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चिंतित करता आदेश

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 9:07 AM IST

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति जो बाइडन ने पद संभालने के बाद पहले सप्ताह में जिन महत्त्वपूर्ण कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए उनमें से एक ‘बाय अमेरिकन’ (अमेरिकी वस्तुएं खरीदें) उल्लेखनीय रहा क्योंकि उसका स्वर पिछले राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से मेल खाता है। इसने अमेरिकी कारोबारियों और उनके सहयोगियों के मन में भी भय पैदा किया है। कार्यकारी आदेश संघीय सरकार के सरकारी खरीद कार्यक्रम से जुड़े नियमों को कड़ा करना चाहते हैं। ये आदेश में अमेरिका में रोजगार तैयार करने तथा आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए संघीय एजेंसियों के विदेशी अनुबंधों को सीमित करना चाहते हैं। यह एक ताकतवर राजनीतिक संकेत है। हालांकि यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यह डॉनल्ड ट्रंप के ‘अमेरिका फस्र्ट’ (सबसे पहले अमेरिका)के नारे से किस प्रकार अलग है और क्या यह साझेदारों को दुनिया के सबसे बड़े सरकारी खरीद (सालाना 600 अरब डॉलर का) कार्यक्रमों से अलग कर देगा?
अमेरिका में सरकारी खरीद का संचालन आठ दशक पुराने बाय अमेरिकन ऐक्ट (बीएए) के माध्यम से होता है और इसके नियम संघीय खरीद नियमन (एफएआर) परिषद द्वारा तय किए जाते हैं। बाइडन के पद संभालने के एक दिन बाद एफएआर परिषद ने ट्रंप प्रशासन के अंतिम दिनों में पारित नियमों को अधिसूचित किया। इन नियमों के अंतर्गत संघीय सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले घरेलू उत्पादों में स्थानीय सामानों की हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 55 प्रतिशत किया गया जबकि इस्पात और लोहे में यह हिस्सेदारी 95 प्रतिशत कर दी गई। नियमों के जरिये बड़े कारोबारियों के लिए मूल्य प्राथमिकता को छह से बढ़ाकर 30 फीसदी और छोटे कारोबारियों के लिए 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है। बाइडन का कार्यकारी आदेश इन नियमों को अवैध नहीं करता बल्कि यह कहता है कि घटक तत्त्वों के आकलन की जगह जटिल माप किया जाएगा कि अमेरिकी उत्पादन या अमेरिकी रोजगार में सहायक आर्थिक गतिविधि से उक्त उत्पाद में क्या मूल्यवद्र्धन हो रहा है। हालांकि इस माप के बारे में विशिष्ट जानकारी अभी सामने आनी है लेकिन इसके लिए 25 जुलाई, 2025 की समय सीमा तय की गई है। कंपनियों को डर है कि बाइडन के कार्यकाल में न्यूनतम वेतन लगभग दोगुना हो जाने पर लागत बढ़ जाएगी।
स्थानीय उत्पाद संबंधी नियम में बदलाव शायद बड़े अनुबंधों को प्रभावित न करे: 182,000 डॉलर मूल्य के ऐसे सौदे विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए उपलब्ध हैं। खासकर जनरल प्रॉक्योरमेंट एजेंसी के तहत आने वाले 20 सदस्यों के लिए ये उपलब्ध हैं। यह एजेंसी विश्व व्यापार संगठन ढांचे के तहत एक बहुपक्षीय समझौते से बनी। भारत 2010 से इसमें पर्यवेक्षक के दर्जे में है जबकि चीन इसमें प्रवेश के लिए बातचीत कर रहा है। भारत के लिए अहम यह है कि एफएआर नियमों में सूचना प्रौद्योगिकी शामिल नहीं। लेकिन यह भी चुनौती साबित हो सकती है क्योंकि बाइडन के बाय अमेरिकन कार्यकारी आदेश से अपवाद और छूट को लेकर मानक ऊंचे हो गए हैं। नवनियुक्त मेड इन अमेरिका कार्यालय के निदेशक को विस्तृत ब्योरे देने होंगे कि आखिर क्यों कोई उत्पाद या सेवा अमेरिका में नहीं निर्मित हो सकती।
बाय अमेरिकन का आदेश मोदी सरकार के आत्मनिर्भर भारत जैसा ही संरक्षणवादी कदम है। दोनों देशों के राजनीतिक संकेत एक से हैं लेकिन भारत ने जहां स्वयं को अधिकांश बड़े व्यापारिक समझौतों से दूर रखा है और घरेलू उत्पादकों की मदद के लिए शुल्क दर बढ़ाई है, वहीं बाइडन सोच समझकर कदम उठा रहे हैं। उन्हें अभी भी ट्रंप के चीनी आयात पर बढ़ाए शुल्क को कम करना है। उन्होंने संकेत दिया है कि वह सहमति वाली शासन व्यवस्था रखेंगे। इसमें ओबामा के कार्यकाल के प्रशांत पार व्यापार समझौते में शामिल होने का इरादा भी है। ट्रंप ने इससे दूरी बना ली थी। देखना होगा कि भारत में विनिर्माण को आत्मनिर्भर भारत से जो मदद मिली क्या अमेरिका को बाय अमेरिकन उससे अधिक मदद पहुंचा सकेगा?

First Published : January 28, 2021 | 10:59 PM IST