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अमेरिकी राजनेता के लिए अमेरिका के हित प्रथम

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  August 16, 2020

अमेरिका के राष्ट्रपति पद के दावेदार जो बाइडन ने उपराष्ट्रपति पद के लिए अपनी सहयोगी कमला हैरिस की उम्मीदवारी की घोषणा की तो इसे लेकर भारत में जो उत्साह पैदा हुआ उसे समझा जा सकता है। हैरिस ऐसी अमेरिकी नागरिक हैं जो आधी भारतीय और आधी जमैकन हैं। परंतु बड़ा सवाल यह है कि क्या वह भारतीय मूल के कारण अपने मातृदेश का पक्ष लेंगी या अमेरिकियों से भी ज्यादा अमेरिकी दिखने के चक्कर में उसके साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करेंगी। हम देखेंगे कि यह बहस बेमानी क्यों है।

जब भी मिश्रित जीन वाला कोई व्यक्ति विश्व स्तर पर इस स्तर पर नामचीन होता है, हम भारतीय तत्काल यह घोषणा कर देते हैं कि उसका बेहतर हिस्सा उसे भारत से मिला। खासतौर पर तब जबकि उसके माता-पिता में से दूसरा किसी छोटे देश से आता हो। हम पहले सुनीता विलियम्स के मामले मे ऐसा देख चुके हैं और अब कमला हैरिस को लेकर यही हो रहा है। अगर वह प्रवासी भारतीय है तो वह चाहे किसी भी पीढ़ी का हो, अगर वह ताकतवर, अमीर और प्रसिद्ध हो तो वह हमारा है।

मैं मोंटेक सिंह आहलूवालिया से माफी मांगता हूं क्योंकि उन्होंने इतनी शानदार पंक्ति कही थी जिसका बिना उनके नाम का इस्तेमाल किए प्रयोग नहीं किया जा सकता: उन्होंने कहा था कि क्रिकेट मैच में बल्लेबाज और गेंदबाज होते हैं लेकिन शतक बनने पर कुछ दर्शक मैदान में घुस आते हैं। हम भारतीय काफी हद तक वैसे ही हैं।

सन 1968 में जब हरगोविंद खुराना को चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला उस वक्त मैं पानीपत के सनातन धर्म हायर सेकंडरी स्कूल में कक्षा नौ में था। उस वक्तभी हमने तत्काल उन्हें अपना घोषित कर दिया। हमारे विज्ञान शिक्षक बेहद खुश होकर कक्षा में आए और कहा कि न केवल हरगोविंद उनके सहपाठी थे बल्कि वह उनसे अच्छे छात्र थे लेकिन पारिवारिक वजहों से अमेरिका नहीं जा सके। खुराना 1966 में ही अमेरिकी नागरिक बन चुके थे। हम भारतीयों का जीन दुनिया भर में फैला हुआ है जो कि बहुत अच्छी बात है लेकिन तब हम विदेशी बन जाते हैं। क्या ब्रिटेन ऋषि सुनक और प्रीति पटेल को पहले भारतीय मानेगा? या बॉबी जिंदल, निक्की हेली, निशा बिस्वाल, रिचर्ड वर्मा को अमेरिका पहले भारतीय मानेगा? इतना ही नहीं हमारे देश में ऐसे भी तमाम लोग होंगे जो लंदन के मेयर सादिक खान को पाकिस्तानी बताकर तंज करेंगे।

यह एक संकीर्ण राष्ट्रवादी सोच है कि विदेशी नागरिक बन चुका कोई व्यक्ति आपके प्रति झुकाव रखेगा और सारी पुरानी धार्मिक, जातीय, स्थानीय और राष्ट्रीय मान्यताओं को अपनाए रखेगा। उपमहाद्वीप का दूसरा परमाणु संपन्न देश भी ऐसा ही सोचता है। कई पाकिस्तानी और भारतीय सोचते हैं कि अमेरिकी नेता इलहान कमर चूंकि मुस्लिम हैं इसलिए वह चाहेंगी कि कश्मीर पाकिस्तान को मिले। या बराक ओबामा भी क्योंकि उनके नाम में हुसैन है। मोइन अली या मोंटी पानेसर को पाकिस्तानी या भारतीय बल्लेबाजों को आउट करने पर गद्दार कहकर पुकारा जाना भी इसी सिलसिले का हिस्सा है। हां, हम चाल्र्स शोभराज को जरूर फ्रांसीसी मानते हैं।

अमेरिकी हस्तियों के मामले में यह भारत समर्थक या विरोधी रुख अधिक मुखर है। केनेडी हमारे बेहतरीन दोस्त थे, निक्सन बेहद बुरे दुश्मन थे। बिल क्लिंटन के बारे में हमारी राय पर भी हम जल्दी वापस लौटेंगे।

सन 1980 के दशक के आखिर से लेकर सन 1990 के दशक के अंत तक जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में उतनी करीबी नहीं थी, न्यूयॉर्क के कांग्रेस प्रतिनिधि स्टीफन सोलार्ज भारत के साथ बेहतर रिश्तों के पैरोकार के रूप में सामने आए। उन्हें तत्काल भारत समर्थक घोषित कर दिया गया। कई लोगों के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्थानीय यहूदी मतदाताओं में उनका जनाधार था और भारतीय इजरायल को और इजरायल भारत को पसंद करता है। इसी तरह कई को पाकिस्तान समर्थक भी बताया गया। तब स्वर्गीय स्टीफन पी कोहेन ने हमें कुछ सबक दिए। उन्होंने कहा कि जब आप स्टीफन सोलार्ज को भारत समर्थक या किसी और को भारत विरोधी बताते हैं तो आप गलत हैं क्योंकि वे केवल अमेरिका समर्थक होते हैं। बस उनमें से किसी को लगता है कि भारत के साथ बेहतर रिश्ते अमेरिका के हित में हैं तो किसी और को पाकिस्तान के साथ रिश्तों में बेहतरी लगती है। कमला हैरिस पर भी यही बात लागू होती है। हम ऐसी खबरें भले प्रकाशित करें कि वह कितना अच्छा मसाला डोसा बनाती हैं या उन्हें इडली-सांभर कितना पसंद है, चेन्नई में मयलापुर और बेसेंट नगर उन्हें अपना बताने में उलझे रहें लेकिन यह सोचना बेवकूफी होगी कि भारत के बारे में उनके विचार उनके डीएनए से प्रभावित होंगे।

लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि जब तक नेता उस स्तर पर पहुंच जाते हैं जहां वे आपको प्रभावित कर सकें तो उनके बारे में इतना कुछ लिख और छाप दिया जाता है कि आप सब जान जाते हैं।

ऐसे में पत्रकारों को उनके किसी भारतीय रिश्तेदार के पास इस सवाल के साथ जाने की जरूरत नहीं कि भारत को लेकर हैरिस का रुख किस बात से तय होगा: उनके मूल स्थान से या मानवाधिकारों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता से? हैरिस ने उदार, मानवाधिकार के मुद्दों पर खूब लिखा और बोला है। वह कैलिफोर्निया की महान्यायवादी रही हैं और अपराधियों के साथ बहुत कड़ाई से पेश आईं जिनमें से कई अश्वेत थे।

एक बार हम मान लें कि हैरिस भी अन्य अमेरिकियों जैसी हैं तो हम बहस को आगे बढ़ा सकते हैं। बिल क्लिंटन की बात पर वापस लौटें कि वह भारत के लिए अच्छे अमेरिकी राष्ट्रपति थे या नहीं? इसका जवाब हां और ना दोनों है। बल्कि शीतयुद्ध के बाद के राष्ट्रपतियों की बात करें तो पहले कार्यकाल में वह सबसे बुरे और दूसरे में सबसे अच्छे साबित हुए। उनके पहले कार्यकाल के वक्त भारत राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा था। सन 1989 से 1991 के बीच नरसिंह राव हमारे चौथे प्रधानमंत्री बन चुके थे।

सन 1991 की गर्मियों में हम सोने का भंडार गिरवी रखने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पहुंच चुके थे। पंजाब में उपद्रव चरम पर था और कश्मीर में उछाल पर। दृढ़संकल्पित राव सरकार ने जमकर मुकाबला किया। पश्चिमी मानवाधिकार समुदाय ने इसका विरोध किया। क्लिंटन प्रशासन पहले कार्यकाल में इसमें उलझ गया और कश्मीर के भारत में विलय पर सवाल उठाए गए। उधर, परमाणु अप्रसार लॉबी की ओर से दबाव था कि भारत को बाहर रखा जाए। इससे यह धारणा बनी कि राव 1995 के जाड़ों में परमाणु परीक्षण करना चाहते थे लेकिन क्लिंटन ने उन्हें रोक दिया। ध्यान रहे सन 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया तब भी क्लिंटन ही राष्ट्रपति थे।

इसका दोनों देशों के रिश्ते पर असर पूरी तरह दस्तावेजीकृत है। खासकर जसवंत सिंह और स्ट्रोब टॉलबट जैसे अहम वार्ताकारों के इस पर किताब लिखने के कारण। भारत को धमकाने और रोकने से लेकर उसे जवाबदेह परमाणु हथियार संपन्न समूह में शामिल करने तक सब क्लिंटन के कार्यकाल में हुआ।

सन 1999 में उन्होंने करगिल के समय पाकिस्तान को सीमा में रहने की नसीहत दी। भारतीय उपमहाद्वीप आए लेकिन पाकिस्तान में बमुश्किल चंद मिनट रुके और उसे संदेश दिया कि अब इस क्षेत्र में खूनखराबा करके सीमाएं नहीं बदली जा सकतीं। उनके पहले कार्यकाल में ऐसा नहीं था। दोनों कार्यकालों में क्या बदलाव आया? क्या उन्हें बोधज्ञान मिला? भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक कद में ऐसा क्या बदलाव आया? राव-मनमोहन के सुधार 1991 में आरंभ हुए और भारत एक वैश्विक अवसर में बदल गया। क्लिंटन नहीं बदले, भारत बदल गया था। वह हमेशा अमेरिकी हित के साथ रहे।

भारत के लिए यही सबक है कि वैश्विक रूप से शक्तिशाली देशों में अपना कद और मान बढ़ाने के लिए उसे अर्थव्यवस्था, आंतरिक सुसंगतता और बाहरी सुरक्षा पर ध्यान देना होगा। हमारा देश बीते तीन वर्ष में इन तीनों मोर्चों पर पिछड़ गया है। मोदी सरकार के समर्थक इसका विरोध करेंगे लेकिन अर्थव्यवस्था में गिरावट की बात उन्हें भी माननी होगी। अगर बाइडन जीतते हैं तो अगली जनवरी में हमारी आर्थिक स्थिति से ही कमला हैरिस का नजरिया तय होगा न कि उनके जीन से।

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