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चीन से दूरी का सिलसिला लगभग एक दशक से चले आ रहे चरणबद्ध धीमेपन के बाद चीन की वृद्धि में गिरावट की खबरें पिछले कुछ समय से सुर्खियों में रही हैं।

Last Updated- January 21, 2023 | 1:15 PM IST
China

चीन से दूरी का सिलसिला लगभग एक दशक से चले आ रहे चरणबद्ध धीमेपन के बाद चीन की वृद्धि में गिरावट की खबरें पिछले कुछ समय से सुर्खियों में रही हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि कई फैक्टरियां और आपूर्ति श्रृंखलाएं अब चीन पर निर्भरता समाप्त कर उससे दूरी बना रही हैं। परंतु विनिर्माण और व्यापार में चीन की चार दशक की सफलता इतनी गहन और व्यापक है कि दुनिया भर की कंपनियों के बोर्ड रूम में चल रही हवा के बावजूद ‘दुनिया की फैक्टरी’ होने का उसका दर्जा शायद ही प्रभावित हो। इसके साथ ही वह शीर्ष कारोबारी ताकत भी बना रहेगा। इसके बावजूद यह बात ध्यान देने लायक है कि कैसे औद्योगिक नीति ने नाटकीय वापसी की है जबकि विभिन्न देश कंपनियों को चीन से परे आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा में हैं।

जापान अपनी कंपनियों को भुगतान कर रहा है ताकि वे अपनी फैक्टरियां चीन से हटाकर क्षेत्र में अन्य कहीं या जापान में ही लगाएं। उसने पिछली गर्मियों में एक नया आर्थिक सुरक्षा कानून भी पेश किया जिसमें उन 14 क्षेत्रों को शामिल किया गया है जिन्हें सामाजिक बुनियादी ढांचे का हिस्सा माना जाता है। दक्षिण कोरिया और ताइवान में ऐसे कार्यक्रम हैं जो मुख्य रूप से चीन को निशाने पर रखकर बने हैं। यानी एशिया के तीन सबसे अधिक औद्योगिक देश अपनी कंपनियों को चीन से बाहर स्वदेश वापसी करने पर प्रोत्साहन दे रहे हैं। जापान ने इसके लिए 2.5 अरब डॉलर का बजट तय किया है। खबरों के मुताबिक हाल के वर्षों में करीब 250 जापानी कंपनियां चीन से चली गई हैं और यह सिलसिला लगातार जोर पकड़ रहा है। क्षेत्र के अन्य देशों में भी यही रुझान देखने को मिल रहा है। जापानी समाचार पत्र असाही शिंबुन के मुताबिक बीते वर्ष 135 कंपनियों ने चीन छोड़ दिया और अपने सेमीकंडक्टर, मोटर वाहन, उपकरण और वस्त्र निर्माण की अपनी फैक्टरियों को दूसरी जगह स्थापित किया। सोनी ने अपनी स्मार्ट फोन बनाने वाली कंपनी को आंशिक रूप से थाईलैंड स्थानांतरित किया है और 2021 में वहां विदेशी निवेश में जमकर इजाफा हुआ। इस निवेश में कुछ हिस्सा चीन की कंपनियों का भी है। दक्षिण कोरियाई कंपनियां न केवल अपने देश में वापस जा रही हैं बल्कि वे अन्य मित्र राष्ट्रों को भी ठिकाना बना रही हैं। सैमसंग ने वियतनाम का चयन किया है। गूगल भी अपने पिक्सेल फोन वहीं बना रही है। ऐपल की मैकबुक और आईफोन के अलावा नाइकी और एडिडास भी अपने उत्पाद वहीं बना रही हैं। चीन से 32 परियोजनाएं मलेशिया गई हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की घोषणा के बाद ह्युंडै ने भी अपना इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी संयंत्र अमेरिका के जॉर्जिया में लगाने की घोषणा की है। एल जी ने भी कहा है कि वह होंडा के साथ मिलकर ओहायो में एक बैटरी फैक्टरी लगाएगी।

चीन का आक्रामक व्यवहार भी उसके खिलाफ गया है। दो तरफा वीजा प्रतिबंध ने जापान और दक्षिण कोरिया दोनों को प्रभावित किया। कोरिया की लोट्‌टे रिटेल चेन, स्वीडन की एरिक्सन, ऑस्ट्रेलिया की वाइन निर्माता, ताइवान के अनानास उत्पादक और लिथुआनिया के तमाम लोग उनमें शामिल हैं जिन्हें चीन के क्रोध का ताप सहना पड़ा। स्वाभाविक सी बात है कि वैश्विक कंपनियां राजनीतिक जोखिम को महसूस कर रही हैं और उन्हें भेदभाव, बढ़ती उत्पादन लागत (वियतनाम में मेहनताना चीन से 60 फीसदी कम है), कठोर पर्यावरण नियमों तथा बाधित आपूर्ति आदि सभी से समस्या है। यूरोप के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 23 फीसदी कंपनियां चीन से दूर जाना चाहती हैं। इन बातों का यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि चीन को उत्पादन केंद्र या बाजार के रूप में त्यागा जा रहा है। 2022 में चीन में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में इजाफा ही हुआ है। उदाहरण के लिए जर्मनी की रसायन कंपनी बीएएसएफ दोबारा चीन जा रही है। इसी सप्ताह फाइनैंशियल टाइम्स में छपे आलेखों की श्रृंखला में बताया गया कि कैसे ऐपल का उत्पादन नेटवर्क चीन के साथ जुड़ा हुआ है। अमेरिका और भारत जैसे देशों ने चीन से होने वाले आयात को सीमित करने का प्रयास किया है लेकिन इससे चीन के साथ उनका व्यापार घाटा ही बढ़ा है। इन बातों के बावजूद इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि मिजाज बदल रहा है। सीएनबीसी के मुताबिक चीन अब वियतनाम, मलेशिया, बांग्लादेश, भारत और ताइवान के हाथों अपनी बढ़त गंवा रहा है।

ऐसे में चीन की औद्योगिक नीति में जो भी नयापन लाया गया है वह राष्ट्रीय सुरक्षा, आपूर्ति क्षेत्र के संकटों और राजनीतिक तनावों से संचालित है। ये सभी मिलकर प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाते हैं। चाहे अच्छी हो या बुरी लेकिन तस्वीर यही बताती है कि भारत की वर्तमान नीतियां जिसमें उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन, पूंजी सब्सिडी आदि शामिल हैं, वह वैश्विक रुझानों से नहीं लेकिन पूर्वी एशियाई देशों के रुझान से बहुत मेल खाती है।

भारत संयुक्त राष्ट्र की विदेशी निवेश सूची में भले ही सातवें स्थान पर है लेकिन वह अधिकांश वैश्विक कंपनियों के लिए चीन का स्वाभाविक विकल्प नहीं है। इस स्थिति को बदलने के लिए भारत को पूर्वी एशिया के साथ जुड़ाव मजबूत करना होगा। इसके लिए वह क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को माध्यम बना सकता है, अपने टैरिफ कम कर सकता है और अपनी श्रम शक्ति की गुणवत्ता को बेहतर बना सकता है।

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First Published - January 21, 2023 | 1:15 PM IST

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