Quality funds: एसबीआई म्युचुअल फंड की एक्टिव रूप से मैनेज होने वाली एसबीआई क्वालिटी फंड के लिए न्यू फंड ऑफर (NFO) फिलहाल सब्सक्रिप्शन के लिए खुला है। यह NFO 11 फरवरी को बंद हो जाएगा। व्हाइटओक (WhiteOak) और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल (ICICI Pru) दो अन्य फंड हाउस हैं जो एक्टिव क्वालिटी फंड पेश करते हैं। यूटीआई, टाटा, निप्पॉन इंडिया, कोटक महिंद्रा और डीएसपी म्युचुअल फंड सहित कई फंड हाउस इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) के जरिए एक्टिव क्वालिटी प्रोडक्ट भी उपलब्ध कराते हैं।
क्वालिटी फंड उन कंपनियों में निवेश करता है जिनके बिजनेस की बुनियाद मजबूत और टिकाऊ होती है तथा जिनकी फाइनैंशियल हेल्थ अच्छी होती है। ऐसे फंड में बाजार की उतार-चढ़ाव भरी स्थितियों के बावजूद लंबी अवधि में स्थिर वृद्धि देने की क्षमता होती है।
एसबीआई म्युचुअल फंड के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर और जॉइंट सीईओ डीपी सिंह के अनुसार, “फंड मैनेजर रिटर्न ऑन इक्विटी (RoE), रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE), कमाई में स्थिरता, कम कर्ज और मजबूत फ्री कैश फ्लो जैसे मात्रात्मक मानकों का इस्तेमाल करते हैं। वहीं गुणात्मक पहलू में प्रबंधन की क्वालिटी, कॉरपोरेट गवर्नेंस, प्रतिस्पर्धी बढ़त (मोट), बिजनेस मॉडल की मजबूती और इंडस्ट्री में लीडरशिप का आकलन किया जाता है।”
मेवेनार्क वेल्थ के को-फाउंडर और सीईओ शांतनु अवस्थी कहते हैं, “यह इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी मार्केट कैप और सेक्टर से स्वतंत्र होती है और बॉटम-अप चयन पर आधारित रहती है।” आम तौर पर ऐसे पोर्टफोलियो में कम खरीद-बिक्री होती है और लंबी अवधि के निवेश पर जोर रहता है।
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क्वालिटी फंड का मकसद लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन के लिए स्थिरता और विकास का संतुलन बनाना है, जबकि जोखिम अपेक्षाकृत कम रखना है
ये फंड गिरावट के समय कुछ हद तक सुरक्षा भी देते हैं। मीरा मनी के को-फाउंडर आनंद के. राठी कहते हैं, “मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियों के स्टॉक, बाजार में गिरावट के दौरान आम तौर पर कम टूटते हैं।” ये फंड ऐसी कंपनियों में निवेश करते हैं जिनकी कमाई का अनुमान ज्यादा स्पष्ट होता है, जिससे लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अनिश्चितता कम होती है।
राठी के मुताबिक, “ये फंड उन कारोबारों में निवेश करते हैं जो बाहरी फंडिंग और आर्थिक चक्रों पर कम निर्भर होते हैं। इससे वे सुस्ती या कड़े वित्तीय हालात का बेहतर तरीके से सामना कर पाते हैं।” पोर्टफोलियो में कम खरीद-बिक्री से समय के साथ लेनदेन लागत भी घटती है।
आनंद राठी वेल्थ के जॉइंट सीईओ फिरोज अजीज का कहना है कि बीमा कंपनियां, जो लंबी अवधि की पूंजी निवेश करती हैं, आम तौर पर क्वालिटी शेयरों में निवेश करती हैं, जिससे इन शेयरों को स्थिरता मिलती है।
वैल्यूएशन एक बड़ी चिंता का विषय है। प्राइमइन्वेस्टर.इन की हेड ऑफ एडवाइजरी आरती कृष्णन कहती हैं, “क्वालिटी कंपनियों के लिए ज्यादा कीमत चुकाने से बचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि ऐसी कंपनियां आम तौर पर सस्ती नहीं मिलतीं।”
अवस्थी एक और जोखिम की ओर इशारा करते हैं, म्युचुअल फंड में यह कैटेगरी अभी विकसित हो रही है, इसलिए इसका लंबी अवधि का ट्रैक रिकॉर्ड सीमित है।
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2025 में क्वालिटी फंड व्यापक बाजार के मुकाबले पीछे रह गए। निफ्टी 200 क्वालिटी 30 इंडेक्स ने 4.7 फीसदी रिटर्न दिया, जबकि निफ्टी 50 टोटल रिटर्न इंडेक्स (TRI) ने 11.9 फीसदी और निफ्टी 500 TRI ने 7.8 फीसदी रिटर्न दिया।
सिंह के मुताबिक 2025 में बाजार में ऐसे शेयर ज्यादा चले जो तेजी से ऊपर-नीचे होते हैं और जिनमें जोखिम ज्यादा होता है। इसके मुकाबले स्थिर और मजबूत कंपनियों के शेयर उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए। राठी कहते हैं कि कई क्वालिटी फंड ने महंगे हो चुके शेयरों से दूरी बनाए रखी। इससे शॉर्ट टर्म में उनका रिटर्न थोड़ा कमजोर रहा। एफएमसीजी और आईटी जैसे सेक्टर में शेयर पहले से महंगे थे। इस वजह से वहां से भी ज्यादा रिटर्न नहीं मिल पाया।
क्वालिटी फंड आम तौर पर उतार-चढ़ाव, अनिश्चितता या आर्थिक सुस्ती के दौर में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। सिंह कहते हैं, “मजबूत बैलेंस शीट, स्थिर कैश फ्लो और भरोसेमंद बिजनेस मॉडल की वजह से ऐसे दौर में क्वालिटी शेयरों में गिरावट अपेक्षाकृत कम होती है।”
क्वालिटी निवेश स्थिर विकास या कम नकदी वाले माहौल में भी बेहतर कर सकता है, जहां कम कर्ज और अनुशासित पूंजी प्रबंधन को महत्व मिलता है। राठी के अनुसार, जब बाजार एक सीमित दायरे में चलता है (साइडवेज मार्केट), तब भी क्वालिटी फंड अच्छा प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि ऐसे समय में सही शेयर चुनना ज्यादा मायने रखता है।
पूरे मार्केट साइकिल में देखें तो क्वालिटी फंड अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं, क्योंकि लंबी अवधि में शेयरों की कीमतें शॉर्ट टर्म रुझानों के बजाय कंपनियों की बुनियादी मजबूती को दर्शाती हैं।
क्वालिटी फंड आम तौर पर आर्थिक सुधार के शुरुआती दौर में कमजोर प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि उस समय बाजार की अगुवाई चक्रीय और ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले शेयर करते हैं। कृष्णन कहती हैं, “सुधार के पहले चरण में वैल्यू शेयर बेहतर प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि उस समय निवेशक जोखिम लेने से बचते हैं।” वह आगे कहती हैं कि तेजी वाले बाजार के आखिरी चरण में, जब निवेशक ज्यादा रिटर्न के पीछे भागते हैं, तब भी क्वालिटी फंड अक्सर पीछे रह जाते हैं।
स्मार्ट बीटा स्ट्रैटेजीज में क्वालिटी स्ट्रैटेजी को सबसे मजबूत माना जाता है, क्योंकि यह केवल तकनीकी संकेतकों पर नहीं बल्कि कंपनियों के मजबूत बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देती है। अजीज कहते हैं, “यह स्ट्रैटेजी लंबी अवधि के निवेशकों के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसमें मांग–आपूर्ति के साथ-साथ कारोबार की बुनियादी मजबूती भी अहम होती है।”
जो निवेशक मजबूत और टिकाऊ कंपनियों से लंबी अवधि में स्थिर रिटर्न चाहते हैं, वे इन फंड में निवेश कर सकते हैं। वहीं UTI AMC के फंड मैनेजर और हेड – पैसिव, आर्बिट्राज और क्वांट स्ट्रैटेजीज श्रवण गोयल के मुताबिक, “जिन निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता ज्यादा है और जो बहुत ऊंचे रिटर्न की तलाश में हैं, उनके लिए क्वालिटी फंड उतने बेहतर नहीं हो सकते।”
निवेशकों को एक्टिव और पैसिव विकल्प के बीच चुनाव इस आधार पर करना चाहिए कि वे कम लागत को ज्यादा महत्व देते हैं या फंड मैनेजर की समझ पर भरोसा करना चाहते हैं।
गोयल कहते हैं, “पैसिव स्ट्रैटेजी नियम-आधारित और कम लागत वाली होती हैं, जिनमें मानवीय पक्षपात की गुंजाइश कम रहती है।” कृष्णन के मुताबिक, इससे निवेशकों को स्टाइल बदलने के जोखिम और फंड मैनेजर के बदलने से जुड़े जोखिम से भी बचाव मिलता है।
हालांकि पैसिव स्ट्रैटेजीज में वह गुणात्मक समझ नहीं होती जो अनुभवी एक्टिव फंड मैनेजर ला सकते हैं। गोयल कहते हैं, “एक्टिव फंड मैनेजर सिर्फ वित्तीय आंकड़ों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कंपनियों की प्रतिस्पर्धी बढ़त में हो रहे बदलावों पर भी नजर रखते हैं।”
एक्टिव क्वालिटी फंड मैनजमेंट की गुणवत्ता जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रख सकते हैं, जिन्हें केवल आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। वे जरूरत पड़ने पर आंकड़ों में बदलाव दिखने से पहले ही पोर्टफोलियो में बदलाव कर सकते हैं। दूसरी ओर, एक्टिव फंड बेहतर रिटर्न (अल्फा) हासिल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनका प्रदर्शन बेंचमार्क से अलग रहने का जोखिम भी बना रहता है।
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क्वालिटी फंड में निवेश करने वालों का नजरिया कम से कम पांच साल या उससे ज्यादा का होना चाहिए। निवेशक अपने जोखिम उठाने की क्षमता, निवेश की इच्छा और समय अवधि के आधार पर तय करें कि इन फंड में कितना निवेश करना है। बाजार के उतार-चढ़ाव का फायदा उठाने और गलत समय पर निवेश के असर को कम करने के लिए सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) का तरीका अपनाना बेहतर रहता है।
आखिर में, क्वालिटी इन्वेस्टमेंट स्टाइल आम तौर पर खपत से जुड़ी उन कंपनियों से जुड़ी होती है जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत होती है और जिनमें वृद्धि की संभावना रहती है। गोयल के मुताबिक, “इनकम टैक्स में राहत और जीएसटी के सरलीकरण जैसे सरकारी कदम क्वालिटी आधारित कंपनियों के लिए पॉजिटिव माहौल बनाने में मदद कर सकते हैं।”