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पूंजी बाजार में तब से अब तक ज्यादा अंतर नहीं

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 10:30 PM IST

तीन दशक पहले औद्योगिक लाइसेंसिंग के खात्मे और व्यापार एवं विनिमय दर नीति में बदलाव वास्तव में केंद्र सरकार और निजी क्षेत्र के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव था। इस बदलाव के बाद अन्य नीतियों एवं संस्थानों में परिवर्तन की आवश्यकता पड़ी जिनमें सबसे गहन है पूंजी बाजार और वित्तीय क्षेत्र के परिचालन से जुड़े बदलाव।
वित्तीय क्षेत्र में बदलाव की बुनियाद है बजट से पूंजी बाजार को होने वाली निवेश फंडिंग में बड़ा बदलाव जहां सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) में निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की हिस्सेदारी में काफी इजाफा हुआ और वह सन 1980 के दशक के 18.9 फीसदी से बढ़कर 2019-20 में समाप्त दशक में 36.7 फीसदी हो गया। तुलनात्मक रूप से देखें तो जीएफसीएफ में सरकारी क्षेत्र की हिस्सेदारी 1980 के दशक के 50 फीसदी से घटकर 2019-20 में समाप्त दशक में 23.5 रह गई। सरकारी क्षेत्र में सरकारी उपक्रम जो निवेश में करीब आधी हिस्सेदारी रखते हैं, अब वे बाजार फंडिंग पर अधिक निर्भर हैं। जीएफसीएफ में निजी कॉर्पोरेट हिस्सेदारी बढऩे की एक और वजह बुनियादी निवेश में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी भी है। उदारीकरण के पहले के दौर में इस क्षेत्र में ज्यादातर बजट की फंडिंग वाली सरकारी योजनाएं थीं। अब निजी क्षेत्र के पास नवीकरणीय ऊर्जा की पूरी क्षमता है, ताप बिजली की करीब 40 फीसदी क्षमता उसके पास है और वह करीब 1,000 निजी-सार्वजनिक भागीदारी परियोजनाओं में शामिल है। इनमें से अधिकांश सड़क और बंदरगाह परियोजनाएं हैं। जीएफसीएफ में निजी कंपनियों की भागीदारी में इजाफे का अर्थ पूंजी बाजार के जरिये संसाधनों में बढ़ोतरी भी होना चाहिए। उदारीकरण के पहले इसके लिए पूंजी नियंत्रक की मंजूरी की जरूरत होती थी लेकिन अब यह पूरी तरह बदल चुका है। उदारीकरण के बाद नियंत्रक का पद समाप्त हो गया और निवेशक संरक्षण का दायित्व एक स्वतंत्र नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं नियामक बोर्ड (सेबी) के पास आ गया।
निजी कंपनियों द्वारा शेयर जारी करना आसान होने के कारण शेयर कारोबार भी आसान हो गया। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना के बाद स्क्रीन आधारित कारोबार और शेयरों का डिमटीरियलाइजेशन होने से उदारीकरण के पहले के अनेक कागजात पर हस्ताक्षर करने और शेयर प्रमाणपत्र जारी करने की थकाऊ प्रक्रिया से निजात मिली। सन 1993 में उदारीकरण ने म्युचुअल फंड बाजार को निजी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों के लिए खोल दिया। इस तरह के फंड केप्रबंधन वाली परिसंपत्ति सन 1990-91 के जीडीपी के 4.5 फीसदी से बढ़कर अब 16 फीसदी हो चुकी है।
परंतु शायद उदारीकरण के युग का सबसे बड़ा बदलाव वित्तीय मध्यवर्ती क्षेत्र को निजी संस्थाओं के लिए खोलने से आया। सन 1993 में बैंकिंग क्षेत्र को निजी बैंकों के लिए खोल दिया गया और कुल बैंक जमा में उनकी हिस्सेदारी उस वक्त के चार फीसदी से बढ़कर अब 30 फीसदी से अधिक हो चुकी है। इसके साथ ही गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान (आवास वित्त कंपनियां) पूंजी बाजार के अहम कारक बन गए हैं और वाणिज्यिक ऋण में उनकी हिस्सेदारी 16 फीसदी है। इसके बावजूद उदारीकरण के साथ निजी क्षेत्र के लिए वित्तीय मदद का एक और स्रोत प्रत्यक्ष विदेशी और पोर्टफोलियो निवेश के रूप में सामने आया। मौजूदा दशक में वित्तीय तंत्र दूरसंचार और इंटरनेट के प्रसार से बुरी तरह प्रभावित रहा। इस दौरान इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल भुगतान ने जोर पकड़ा।
वित्तीय तंत्र का यह विस्तार वित्तीय सेवाओं के सकल मूल्यवद्र्धन में महसूस किया जा सकता है जो 2019-20 में 10.5 लाख करोड़ रुपये रहा जो बचतकर्ताओं और निवेशकों द्वारा वित्तीय बिचौलियों को चुकाए गए शुल्क से एकत्रित हुई। यह सकल वित्तीय बचत का 25 फीसदी रहा। यही कारण हैकि आज बाजार पूंजीकरण के मामले में शीर्ष 10 में से पांच कंपनियां वित्तीय क्षेत्र की हैं।
इस क्षेत्र में स्पष्ट बदलाव आया है। परंतु सुधार का एजेंडा पूरा नहीं हुआ है। एक मसला जो दशकों से लंबित है वह है सरकारी बैंकों की स्थिति। वे भारी पैमाने पर फंसे हुए कर्ज की चपेट में हैं। इसके लिए कुछ हद तक पीपीपी परियोजनाओं में भागीदारी भी वजह है। कुछ हिस्सा दीर्घकालिक फंडिंग की वजह से भी है जो बैंकों के सामान्य ऋण से काफी अलग होती है। हमें वित्त मंत्रालय और सरकारी बैंकों के बीच दूरी की जरूरत है ताकि वे बाजार संस्थान के रूप में काम कर सकें बजाय कि विभागीय उपक्रम के।
पूंजी बाजार को कई तरह के नियमन से निजात मिली है। इसके बावजूद वाणिज्यिक परियोजनाओं को वित्तीय मदद के स्रोत के आंकड़ों की बात करें तो 2019-20 तक समाप्त होने वाले तीन वर्षों में औसतन केवल दो फीसदी वाणिज्यिक वित्त सरकारी क्षेत्र से आया। निजी क्षेत्र के जीएफसीएफ के प्रतिशत की तुलना में सरकारी इश्यू केवल दो फीसदी के बराबर जबकि निजी प्लेसमेंट की तुलना में 9 फीसदी रहा। बैंक ऋण अहम स्रोत बना रहा और ऋण में उसकी हिस्सेदारी 49 फीसदी रही। उदारीकरण के पहले के संस्थान मसलन एलआईसी, नाबार्ड और एक्जिम बैंक की हिस्सेदारी 7 फीसदी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की 16 फीसदी रही।
सरकारी इश्यू पर कम निर्भरता संभवत: पारिवारिक दबदबे वाले कॉर्पोरेट प्रबंधन ढांचे की वजह से है। पारिवारिक नियंत्रण वाले प्रबंधन नियंत्रण कम करने से हिचकते हैं। अगर भारत को बाजार आधारित अर्थव्यवस्था बनना है तो इस स्थिति को बदलना होगा। परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्थाओं में ऐसा तब हुआ जब कॉर्पोरेट स्वामित्व म्युचुअल फंड और पेंशन फंड की मदद से हुई शेयर खरीद की बदौलत विस्तारित हुआ और उन्होंने अपने क्लाइंट के हितों की रक्षा के लिए मताधिकार का प्रयोग किया। भारत में विदेशी निवेशक संस्थान ऐसा कर रहे हैं लेकिन भारतीय संस्थानों में अब तक ऐसा नहीं है।
पूंजी बाजार में सार्वजनिक इश्यू ही कॉर्पोरेट फाइनैंसिंग का जरिया है। बहरहाल, गैर कॉर्पोरेट उद्यमों और परिवारों के लिए भी संगठित व्यवस्था की जरूरत है। 2018 के एक अध्ययन के अनुसार सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के 69.3 लाख करोड़ रुपये के ऋण में केवल 10.9 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बैंकों तथा अन्य औपचारिक माध्यमों से आया। एमएसएमई को कोविड महामारी और लॉकडाउन ने भी झटका दिया। उनके लिए औपचारिक वित्तीय इंतजाम बढ़ाए जाने चाहिए।
बड़े निकायों से संबद्ध घरेलू वेंचर फंड की भी आवश्यकता है ताकि एमएसएमई, तकनीक और कारोबारी मॉडल वाले उन स्टार्टअप की मदद की जा सके जो प्राय: शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रबंधन के क्षेत्र में काम करने वाले हों। आईटी आधारित यूनिकॉर्न (जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक हो) को देखकर राह नहीं भटकनी है जहां लाखों डॉलर की फंडिंग उन विदेशी निवेशकों से होती है जो अपनी हिस्सेदारी बेचकर कमाना चाहते हैं।
व्यापक निष्कर्ष यही निकलता है कि भले ही वित्तीय बाजार और पूंजी बाजार उदारीकरण के पहले के समय से एकदम अलग हैं लेकिन व्यापकता और गहराई के मामले में वे अतीत से उतने अलग नहीं हैं जितना होना चाहिए।

First Published : December 31, 2021 | 11:20 PM IST