उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसे बिंदु पर है, जहां भारतीय टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेट के नीचे सरकती है। यह स्थिति इसे भारत की पारिस्थितिकी के लिहाज से सबसे अधिक नाजुक क्षेत्रों में से एक बनाती है। वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन से जोखिम की आशंका और बढ़ती है। यह रविवार की आपदा में स्पष्ट था जब जोशीमठ के नजदीक नंदा देवी ग्लेशियर (हिमखंड) का एक हिस्सा टूटकर नीचे बह रही नदी में गिर गया। इससे पैदा मलबा और पानी के बहाव में दो विद्युत संयंत्र नष्ट हो गए और कई गांव बह गए। वहीं 197 लोग लापता हैं, जिनमें से ज्यादातर एनटीपीसी की जल विद्युत परियोजना पर काम करने वाले श्रमिक हैं।
शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि ग्लेशियर के नीचे हिम झील बन गई थी, जिससे ग्लेशियर का एक हिस्सा टूट गया। यह भूगर्भीय घटनाक्रम वैश्विक तापमान से जुड़ा है। छोटे हिमालय जलवायु परिवर्तन संकट का मुख्य केंद्र हैं, जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र मेें पहली बार भूस्खलन और बाढ़ से नुकसान हुआ है। इस शताब्दी में ऐसी ही घटनाएं 2004, 2005 और 2013 में हुई हैं। वर्ष 2013 की आपदा में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। उस समय बादल फटने से तीर्थस्थल केदारनाथ के आसपास भयंकर बाढ़ आ गई, जिसमें सालाना चार धाम यात्रा के दौरान 5,700 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
केंद्र और राज्य सरकारों के अंधाधुंध और अविवेकी विकास एजेंडा के कारण इन प्राकृतिक आपदाओं में मानव क्षति बढ़ी है। उदाहरण के लिए इस अस्थिर क्षेत्र में 14 बांध हैं। इनमें टिहरी जल विद्युत परियोजना भी शामिल हैं, जो भागीरथी नदी पर विश्व का सबसे ऊंचा बांध है। इन बांधों से एक प्रमुख भूगर्भीय फॉल्ट जोन-मध्यवर्ती हिमालयी भूकंपीय दरार पर स्थित है। इसके कारण एक बड़ा भूकंप सैकड़ों कस्बों और गांवों को समा सकता है। पर्यावरण कार्यकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा के करीब दो दशक तक अभियान चलाने के बावजूद इस बांध का निर्माण किया गया। राजनीतिक घटनाक्रम का भी राज्य की असुरक्षित पारिस्थितिकी पर असर पड़ा है।
उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग कर वर्ष 2000 में अलग राज्य बनाया गया। तब से प्राकृतिक सौंदर्य वाले इस सुंदर राज्य की पर्यटन आय पर अत्यधिक निर्भरता रही है। यहां हिंदुओं के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं, इसलिए धार्मिक पर्यटन केंद्र बिंदु बन गया। 9,800 फुट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित चार मंदिरों- यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ की सालाना चार धाम यात्रा से राज्य को तगड़ी कमाई होती है। इससे राज्य में निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं, जिसमें अंधाधुंध तरीके से पेड़ों को गिराया जा रहा है और मंदिरों तक पहुंचने की खातिर सड़क बनाने के लिए पहाडिय़ों की तलहटी को कांटा-छांटा जा रहा है। नदियों के तट पर अनेक होटल और गेस्ट हाउस खड़े हो गए हैं, जो नदियों में कचरा डाल रहे हैं।
इस अंधाधुंध निर्माण के खतरे 2013 की बाढ़ में स्पष्ट दिखे थे, जब पूरी इमारतें बाढ़ में समा गई थीं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार ने उस आपदा के पारिस्थितिकी संदेश को ग्रहण नहीं किया। इसके बजाय प्रधानमंत्री ने 2013 की आपदा में मरने वाले लोगों को श्रद्धांजलि के रूप में 2016 में चार धाम राजमार्ग शुरू किया। इस विशाल परियोजना के तहत 900 किलोमीटर टूटे-फूटे राजमार्गों की जगह दो लेन, 12 बाइपास रोड, 15 बड़े फ्लाईओवर, 101 छोटे पुल, 3,595 पुलिया और दो सुरंग बनाने की योजना बनाई गई। इसका असर पहले ही बार-बार भूस्खलन के रूप में महसूस किया जा रहा है। यह क्षेत्र अस्थिर है और निर्माण के मलबे को रोकने के लिए बनाई जा रही दीवारें अपर्याप्त हैं। नदी रेखा से निर्माण की 500 किलोमीटर की सीमा का उल्लंघन भी देखा जा रहा है। इसके अलावा राजाजी वन्यजीव अभयारण्य में अतिक्रमण और हरिद्वार में आगामी महा कुंभ मेले के लिए बुनियादी ढांचा खड़ा करना और बहुत सी प्राकृतिक आपदाओं को न्योता देना है, जिससे सरकार के विकास एजेंडे का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।