पिछले सप्ताह की दो खबरों पर गौर करें। पहली यह कि घाटे में चल रही अक्षय ऊर्जा कंपनी सुजलॉन एनर्जी ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन से 4,200 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मांग की है। दूसरी खबर में जीवाश्म ईंधन वाली दिग्गज कंपनी बीपी ने आठ वर्षों में अपना उच्चतम मुनाफा दर्ज किया है। सुजलॉन के संकट और बीपी के अच्छे मुनाफे के बीच का अंतर काफी कुछ बयां कर रहा है।
सुजलॉन का घाटा बढऩे की असली वजह, परिचालन से जुड़ी दिक्कतों मसलन कच्चे माल की लागत बढऩे, परियोजनाओं की भरमार दिखने के साथ ही पवन ऊर्जा पर शुल्क का दबाव बढऩा है। जबकि बीपी को, यूक्रेन में भू-राजनीतिक संकट की वजह से तेल और गैस की कीमतों में आई तेजी का फायदा उठाने का मौका मिला है।
सुजलॉन ने पर्यावरण, समाज और संचालन (ईएसजी) में निवेश करने का शुरुआती रुझान दिखाया था। इसकी नाकामी ईएसजी निवेश से जुड़े जोखिमों को भी उजागर करती है। हालांकि इस निवेश की रफ्तार जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के बाद बढ़ी है।
इस विंड टर्बाइन निर्माता कंपनी का 6,640 करोड़ रुपये का कर्ज है और इसमें आईडीएफसी पीई, ओलिंपस और एशिया क्लाइमेट पार्टनर्स जैसी ब्लू-चिप निजी इक्विटी कंपनियों और यहां तक कि सन फार्मा के दिलीप सांघवी की दिलचस्पी भी थी। अमेरिका में इसकी सहायक कंपनी ने दिवालिया होने की अर्जी दी है और कंपनी ने सरकारी राहत पैकेज की मांग की है।
दुनिया भर में ईएसजी में निवेश को वैश्विक निवेश की निरंतरता के संदर्भ में देखा जा सकता है जिसमें 21वीं सदी के शुरुआती दौर के लेखा से जुड़ी धोखाधड़ी जैसे कि एनरॉन, वल्र्डकॉम, फ्रेडी मैक, एआईजी जैसे मामलों में तेजी आई। शीत युद्ध के दौर में साम्यवाद पर पूंजीवाद की जीत के लगभग एक दशक बाद हुए ये घोटाले स्वतंत्र उद्यमों के अनैतिक पक्ष की याद दिलाते हैं।
दावोस और अन्य वैश्विक वार्ता मंचों की चर्चा, पूंजीवाद को बचाने के तरीकों पर केंद्रित रही और इसके तहत ही उभरते बाजारों में ऐसे निवेश पर जोर देने की बात हुई जिसमें मुनाफा कमाने के साथ ही अच्छा काम भी किया जाए। मसलन गरीबी दूर करने जैसे अभियान के लिए ‘अनुकंपा या उदार पूंजी’ और ‘प्रभाव निवेश’ की धारणाएं उभरींं। इन अवधारणाओं के मुताबिक पूंजीवाद को केवल मुनाफे की ताकत नहीं बनना चाहिए, बल्कि बेहतर सामाजिक प्रभाव का एक स्रोत भी होना चाहिए।
बिल गेट्स इस अवधारणा के शुरुआती समर्थकों में थे। सामुदायिक विकास के मकसद से अनुकंपा वाली पूंजी की विशाल मात्रा वैश्विक बाजारों में आ गई जिससे गरीब देशों में स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे और शिक्षा पर केंद्रित प्रभाव डालने वाले निवेश फंड का दायरा बढ़ा।
नए युग के पूंजीपतियों ने प्रबंधन गुरु सी के प्रह्लाद से प्रमाणित सिद्धांत हासिल किया। उन्होंने, ‘दि फॉच्र्यूून एट दि बॉटम ऑफ द पिरामिड’ लिखा जिसमें गरीबों की मदद करने और मुनाफा कमाने के लिए तर्क दिया गया। कई केस स्टडी में ‘गरीबों की मदद करने’ वाला हिस्सा दरअसल ‘लाभ कमाने’ के हिस्से के बाद का विचार प्रतीत होता है।
हैरानी की बात यह है कि 2008 के वित्तीय संकट ने पुनर्विचार का मौका नहींं दिया जबकि यह संकट ही पिरामिड के निचले स्तर के ग्राहकों को ज्यादा आवास ऋण देने की वजह से पैदा हुआ था। इस संकट ने लेखा-जोखा और जवाबदेही से जुड़े पुराने जोखिम को फिर से जगजाहिर किया। यही बात सामुदायिक विकास या पर्यावरण के विकास में असर डालने वाले निवेश पर भी लागू हुई।
ये निवेश उन देशों में किए गए जहां कमजोर कानून या कानून की उपस्थिति न के बराबर थी और संस्थागत शासन तंत्र के साथ-साथ बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था। अब ऐसे हालात में यह कैसे निर्धारित किया जाए कि गरीबों का एक अस्पताल या एक बिजली संयंत्र उस उदार और अनुकंपा वाली पूंजी की सफलता का परिचायक था?
इसका जवाब स्पष्ट नहीं था और इसी वजह से विश्व स्तरीय फर्जीवाड़ा करने वाले अबराज कैपिटल के पाकिस्तानी संस्थापक आरिफ नकवी जैसे लोगों के लिए दरवाजे खुल गए। वैश्विक गरीबी को खत्म करने के लिए पहले पूंजी निवेश और मुनाफा बनाने की इस सम्मोहक कहानी ने बिल गेट्स, एडगर ब्रॉनफमैन, जॉन केरी, प्रिंस चाल्र्स, क्लॉज श्वाब, बैंक ऑफ अमेरिका, मैकिंजी, केपीएमजी, हैमिल्टन लेन, विश्व बैंक के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की सरकारों को भी बेवकूफ बनाया। अबराज ने भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, घाना, तुर्की और कई अन्य देशों की कल्याणकारी परियोजनाओं के लिए शीर्ष वैश्विक निवेशकों से पूंजी जुटाई और इसके लिए वैसी फर्जी कहानी बुनी गई जो दुनिया के अमीर निवेशक सुनने के लिए और निवेश के लिए भी तैयार थे।
हालांकि ऐसा नहीं है कि ईएसजी फंड का पूरा उद्गम ही फर्जी है। लेकिन तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन के एजेंडे के समर्थन से वास्तव में ईएसजी निवेश में तेजी आती है जो असरदार निवेश तो है लेकिन साथ ही इसमें सतर्कता का स्तर बढऩा चाहिए। पिछले साल मई में अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने एक ईएसजी-केंद्रित जोखिम वाली चेतावनी जारी की जो अपर्याप्त खुलासा, भ्रामक दावों और ईएसजी निवेश विश्लेषण की अपर्याप्त जानकारी के संकेत देती है।
यह एक समस्या है। दूसरी समस्या बदलने वाली राष्ट्रीय नीतियां हैं, विशेष रूप से उभरते बाजारों में जहां निवेश का अंदाजा लगाना मुश्किल है। उदाहरण के लिए, भारत में विनियमित ऊर्जा मूल्य निर्धारण की लंबे समय से दिख रही समस्याएं अक्षय ऊर्जा कारोबार में जटिलता की परतों को जोड़ती हैं। इसी तरह ज्यादा जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने वाली कंपनियां अक्षय ऊर्जा से मिलने वाली बिजली में मामूली निवेश या कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व वाली परियोजनाओं पर जोर देना चाहती हैं ताकि ईएसजी पूंजी हासिल की जा सके।