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तकनीकी बदलाव के दौर में श्रम व्यवस्था में व्यापक सुधार जरूरी, यूनियनें तैयार नहीं

देश की ट्रेड यूनियनों के इरादे नेक हैं लेकिन वे एक अलग ही युग की देन हैं। वे कामकाजी दुनिया को नया रूप दे रही तकनीकी सुनामी से निपटने को तैयार नहीं हैं

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लवीश भंडारी   
Last Updated- February 16, 2026 | 10:57 PM IST

देश की 10 बड़े ट्रेड यूनियनों ने मिलकर एक समूह बनाया है और उन्होंने पिछले सप्ताह एक दिन की हड़ताल का आह्वान किया। उनकी धमकी एकदम स्पष्ट थी: हाल ही में अधिसूचित चार श्रम संहिताओं (वेतन, औद्योगिक संबंधों, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित) को वापस लिया जाए और तकरीबन 29 कानूनों वाली पुरानी व्यवस्था को लागू किया जाए वरना हालात बद से बदतर होते जाएंगे। दुर्भाग्यवश ये यूनियन उन खास तत्वों को चिह्नित नहीं करते जो उन्हें मंजूर नहीं हैं। अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो कम से कम बातचीत और बेहतर विश्लेषण की गुंजाइश होती।

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने सरकार की श्रम संहिता नीतियों, परमाणु बिजली से संबद्ध शांति अधिनियम, ग्रामीण रोजगार योजना (जीरामजी), बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, शिक्षा विधेयक, उत्तर भारत में प्रदूषण और अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर सरकार की नीतियों के प्रति गहरी चिंता जताई। नैशनल कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज ऐंड इंजीनियर्स भी इसमें शामिल हो गई, संभवतः बिजली संशोधन विधेयक के कारण उसने ऐसा किया है।

भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ को छोड़कर सभी प्रमुख यूनियनों ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें इंडियन नैशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस, ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन और सभी क्षेत्रीय महासंघ/संघ शामिल हैं। आश्चर्यजनक रूप से संयुक्त किसान मोर्चा भी इसमें शामिल हो गया है। किसानों के लिए अच्छी बात है कि ये श्रम कानून अधिकांशतः कृषि पर लागू नहीं होते। मुझे संदेह है कि किसान चाहेंगे कि भारतीय श्रम कानून उन पर लागू हों, और तो और वे चार श्रम संहिताओं की तुलना में 29 श्रम कानूनों को प्राथमिकता देंगे।

हर हड़ताल की कीमत चुकानी पड़ती है और ये सभी संबंधित लोगों के लिए नुकसानदेह होती हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि नई संहिताओं में क्या दिक्कत हो सकती है? चूंकि यूनियन जनता के समक्ष और स्पष्ट रूप से सामने नहींआ रहे इसलिए हम यह देखने पर  विवश हैं कि लोग उनकी आलोचना क्यों कर रहे हैं? एक आलोचना यह है कि अब किसी भी इकाई में 300 तक श्रमिक होने पर भी श्रमिकों की संख्या को तर्कसंगत करने यानी छंटनी के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है, जबकि पहले यह सीमा 100 थी। मेरा मानना है कि भारत को इस प्रावधान को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए।

एक गृहिणी को अपनी नौकरानी बदलने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। जनता को अपने राजनीतिक प्रतिनिधि बदलने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। डॉक्टर को अपने कंपाउंडर बदलने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। किसान को अपने मजदूर हटाने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। ये केवल नियोक्ता कर्मचारी संबंध हैं, कोई शादी नहीं, जिसे सरकार की इजाजत से नियंत्रित किया जाए।

कम उत्पादक श्रमिक पूरे उत्पादन श्रृंखला को बाधित करते हैं और उनका बने रहना कार्यस्थल को नुकसान पहुंचाता है। याद रखें, प्रबंधक प्रायः कम उत्पादक श्रमिकों को ही बदलते हैं। और बड़ी इकाइयों में कम उत्पादक श्रमिक उतना ही नुकसान पहुंचाएंगे जितना छोटी इकाइयों में। तो इसे 100 या 300 तक क्यों सीमित करें, क्यों नहीं 3,000 या 30,000? हमें तर्कसंगतीकरण से जुड़ी अनुमतियों की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त करना चाहिए और इसके बजाय बेरोजगारी बीमा के माध्यम से श्रमिकों की सुरक्षा लानी चाहिए।

एक अन्य आलोचना यह है कि 29 अलग-अलग कानूनों को चार संहिताओं में बदलकर सरकार ने खुद को अधिक शक्तिशाली बना लिया है। दलील यह है कि नियमों को बदलना कानून बदलने से आसान है और चार संहिताओं के साथ ऐसे नियम लिखे जा सकते हैं जो शायद श्रमिकों के खिलाफ जाएं।
यह तर्क भी त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि नियम हमेशा कानून के अंतर्गत बनाए जाते हैं और नियम कानून के विरुद्ध नहीं जा सकते। यह सही है कि नियम जिस तरह लिखे जाते हैं, उसके आधार पर वे कानून को सख़्त या नरम बना सकते हैं। लेकिन 29 कानूनों का विकल्प किसी भी श्रम कानून व्यवस्था के लिए अत्यधिक बोझिल है और इसे सरल बनाना ही होगा।

वास्तव में, चार नई संहिताओं का विश्लेषण दिखाएगा कि वे अभी भी बहुत लंबे और जटिल हैं और इन्हें और अधिक सरल बनाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, कई तत्वों जैसे ओवरटाइम की सीमा, काम का आवंटन, महिलाओं की सुरक्षा की लागत आदि को आसान बनाने की जरूरत है। सरकार को इन चार श्रम संहिताओं को और सरल बनाने के लिए एक सशक्त आयोग की घोषणा करनी चाहिए, न कि इन्हें रद्द करना चाहिए।

एक और आलोचना इस मसले पर है कि उद्यमी या प्रबंधक को कितनी यूनियनों से बातचीत करनी होगी। पुराने नियमों में कई यूनियनों से बातचीत का प्रावधान था, लेकिन नए नियमों में कहा गया है कि प्रबंधकों को केवल सबसे बड़ी यूनियन से ही संवाद करना होगा। जब कई यूनियनें शामिल होती हैं, तो किसी एक के काम में बाधा डालने की संभावना अधिक होती है। इसलिए समाधान में अधिक समय लगता है, लागत बढ़ती है और कई बिचौलिये आ जाते हैं। उद्यमी प्रबंधकों और एक यूनियन के बीच आपसी संवाद किसी भी मानक से कहीं बेहतर है। यूनियनें इस प्रावधान को क्यों नापसंद कर सकती हैं? क्योंकि नई संहिता उन इकाइयों में यूनियनों की शक्ति को कम कर देती हैं जहां उनका प्रतिनिधित्व कम है।

चार श्रम संहिताओं की आलोचनाओं के दौरान अन्य बिंदु भी सामने आते हैं। इनमें शामिल हैं: नीति स्तर पर श्रम मामलों में सीमित भूमिका, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के समझौतों का पालन न होना, यूनियनों की हड़ताल बुलाने की क्षमता में कमी, पंजीकरण में कठिनाइयां, यूनियन मामलों में सरकार की अधिक भूमिका आदि। लेकिन यूनियनों ने इन परिवर्तनों को समाप्त करने की मांग नहीं की है, वे केवल संहिताओं को ही नहीं चाहतीं।

यूनियनें भले ही नेक इरादे रखती हों, लेकिन वे एक अलग युग से संबंधित हैं। वे यह नहीं समझतीं कि आने वाली तकनीकी उथल-पुथल कार्यस्थलों के पूर्ण पुनर्गठन की मांग करेगी। इसके लिए हमें ऐसी यूनियनों की आवश्यकता है जो सहयोगी, लचीला और रचनात्मक कार्य वातावरण बनाने के लिए दबाव डालें। न कि वे जो बिना किसी विशिष्टता के पूर्ण समा​प्ति की मांग करें। हमें ऐसी यूनियनों की आवश्यकता है जो आर्थिक सुधारों की मांग करें ताकि श्रमिकों के लिए अधिक अवसर उत्पन्न हों, नीतियों की पहचान में मदद करें जिससे श्रमिकों को असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र में स्थानांतरित किया जा सके, और श्रमिकों के पारिश्रमिक को प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ने के बेहतर तरीके खोजें। यहां तक कि श्रमिकों की सुरक्षा और कल्याण के क्षेत्र में भी हमें यूनियनों की आवश्यकता है जो महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, श्रमिकों के लिए बेरोजगारी बीमा, कौशल विकास के अवसर आदि की मांग करें।

यूनियन भी अब केवल अपने अतीत की छाया की तरह बची हैं। अधिकांश यूनियनों के नेता श्रमिकों की सेवानिवृत्ति आयु पार कर चुके हैं और लंबे समय से नेतृत्व पदों पर बने हुए हैं। दूसरे शब्दों में, यूनियनें गतिशील लोकतांत्रिक संस्थाओं के रूप में नहीं चलाई जा रही हैं, बल्कि उनमें ठहराव आ गया है। उनके नेता श्रमिकों के हितों के बजाय अपने हित की रक्षा करने में रुचि रखते हैं।

ट्रेड यूनियनों को नए कार्य, नए कार्यकर्ता और शायद नई पूंजी की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि किसी वरिष्ठ और सम्मानित राजनेता को एक समिति का प्रमुख बनाए, जो यह देखे कि यूनियनें कैसे बेहतर काम कर सकती हैं, ताकि भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो, उत्पादकता में सुधार हो और असंगठित क्षेत्र को संगठित क्षेत्र में लाने में मदद मिले।

हमें यूनियनों के उद्देश्यों और कार्यों को आधुनिक कार्यस्थलों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना होगा। आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सही करके यूनियन पदा​धिकारियों को श्रमिकों का अधिक प्रतिनिधि बनाना होगा। कार्यकाल और सेवानिवृत्ति आयु पर सीमाएं लागू करनी होंगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि यूनियनें नए उद्देश्यों के लिए पर्याप्त वित्तपोषित हों, इसके लिए उनके वित्त का विश्लेषण कर आवश्यक होने पर बजट निधि आवंटित करनी होगी। सरकार को दो बातें सुनिश्चित करनी होंगी। पहली, श्रम संहिताओं को रद्द करने के बजाय उन्हें और सरल बनाना और दूसरा, यूनियनों की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने वाले पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्गठन करना। अगर ऐसा नहीं किया गया तो इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।


(लेखक सीएसईपी रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : February 16, 2026 | 10:23 PM IST