भारतीय शेयर बाजार पर मंडरा रहा बादल फिलहाल छंट गया है। भारत के अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ व्यापार सौदों ने पिछले एक साल में शेयर बाजार से जुड़े सबसे बड़े जोखिमों में से एक को कम कर दिया है। टैरिफ और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच, विदेशी निवेशकों ने वर्ष 2025 में भारी मात्रा में पूंजी निकासी करते हुए 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाले। इसके कारण यह एक ऐसा वर्ष बना जब भारतीय शेयर अधिकांश उभरते बाजारों के शेयरों के मुकाबले पिछड़ गए।
व्यापार सौदे पहले से ही विदेशी पूंजी को वापस लाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं हालांकि अब भी सतर्कता बरती जा रही है। भारतीय शेयर बाजार फिलहाल कमजोर मांग और उच्च मूल्यांकन जैसी दो चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
शेयर बाजार में तेजी का दौर आमतौर पर एक चक्रीय आर्थिक तेजी के साथ-साथ शुरुआत में कम मूल्यांकन के हिसाब से संचालित होता है। भारत इनमें से किसी भी मामले में कोई मजबूत उदाहरण नहीं है। भारत की घरेलू मांग की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। यहां तक कि माल और सेवा कर में बदलाव ने छिटपुट खपत को बढ़ावा दिया है लेकिन अंतर्निहित क्रय शक्ति के कारक गायब हैं।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में मजदूरी-पारिश्रमिक में वृद्धि, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद या तो कमजोर रही है या पूरी तरह स्थिर रही है। इस स्थिति ने व्यापक उपभोग की क्षमता सीमित कर दी है। शेयर बाजारों के लिए देश की कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि लोगों की पगार या मजदूरी कितनी बढ़ रही है।
ऐसा इसलिए, क्योंकि जब लोगों की कमाई बढ़ती है तभी वे बाजार से अधिक सामान खरीदते हैं और कंपनियों के कारोबार का विस्तार होता है। वास्तविक आय में वृद्धि के बिना, बाजार की मांग केवल ‘कर्ज के विस्तार’ या ‘सरकारी मदद’ पर टिकी रहती है और ये दोनों ही भविष्य के लिए अनिश्चित कारक हैं। यही कारण है कि कंपनियों के मुनाफे में वैसी बढ़त नहीं दिखी जैसी देश की कुल जीडीपी वृद्धि दर में नजर आ रही थी। इसका असर निजी कंपनियों के पूंजीगत खर्च पर भी साफ दिख रहा है और कंपनियां 2010 के दशक के अंत में आए आर्थिक संकट के बाद से निवेश को लेकर काफी सतर्क हैं।
भले ही आज कंपनियों का बैलेंसशीट पहले से बेहतर है, लेकिन उनकी उत्पादन क्षमता का उपयोग धीरे-धीरे बढ़ा है। मांग को लेकर अनिश्चितता का माहौल होने के कारण कंपनियां नई फैक्टरियां लगाने या क्षमता बढ़ाने से कतरा रही हैं।
व्यापार के सामान्य होने से उन क्षेत्रों को मदद मिलनी चाहिए जहां भारत पहले से ही प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में है जैसे कि कपड़ा, जेनेरिक दवाएं, कुछ विशेष रसायन और इंजीनियरिंग निर्यात। लेकिन इनमें से कोई भी नया ‘वृद्धि का इंजन’ नहीं है बल्कि ये केवल वैश्विक व्यापार के दोबारा खोले जाने का लाभ उठा रहे हैं। दो दशकों के वैश्विक जुड़ाव के बावजूद भारत, चीन या वियतनाम की तरह अपने विनिर्माण निर्यात को बड़े पैमाने पर बढ़ाने में जूझता रहा है। व्यापार समझौते बाजारों की बाधाओं को तो कम कर देते हैं लेकिन वे प्रतिस्पर्धा पैदा नहीं करते।
इन परिस्थितियों के बीच अब वृद्धि का केवल एक ही मुख्य इंजन बचा है। सरकारी पूंजीगत व्यय अब भारत के वृद्धि मॉडल का सबसे मजबूत स्तंभ बन गया है। केंद्रीय बजट 2026-27 में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय का आंकड़ा 12 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंचा दिया गया है। लेकिन, यहां दो पेच हैं। पहला यह कि बुनियादी ढांचे पर होने वाले इस खर्च का सीधा फायदा केवल उन्हीं कंपनियों को मिलता है जो सरकारी परियोजनाओं में सीधे तौर पर शामिल हैं। शेयर बाजार के लिहाज से देखें तो ऐसी कंपनियों की संख्या काफी कम है और इनमें से अधिकतर छोटे और मझोले शेयर हैं।
दूसरा पेच यह है कि केवल बजट आवंटित कर देने का मतलब यह नहीं है कि जमीन पर भी काम पूरा हो गया। ऑडिट के आंकड़े बार-बार हमारी व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी)की एक समीक्षा में पाया गया कि 442 परियोजनाओं की लागत में 1.07 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हो गई और इनमें 16 साल तक की देरी हुई। बुनियादी ढांचे के ऑडिट में तो परियोजनाओं में 3 से लेकर 39 साल तक की देरी देखी गई है। ये आंकड़े इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि बुनियादी ढांचे पर किया गया खर्च तभी सार्थक होता है जब उससे उत्पादकता बढ़े। वरना, यह पूंजीगत व्यय, अर्थव्यवस्था के लिए केवल एक प्रोत्साहन भर बनकर रह जाता है, जिससे भविष्य के लिए दीर्घावधि वृद्धि की स्थिति नहीं बन पाती है।
यदि मांग-आधारित वृद्धि के मोर्चे पर उत्साह की कमी पर विचार करें तब भी इसने भारतीय निवेशकों, विशेष रूप से स्मॉलकैप में निवेश करने वालों के भरोसे को कम नहीं किया है। लेकिन यहीं पर इस भरोसे के सामने दूसरी चुनौती आती है जो मूल्यांकन से जुड़ी चुनौती है। वर्ष 2025 में बाजार में आई एक भारी गिरावट के बाद, इस सेगमेंट के कुछ हिस्से में मूल्यांकन अब कुछ हद तक सामान्य और संतुलित हुई है।
पिछले साल जब निवेशकों ने जोखिम वाली स्थिति से दूरी बनाई तब स्मॉलकैप और मिडकैप सूचकांक में भारी गिरावट आई थी जो विदेशी फंडों की निकासी और घरेलू बाजार में नकदी की कमी को ही दर्शाता है। इससे बाजार में यह धारणा बनी है कि यदि नकद पूंजी की वापसी होती है और घरेलू निवेशक दोबारा जोखिम लेने को तैयार होते हैं तब एक तेजी का चक्र शुरू हो सकता है। लेकिन यह इस शर्त पर निर्भर है कि कंपनियों का मुनाफा भी उसी रफ्तार से बढ़े, ताकि वह मौजूदा मूल्यांकन के साथ मेल खा सके।
पिछले दो दशकों से भारतीय शेयर बाजार अन्य उभरते बाजारों की तुलना में महंगी दर पर ट्रेडिंग करता आया है। यह भारत के बेहतर कॉरपोरेट प्रशासन से जुड़े नजरिये, शेयरों पर बेहतर रिटर्न और भविष्य में संरचनात्मक वृद्धि की उम्मीदों को दर्शाता है। लेकिन हाल के वर्षों में यह प्रीमियम और भी ज्यादा बढ़ गया है।
एमएससीआई इंडिया के लिए निवेशकों के निवेश के बदले कंपनियों की भविष्य की कमाई का अंदाजा बताने वाले पैमाने ‘फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग’ के गुणक कुछ समयावधि में अन्य उभरते बाजारों की तुलना में लगभग दोगुने रहे हैं। हाल की गिरावट के बाद भी, दुनिया के अन्य समकालीन देशों के मुकाबले भारत के शेयरों की कीमत उनकी कमाई के अनुपात में सबसे ज्यादा है। यहां तक कि कुछ मामलों में, भविष्य की अनुमानित कमाई के आधार पर भारत दुनिया का सबसे महंगा प्रमुख बाजार बना हुआ है।
कुछ अनुमानों के अनुसार, अन्य उभरते बाजारों का रिटर्न भारत के मुकाबले 20 फीसदी से भी अधिक रहा। वहीं दूसरी ओर, भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन लगभग स्थिर रहा, जिसका मुख्य कारण शुरुआत में ही शेयरों का बहुत महंगा होना और कंपनियों के मुनाफे में मामूली बढ़त होना था।
हालांकि, भारत के लिए शेयरों का अन्य देशों से महंगा होना तर्कसंगत भी है। भारत राजनीतिक स्थिरता, घरेलू पूंजी बाजार और अनुकूल आबादी जैसे फायदे देता है। लेकिन ऊंचे मूल्यांकन की यह मांग होती है कि कंपनियों का मुनाफा भी लगातार बढ़ता रहे। जब कमाई की रफ्तार धीमी पड़ती है, चाहे वह थोड़े समय के लिए ही सही हो, तब बाजार का प्रदर्शन अन्य देशों के मुकाबले कम दिखता है। यहीं पर स्मॉलकैप को लेकर बना हुआ उत्साह वास्तविकता की कसौटी पर परखा जाता है। नकदी के दम पर बाजार कुछ समय के लिए तो बढ़ सकता है लेकिन भारत में लंबी तेजी के लिए कंपनियों के मुनाफे में लगातार बढ़त जरूरी है क्योंकि मूल्यांकन में भविष्य की बढ़त को पहले ही शामिल किया जा चुका है।
इस पूरे विश्लेषण का सार यह है कि व्यापार समझौते भविष्य के जोखिमों को कम तो करते हैं, लेकिन वे स्वचालित तरीके से वृद्धि की स्थिति नहीं तैयार कर सकते हैं। भारत की बुनियादी सीमाएं जैसे निर्यात में प्रतिस्पर्धा, मजदूरी-पारिश्रमिक में असमान वृद्धि और निजी निवेश में सतर्कता की बनी स्थिति आज भी वैसी ही बनी हुई हैं। अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते वाले दिन पहले एक घंटे की उत्साहपूर्ण तेजी को छोड़ दें, तो सभी सूचकांक स्थिर रहे हैं या फिर नीचे गिरे हैं।
हमें समय-समय पर छोटी अवधि की तेजी देखने को मिल सकती हैं, विशेष रूप से उन स्मॉलकैप शेयरों में जो काफी गिर चुके हैं। लेकिन जब तक वास्तविक आय की रफ्तार नहीं बढ़ती, मांग में मजबूत तेजी नहीं देखी जाती है, निजी निवेश का दायरा नहीं बढ़ता और कंपनियों का मुनाफा फिर से पटरी पर नहीं आता तब तक ऊंचे मूल्यांकन बाजार की बढ़त के लिए एक बाधा बने रहेंगे।
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के एक ट्रस्टी हैं)