भारत की महाशक्ति यहां के लोग हैं। यह सच है कि हम सभी में कमियां हैं। यहां बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, नियम तोड़ने वाले, व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले, पदानुक्रम की धौंस जमाने वाले लोगों की कोई कमी नहीं हैं। मगर इन बातों के बावजूद भारतीय बहुत मेहनती हैं। बेशक, छुपी हुई बेरोजगारी मौजूद है लेकिन लोग ईमानदारी से काम करते हैं, यहां तक कि उन नौकरियों में भी जिनकी कोई जरूरत ही नहीं है (जैसे टोल बूथ पर तीन लोगों और एक हैंडहेल्ड स्कैनर की तैनाती)।
घरेलू बचत और उपभोग अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाती हैं मगर भारतीय खराब सार्वजनिक सुविधाओं और रोजमर्रा की तमाम चुनौतियों एवं असुविधाओं के बावजूद शिकायत नहीं करते हैं। वे भविष्य के बारे में बहुत आशावादी हैं जिससे ‘भविष्य को लेकर आशावाद रुख’ के मानक कमजोर पड़ जाते हैं। उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षणों में भविष्य को लेकर आशावाद रुख एक प्रमुख पहलू होता है।
देश के निम्न आय वाले युवाओं के बीच हमारे ‘ड्राइवर्स ऑफ डेस्टिनी’ सर्वेक्षण में निकल कर आया है कि वास्तविक पेशे से जुड़ी राहें और स्थिर आय वाली नौकरियों की कमी सरकार की विफलता नहीं मानी जाती है बल्कि ‘बाजार’ को इसके लिए दोषी ठहराया जाता है। इस चुनौती का जवाब देने के लिए युवा खूब मेहनत करते हैं और अधिक हुनर सीखते हैं और इसके साथ ही पहुंच से अक्सर दूर रहने वाली सरकारी नौकरी की तमन्ना साकार करने में भिड़े रहते हैं।
‘अ सिक्स्थ ऑफ ह्यूमैनिटी’ के लेखकों का कहना है कि भारत एक आत्म-जागरूक, यहां तक कि आत्म-पीड़ादायक देश है मगर हमेशा आत्म-सुधार करने वाला नहीं है। सच यह है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत की अपनी सीमाएं हैं मगर भारतीय लोग लगातार आत्म-सुधार करते हैं, भले ही यह आकांक्षाओं को समय के अनुरूप ढालना हो या लक्ष्यों के लिए समय सीमा का विस्तार करना हो या फिर एक ऐसा पोर्टफोलियो बनाना हो जो काम करे (जैसे घरेलू बजट को संतुलित करना या अपनी आवश्यकताओं से ऊपर बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देना) आदि।
राज्य को किसी न किसी मोर्चे पर लगातार आगे बढ़ने के लिए भी श्रेय दिया जाना चाहिए। नई भौतिक और भारी भरकम डिजिटल ढांचा (आंशिक रूप से दूरसंचार कंपनियों के नेतृत्व में जिन्होंने व्यापक बाजार की सेवा करने का विकल्प चुना है) और एक आधुनिक एवं विस्तारित कल्याणकारी व्यवस्था (जो अधिक व्यक्तिगत गरिमा, ई-गवर्नमेंट सेवाएं प्रदान करता है) ये सब एक पीढ़ी से भी कम समय में हासिल किए गए हैं। यहां तक कि शिक्षा के स्तरों पर हुए बदलाव भी महत्त्वपूर्ण रहे हैं।
लगातार आर्थिक वृद्धि के दम पर इन सबने अब एक ऐसे समूह को जन्म दिया है जो विशेष ध्यान देने योग्य है। यह ऐसा समूह (हैव-सम्स) है जिसके पास कुछ सुविधाएं एवं संसाधन मौजूद है। इसमें सबसे गरीब 20 फीसदी से ऊपर 20 से 30 फीसदी परिवार शामिल हैं और अपनी प्रगति तेज करने और भारत की आर्थिक तरक्की में मदद सहायता करने के लिए तैयार हैं। इनकी समझदारी, सीखने की क्षमता, ऊर्जा और जीवन स्थितियों में सुधार के लिए अथक प्रयास स्पष्ट नजर आ रहे हैं।
भारत के सामाजिक आर्थिक पिरामिड का शीर्ष आधा भाग बाजार अर्थव्यवस्था में अच्छी तरह से एकीकृत है और इसमें मध्यम वर्ग की कई श्रेणियां हैं। सबसे गरीब 20 फीसदी का कल्याण सरकार का लक्ष्य है ताकि उन्हें उनकी लगातार गरीबी के दलदल से निकाला जा सके। इस समूह के लोग अपना वजूद लगातार मजबूत कर रहे हैं और जीवन में प्रगति की राह पर हैं।
इसका संकेत सबसे निचले स्तर से 20 फीसदी और उसके बाद 20 फीसदी (एचसीईएस डेटा) के बीच संपत्ति के स्वामित्व में दिखा उछाल है। शहरी (यू) और ग्रामीण (आर) हिस्से के लिहाज से प्रतिशत अंक में यह उछाल इस प्रकार है: टीवी के लिए 25यू / 17आर, दोपहिया वाहनों के लिए 14यू / 14आर, रेफ्रिजरेटर के लिए 28यू / 11आर (अंतिम उत्पादकता- और बचत-सुधार वस्तुएं), वाशिंग मशीन के लिए 5यू / 3आर, और पक्के आवास के लिए 27यू / 20आर।
आय के अनुसार शिक्षा के स्तर पर हालिया आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं मगर कॉलेजों में नामांकन में बढ़ोतरी के आधिकारिक आंकड़े जो बताते हैं (महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर है) वे इस समूह की अगली पीढ़ी (जेन-नेक्स्ट) से हैं। इनके माता-पिता बच्चों को जीवन के उच्च कक्षा में ले जाने के लिए शिक्षा को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। आय में योगदान देने वाले के रूप में महिलाओं का महत्त्व इस समूह में अधिक है और घरेलू आय बढ़ने पर यह कम हो जाता है। इस समूह में सूक्ष्म उद्यमी और स्व-रोजगार करने वाले भी हैं जो पूर्व की तुलना में उच्च स्तर की स्कूली शिक्षा रखते हैं। डिजिटल साक्षरता और एक नई व्यावसायिक समझ से बहुत सहायता मिलती है। हम उन्हें शहरी भारत में अधिक देखते हैं जहां अवसर अधिक मौजूद हैं।
इनमें डॉग वॉकर हैं जो अतिरिक्त शुल्क पर सेवाओं की पेशकश कर अपने ग्राहक तैयार करते हैं। वे दर्जी भी इसी में आते हैं जो किसी भी चीज को विशिष्टताओं के अनुसार बदल सकते हैं। कई व्यंजन बनाने की कला सीख कर पारंगत गिग वर्किंग कुक, नए फैशन एवं सौंदर्य ज्ञान से लैस ब्यूटीशियन और डिलीवरी करने वाले लोग भी इसी समूह में आते हैं। लोगों के घरों तक सामान पहुंचाने वाले ये लोग व्हाट्सऐप और दोस्तों के संपर्क सूत्र के साथ अलग से स्वयं ‘मिनी सेवाएं’ चलाते हैं।
यहां तक कि ग्रामीण भारत में भी (जैसा आंकड़े दिखाते हैं) यह समूह अस्थायी श्रम को स्व-रोजगार कार्य या सूक्ष्म व्यवसाय में तब्दील कर रहा है। उन्हें यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि क्या करना है। उन्हें सरकार द्वारा संचालित कौशल सुधार कार्यक्रम या फिर व्यवसाय शिक्षा कार्यक्रम या सरकार द्वारा बनाए गए बाजार प्लेटफॉर्म की भी दरकार नहीं है। उन्होंने इसे खुद ही सब समझ लिया है और उनकी मांग को पूरा करने वाली एक छोटी और अलग-अलग व्यवस्था मौजूद है। उन्हें जिस चीज की जरूरत है वह है वित्तीय सक्षम बनना जो इस तेजी से बदलती दुनिया में जरूरी है।
निरंतर शिक्षा के लिए ऋण (क्योंकि उन्हें लगातार कौशल बढ़ाने की आवश्यकता होती है), अधिक उत्पादकता के लिए टिकाऊ वस्तुएं, बार-बार छोटी किस्तों में घर की मरम्मत के ऋण आदि की उपलब्धता उनके लिए जरूरी है। बेहतर सार्वजनिक परिवहन, अधिक सुविधाएं, बेहतर भौतिक ढांचा बचत खर्च में कमी करने वाले और उत्पादकता बढ़ाने वाले होते हैं जो अंततः कमाई में इजाफा करते हैं। वास्तविक और छद्म मध्य वर्गों ने अब तक भारत की आर्थिक तरक्की को शक्ति दी है। अब ‘मध्य भारत’ वह समूह बन गया है जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
(लेखिका ग्राहक-आधारित कारोबार रणनीति के क्षेत्र में व्यवसाय सलाहकार हैं।)