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आर्थिक मंदी से अब भी अछूता है कागज उद्योग

Last Updated- December 09, 2022 | 3:31 PM IST

भारत के लिखाई और छपाई वाले कागज (पेपर) उद्योग पर अभी तक आर्थिक मंदी का असर नहीं पड़ा है। कागज की कीमतों में मजबूती होने के बावजूद मांग में तेजी बनी हुई है।


हालांकि, उद्योग से जुड़े शीर्ष लोगों का मानना है कि जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) दर कम होने का मामूली प्रभाव कागज की मांग पर हो सकता है। इसके अलावा, चीन से सस्ते आयात के कारण कीमतों पर कुछ दबाव हो सकता है।

देश के सबसे बड़े कागज उत्पादक बीआईटीएल के प्रबंध निदेशक आर आर वढेरा ने कहा, ‘हम अपनी कागज मिलों के शत प्रतिशत क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं और हमारी मूल्य प्राप्तियां स्थिर रही हैं।

हालांकि, जीडीपी विकास कम होने से मांग पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके बावजूद कागज वर्ग की निश्चित श्रेणियों (जैसे कोटेड और फोटो कॉपी में प्रयुक्त हाने वाले कागज) में दहाई अंकों की विकास दर बरकरार रहेगी।’

घरेलू कागज उत्पादन क्षमता लगभग 80 लाख टन की है (न्यूजप्रिंट को छोड़ कर)। बीआईटीएल, जेके पेपर, वेस्ट कोस्ट, टीएनपीएल और इमामी अग्रणी कागज उत्पादक कंपनियां हैं।

जेके पेपर के प्रबंध निदेशक हर्ष पति सिंघानियां ने कहा, ‘मंदी का असर अभी तक कागज उद्योग पर नहीं वैसा देखा गया है जैसा कि स्टील, सीमेंट आदि क्षेत्रों पर हुआ है।

लेकिन, मैं नहीं मानता कि मंदी के प्रभाव से कागज उद्योग अछूता रहेगा। कागज की अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम होने से सस्ते आयात का खतरा है। अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतों में और अधिक गिरावट होती है तो घरेलू उत्पादकों को कीमतों में कटौती करनी पड़ेगी।’

कागज की मांग पिछले कई वर्षों से जीडीपी के साथ-साथ लगभग 8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। अब यह घट कर 6 से 7 प्रतिशत हो जाएगी। हालांकि, देश में प्रति व्यक्ति कागज की खपत मुश्किल से 8 किलोग्राम है। इस कम आधार के परिणामस्वरूप दीर्घावधि की मांग बरकरार रहेगी।

सिंघानियां ने कहा कि साल दर साल शिक्षा पर सरकार का जोर बढ़ ही रहा है।बीआईटीएल का भी अनुमान है कि सस्ते आयात के कारण कोटेड कागज की कीमतों पर कुछ दबाव रहेगा।

बढेरा ने कहा, ‘रुपये में मजबूती के साथ आयातित कोटेड कागज की कीमतों में नरमी आने का अनुमान है। चीन के पास कोटेड कागज का अच्छा खासा भंडार है और इसका आयात प्रमुखता से किया जाता है।

हालांकि, भले ही हमारी प्राप्तियां कम हो जाएं लेकिन मार्जिन पर दबाव नहीं बनेगा क्योंकि आयातित पल्प की कीमतें भी 30  प्रतिशत से अधिक घट कर लगभग 500 डॉलर प्रति टन हो गई हैं।’

First Published - December 29, 2008 | 10:12 PM IST

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