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Editorial: सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला वापस, पर्यावरण मंजूरियों पर फिर खुली बहस

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स्वच्छ हवा और प्रदूषण रहित वातावरण हमारे मूल अधिकार हैं। न्यायालय स्वयं बार-बार इस बात की पुष्टि कर चुका है

Last Updated- November 21, 2025 | 10:58 PM IST
Supreme Court

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मई 2025 के अपने फैसले को इस सप्ताह वापस लेने से पर्यावरणीय स्वीकृतियों के पुनरावलोकन का रास्ता फिर से खुल सकता है। यह भारत के पर्यावरणीय विनियमन में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव को दर्शाता है। इससे पहले के मामलों, मसलन कॉमन कॉज बनाम भारत संघ के मामले में यह स्पष्ट किया गया था कि पर्यावरणीय मंजूरी पहले हासिल करना जरूरी है। वनशक्ति बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने एक बार फिर पोस्ट फैक्टो यानी बाद में पर्यावरणीय मंजूरी को खारिज किया। अब देश के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के नेतृत्व वाले पीठ ने बहुमत से उस निर्णय को वापस ले लिया और कहा कि पहले वाले आदेश के कारण बड़े पैमाने पर वित्तीय नुकसान का जोखिम था, बड़ी सार्वजनिक परियोजनाएं बेपटरी हो सकती थीं और डेवलपर्स में अनिश्चितता का माहौल बन सकता था।

परंतु ये व्यावहारिक चिंताएं उन संवैधानिक बुनियादों की जगह नहीं ले सकतीं जिन पर देश का पर्यावरणीय संचालन आधारित है। स्वच्छ हवा का अधिकार और प्रदूषण रहित वातावरण हमारा मूल अधिकार है और न्यायालय स्वयं बार-बार इस बात की पुष्टि कर चुका है। बाद में दी जाने वाली मंजूरियां एहतियाती सिद्धांत को कमजोर करती हैं, जिसका मूल विचार यह है कि पर्यावरणीय नुकसान को उसके घटित होने से पहले ही टालना चाहिए। इससे यह जोखिम पैदा होता है कि पर्यावरणीय समीक्षा एक औपचारिकता बनकर रह जाए, न कि एक सुरक्षा उपाय। यह चिंता आज विशेष रूप से प्रासंगिक है, जब लंबे समय तक वायु प्रदूषण की घटनाएं, भूजल का क्षय, वनों की कटाई और जलवायु प्रभाव पहले से ही भारी स्वास्थ्य और आर्थिक लागतें थोप रहे हैं।

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कानूनी ढांचा इस बात को पुष्ट करता है। वर्ष 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना का पैराग्राफ 2 पहले पर्यावरणीय मंजूरी की बात कहता है। ऐसे में अतीत से प्रभावी मंजूरी कानूनन और नैतिक रूप से भी टिकाऊ नहीं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अकेले वर्ष 2024 में 500 से अधिक पर्यावरण मंजूरियां दीं। इससे यह बात जाहिर होती है कि कितनी बड़ी तादाद में परियोजनाएं कठोर पर्यावरण निगरानी की मोहताज हैं। बिना अनुमति काम शुरू करने वाले बिल्डरों के उल्लंघनों को सामान्य मानकर उसे हल्का करना, और अक्सर बुनियादी परियोजना विवरण तक का खुलासा न करना, प्रणालीगत अनुपालनहीनता को गहराई से स्थापित करने का जोखिम पैदा करता है।

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने असहमति जताते हुए कहा कि बाद में दी जाने वाली मंजूरियां कानून के तहत अनिवार्य पूर्व पर्यावरणीय अनुमोदन की आवश्यकता के अनुरूप नहीं हैं, और यह भी टिप्पणी की कि ऐसी स्वीकृतियों को अनुमति देने वाले बाद के निर्णय इस स्थापित स्थिति से अलग हो जाते हैं। उन्होंने यह भी इंगित किया कि यह तर्क कि निर्माण तोड़ने से प्रदूषण होगा, अनुपालन न करने को उचित नहीं ठहरा सकता, क्योंकि इसके परिणाम उस निर्माण की वजह से होते हैं जो बिना पूर्व अनुमोदन के किया गया था।

आगे की राह पिछली तारीख से नरमी नहीं, बल्कि अनुपालन को मजबूत बनाना है। पहली बात, पर्यावरण मंजूरी किसी परियोजना के शुरू होने के पहले ली जानी चाहिए। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले मंजूरी हासिल करने का अनुशासन पर्यावरण नियमन का आधार है। दूसरा, सरकार को प्रशासनिक क्षमता में सुधार करना होगा। इसके लिए परिवेश ( प्रो एक्टिव ऐंड रिस्पॉन्सिव फैसिलिटेशन बाइ इंटरैक्टिव ऐंड वर्चुअस एनवायरनमेंट सिंगल-विंडो हब) जैसे प्लेटफॉर्म पर पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करना, समय पर जनसुनवाई सुनिश्चित करना, और मजबूत विशेषज्ञ मूल्यांकन समितियां बनाना आवश्यक है, ताकि विलंब के कारण डेवलपर्स शॉर्टकट अपनाने के लिए मजबूर न हों।

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तीसरा, पारदर्शिता और खुलासों में सुधार होना चाहिए। कई उल्लंघन ऐसे होते हैं जहां परियोजनाओं के बारे में अधूरी या भ्रामक जानकारी होती है। वास्तविक निगरानी और अनिवार्य सार्वजनिक प्रकटीकरण मददगार हो सकते हैं। उल्लंघन करने वालों पर दंड लगाया जाना चाहिए ताकि पारिस्थितिक क्षति की भरपाई हो सके और भविष्य में उल्लंघनों को रोका जा सके। इस मामले की आगे सुनवाई में यह उम्मीद बनी रहेगी कि न्यायालय स्पष्टता को पुनः स्थापित करेगा और यह दोहराएगा कि पर्यावरण संरक्षण को सुविधा के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। सतत या टिकाऊ विकास कोई बाधा नहीं है। यह एकमात्र वैध मार्ग है जो नागरिकों के अधिकारों और भारत के पर्यावरणीय भविष्य दोनों का सम्मान करता है।

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First Published - November 21, 2025 | 10:01 PM IST

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