कच्चे तेल की बढ़ती लागत से वृद्धि को जोखिम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:56 PM IST

भारत की अर्थव्यवस्था को वित्त वर्ष 2023 में तेल के झटके लग सकते हैं। रूस-यूक्रेन के बीच तनाव और आपूर्ति में व्यवधान के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत इस समय करीब 9 साल के उच्च स्तर के आसपास है।
वित्त वर्ष 22 के लिए हाल की आर्थिक समीक्षा में कच्चे तेल की कीमत 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल रहने के अनुमान के साथ आर्थिक वृद्धि 8 से 8.5 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया गया है। वित्त वर्ष 18 की आर्थिक समीक्षा में अनुमान लगाया गया था कि हर 10 डॉलर प्रति बैरल कच्चे तेल की कीमत वृद्धि पर तेल की बढ़ी कीमत आर्थिक वृद्धि 0.2 से 0.3 प्रतिशत अंक घटा देती है, इससे थोक महंगाई में करीब 1.7 प्रतिशत वृद्धि होती है और इससे चालू खाते का घाटा करीब 9 से 10 अरब डॉलर बढ़ जाता है। एचडीएफसी बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ ने कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमत की वजह से वित्त वर्ष 23 में चालू जीडीपी वृद्धि अनुमान घटाकर 8 से 8.2 प्रतिशत करने को बाध्य होना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा, ‘अनिश्चितता को देखते हुए हम हर स्थिति पर विचार कर रहे हैं। मुझे लगता है कि वित्त वर्ष 23 की दूसरी छमाही (अक्टूबर-मार्च) में तेल की समस्या नियंत्रण में होगी और यह तार्किक रूप से निचले स्तर पर होगा। अगर दूसरी छमाही में कच्चा तेल 82 से 85 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहता है तो जीडीपी वृद्धि का हमारा अनुमान वित्त वर्ष 23 के लिए 7.8 प्रतिशत आता है। दूसरी स्थिति में अगर यह 100 डॉलर प्रति बैरल रहता है तो वृद्धि अनुमान हम घटाकर 7.3 से 7.5 प्रतिशत के बीच रखेंगे। सबसे ज्यादा असर वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही पर होगा, जो दरअसर कुल मिलाकर जीडीपी वृद्धि के आंकड़े को नीचे ला रहा है, क्योंकि आधार का असर भी है। इसकी वजह से जीडीपी वृद्धि अनुमान उल्लेखनीय रूप से नीचे आएगा।’
जब तेल और जिंस की कीमतें बढ़ती हैं तो आर्थिक वृद्धि प्राथमिक व द्वितीयक दोनों चैनलों पर प्रभावित होती है। कंपनियों का इनपुट लागत बढऩे से मुनाफा कम होता है, जिसका सीधा असर जीडीपी वृद्धि पर पड़ता है क्योंकि इसकी गणना मूल्यवर्धन के आधार पर होती है। अगर कंपनियां कीमतों का बोझ अंतिम उपभोक्ता पर डालती हैं तो ग्राहकों की खर्च करने वाली आय कम होती है और इससे कुल मिलाकर उपभोक्ता मांग पर असर पड़ता है और इस तरह जीडीपी वृद्धि प्रभावित होती है। द्वितीयक चैनल में महंगाई बढऩे के साथ भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता है, जिसकी वजह से उधारी महंगी होगी और इसका असर खपत और निवेश दोनों पर पड़ेगा।  
क्रिसिल में अर्थशास्त्री डीके जोशी ने कहा कि कच्चे तेल की कीमत निश्चित रूप से आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक असर डालेगी। उन्होंने कहा, ‘सवाल यह है कि दाम कितना बढ़ता है और बढ़ी कीमत कितने समय तक बनी रहती है।’
 

First Published : March 3, 2022 | 11:45 PM IST