 में गन्ने की जल्दी तैयार होने वाली यानी अगैती किस्मों के लिए राज्य समर्थित मूल्य 400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाएगा। आम किस्मों के लिए एसएपी भी 390 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएगा, जो इससे पिछले सीजन में 360 रुपये था। इससे पहले 2021-22 में गन्ने की आम किस्मों का एसएपी 315 रुपये से बढ़ाकर 340 रुपये प्रति क्विंटल किया गया था और अगैती किस्मों के लिए यह 350 रुपये था।
सरकार का दावा है कि कीमत में 8 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी के कारण चालू पेराई सीजन में गन्ना किसानों को 3,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी। धान और गेहूं के साथ गन्ना भी उत्तर प्रदेश की बड़ी नकदी फसल है और राज्य में तकरीबन 45 लाख किसान परिवार सीधे इसकी खेती से जुड़े हैं।
उत्तर प्रदेश का चीनी उद्योग भी पिछले कुछ साल में काफी बदला है और केवल चीनी बनाने के बजाय उसने चीनी, एथनॉल, बिजली और जैव-उर्वरक एक साथ बनाने वाले कॉम्प्लेक्स की शक्ल ले ली है। पेट्रोल में 20 फीसदी एथनॉल मिश्रण का कार्यक्रम पूरा करने में इसमें अहम किरदार अदा किया है। प्रदेश के उद्योग ने तेल मार्केटिंग कंपनियों को पिछले वित्त वर्ष में करीब 1.80 अरब लीटर एथनॉल दिया, जिससे सालाना करीब 8,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बच गई।
उत्तर प्रदेश चीनी उद्योग ने हरित बिजली बनाने के लिए खोई का इस्तेमाल करके बड़े को-जेनरेशन परियोजनाएं भी शुरू की हैं, जिनकी स्थापित क्षमता 2000 मेगावाट से ज्यादा है। स्वच्छ विकास प्रक्रिया के तहत पंजीकृत ऐसी कई परियोजनाएं कार्बन क्रेडिट भी कमाती हैं और सालाना 300 करोड़ यूनिट हरित बिजली देती है।
चीनी उद्योग ने प्रदेश में 10 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दिया है, जिनमें किसानों के साथ ट्रांसपोर्टर, वेंडर, कुशल-अकुशल कामगार शामिल हैं। उद्योग के लोगों का कहना है कि यदि ऊर्जा और एथनॉल से जुड़ी उनकी मांगें पूरी कर दी जाती हैं तो प्रदेश में रोजगार कई गुना बढ़ सकता है।