facebookmetapixel
Advertisement
Titan Share: Q3 नतीजों से खुश बाजार, शेयर 3% चढ़कर 52 वीक हाई पर; ब्रोकरेज क्या दे रहे हैं नया टारगेट ?गोल्ड-सिल्वर ETF में उछाल! क्या अब निवेश का सही समय है? जानें क्या कह रहे एक्सपर्टAshok Leyland Q3FY26 Results: मुनाफा 5.19% बढ़कर ₹862.24 करोड़, रेवेन्यू भी बढ़ाUP Budget 2026: योगी सरकार का 9.12 लाख करोड़ का बजट पेश, उद्योग और ऊर्जा को मिली बड़ी बढ़त$2 लाख तक का H-1B वीजा शुल्क के बावजूद तकनीकी कंपनियों की हायरिंग जारीFIIs अब किन सेक्टर्स में लगा रहे पैसा? जनवरी में ₹33,336 करोड़ की बिकवाली, डिफेंस शेयरों से दूरीIMPS vs NEFT vs RTGS: कौन सा है सबसे तेज और सस्ता तरीका? जानिए सब कुछ₹21,028 करोड़ मुनाफे के बाद SBI ने TCS को पीछे छोड़ा, बनी देश की चौथी सबसे बड़ी कंपनीरेखा झुनझुनवाला के पोर्टफोलियो वाला स्टॉक, मोतीलाल ओसवाल ने दिया 47% अपसाइड का टारगेटITR Refund Status: रिफंड का इंतजार? 24 लाख से ज्यादा रिटर्न अब भी पेंडिंग; जानें क्या करें

वर्ष 2022 में विफल हुए अनुमान

Advertisement
Last Updated- January 08, 2023 | 11:03 PM IST
Russia -Ukraine war

वर्ष 2022 की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना निश्चित रूप से यूक्रेन पर रूस का आक्रमण रही। हालांकि पश्चिमी खुफिया जगत से बार-बार चेतावनी दी जा रही थी लेकिन ज्यादातर लोग यही मानकर चल रहे थे कि एक यूरोपीय देश पर इस तरह का हमला होना लगभग असंभव है। लेकिन 2022 की शुरुआत के सात सप्ताह के भीतर ही लोगों को अपना वह अनुमान बदलना पड़ा।

उस हमले तथा उसके बाद घटित हुई घटनाओं को देखते हुए कई अन्य अनुमानों को भी बदलना पड़ा। अब हम जिन वक्तव्यों का जिक्र करने वाले हैं, 2022 के अंत में उन्हें दोहराना शायद, वर्ष के आरंभ की तुलना में काफी मुश्किल था।

‘रूस अभी भी एक महाशक्ति है’: मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए अपने समय की ताकतवर सोवियत सैन्य शक्ति की तुलना यूक्रेन में नजर आ रही बिखरी हुई और निष्प्रभावी सेना से करना मुश्किल है। रूसी सेना के जवान उस सेना के वारिस नहीं नजर आते जिसने इतिहास का सबसे महान युद्ध जीता था। इसके बजाय रूसी सेना को तीन-तीन बार शर्मिंदा होकर पीछे लौटना पड़ा और फिर उसने अपनी इज्जत बचाने के लिए असैन्य और रिहायशी इमारतों पर बमबारी शुरू कर दी।

इसके उलट यूक्रेन की सेना ने जिस कौशल के साथ युद्ध नीति का इस्तेमाल किया, रणनीतिक चालें चलीं और विदेशों से मिले हथियारों का जिस प्रकार इस्तेमाल किया उसके आधार पर तो वही लाल सेना की सच्ची वारिस नजर आ रही है।

‘यूरोप कमजोर है और आसानी से टूट सकता है’: रूस के निर्णय लेने वालों को आरंभ में लगा कि यूरोप के देश कमजोर, बंटे हुए और रूस से मिलने वाली ऊर्जा पर निर्भर हैं। उन्हें लगा कि ऐसी स्थिति में यूरोप के देश अपनी सीमाओं पर चल रहे युद्ध को लेकर एकजुट प्रतिक्रिया नहीं दे पाएंगे। रूस का यह भी मानना था कि यूरोप और यूरोपीय संघ कमजोर, बंटे हुए और उस पर निर्भर हैं।

इसके बावजूद रूस की प्रतिक्रिया में ऐसा कुछ नजर नहीं आया। जब बात सैन्य उपकरणों और हथियारों की आई तो यूरोप के देशों ने अमेरिका के समान सहयोग नहीं किया लेकिन जरूरी नहीं है कि आगे चलकर भी ऐसा ही हो।

जर्मनी का रक्षा व्यय अकेले 2022 में 50 फीसदी बढ़ गया है। यही वह वर्ष रहा जब दूसरे विश्वयुद्ध की विरासत को आखिरकार त्याग दिया गया। रूस की छवि को अपूरणीय क्षति तो हुई ही साथ ही उस युद्ध में पराजित हुए देशों ने संकेत दिया कि दशकों के बाद वे दोबारा हथियारबंद होंगे।

इसके साथ ही यूरोप द्वारा यूक्रेन का समर्थन करने की प्रतिबद्धता भी इस युद्ध में उस तरह समाप्त नहीं हुई जैसी कि रूस ने आशा की थी। अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक और दीर्घकालिक रूप से बड़ा झटका लगने के बावजूद, ऊर्जा कीमतों और उसकी कमी के कारण कठिन गुजरने वाले जाड़ों के बीच तथा यूरोपियन मूल्यों को लेकर आंतरिक विभाजन के बावजूद यूरोपीय संघ 2022 के अंत में वर्ष के आरंभ की तुलना में कहीं अधिक एकजुट रहा है। यूरोप के लोग और एक विचार के रूप में यूरोप अनुमान से काफी मजबूत नजर आ रहा है।

‘चीन संप्रभुता का सम्मान करता है’: कई लोगों को लगा था कि रूस-यूक्रेन युद्ध का इकलौता विजेता चीन होगा। यह बात सही होती अगर युद्ध छोटा होता और रूस जीत जाता। चीन रूस का इकलौता बड़ा समर्थक है और रूस के मजबूत रहने से उसे फायदा मिलता लेकिन पश्चिम इसे पसंद नहीं करता। लेकिन जंग लंबी खिंची और यूक्रेन ने दबदबा कायम कर लिया। याद रखें कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में चीन जिस एक मूल्य को बरकरार रखने का दिखावा करता है वह है संप्रभुता लेकिन यहां उसका उल्लंघन हुआ और चीन ने कुछ नहीं किया।

10 या पांच वर्ष पहले आप कह सकते थे कि चीन एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पेश करेगा जहां व्यवहार के मानक अलग और ज्यादा सम्मानजनक रहेंगे। आज ऐसा लगता है मानो किसी वैकल्पिक व्यवस्था की पेशकश नहीं की जा रही है और जो ताकतवर है उसी की चल रही है। चीन इस खेल में माहिर है।

‘भारत लोकतांत्रिक देशों के साथ है’: ज्यादातर पश्चिमी देशों और भारत में भी तमाम लोगों ने यही माना होगा कि कम से कम भारत में लोक सहानुभूति तो यूक्रेन के साथ ही होगी जो एक लोकतांत्रिक देश है और जिसे एक पूर्व औपनिवेशिक शासक आक्रांत कर रहा है। परंतु इसके बजाय भारतीय राजनेता रूस के प्रति जन समर्थन को देखकर चकित हैं।

हम कह सकते हैं कि ऐसा क्यों है- अतीतमोह? इतिहास की गलत समझ? मजबूत के साथ जुड़ाव? लेकिन एक बात निश्चित है कि आगे चलकर कुछ ही लोग मानेंगे कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उन लोकतांत्रिक देशों के साथ खड़ा होगा जो खतरे में हैं।

‘राष्ट्र निर्माण का युग समाप्त’: वर्ष 2021 में अमेरिका ने अफगानिस्तान को धोखा दिया था। उसने उसे बचाने का वादा तोड़ते हुए पूरा दोष अफगानों पर ही थोप दिया था। उनका कहना लगभग यह था कि राष्ट्र निर्माण एक मूर्खतापूर्ण काम है।

व्लादीमिर पुतिन मानते हैं कि यूक्रेन एक स्वतंत्र देश हो ही नहीं सकता क्योंकि वह कभी एक देश था ही नहीं। यकीनन वह भी अमेरिका से सहमत होंगे। लेकिन 2022 में हमने देखा कि पश्चिमी समर्थन और आंतरिक प्रतिबद्धता के कारण सही मायनों में यूक्रेन एक देश के रूप में उठ खड़ा हुआ।

यहां तक कि यूक्रेन की राजनीति के अधिकांश सदस्य जो फरवरी 2022 के पहले तक रूस समर्थक माने जाते थे वे भी रूसी टैंकों के सीमा पार करते हुए यूक्रेन के मजबूत समर्थक बन गए। जो देश अपने अस्तित्व की रक्षा करते हैं वे अपने अस्तित्व को नया अर्थ देते हैं यूक्रेन में हमारी आंखों के सामने ऐसा ही हुआ। संघर्ष और नुकसान से भरे एक वर्ष में यही इकलौती आशा की किरण है जिसका हम उल्लेख कर सकते हैं।

Advertisement
First Published - January 8, 2023 | 11:02 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement