भारत ने गुरुवार को टीकाकरण के क्षेत्र में एक अहम मुकाम हासिल करते हुए देश भर में टीके की एक अरब खुराक लगा लीं। टीकाकरण की देर से हुई शुरुआत और टीकों की खरीद और आपूर्ति को लेकर तमाम शुरुआती दिक्कतों के बाद पिछले कुछ महीनों में जिस गति से टीकाकरण हुआ है वह निस्संदेह एक ऐसी उपलब्धि है जिस पर स्वास्थ्यकर्मियों, केंद्र और राज्य सरकारों तथा टीका निर्माता सभी गर्व कर सकते हैं। एक मसला जो बरकरार है वह यह कि टीकों की जितनी खुराक लग चुकी हैं, सुरक्षा उतनी मजबूत नहीं हो सकी है। इसका कारण यह है कि तीन चौथाई वयस्क आबादी को टीके की कम से कम एक खुराक लग गई है लेकिन केवल 30 फीसदी वयस्कों को ही दोनों खुराक लगी हैं। जबकि परीक्षणों और आंकड़ों के अनुसार टीके की दोनों खुराक ही समुचित सुरक्षा मुहैया कराती हैं। खासतौर पर कोविड-19 के डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ।
आने वाले महीनों में दो खुराक लेने वालों की तादाद तेजी से बढऩे की आशा है क्योंकि जिन लोगों ने गर्मियों में टीकाकरण कराया था, उनकी दूसरी खुराक लेने की तारीख करीब आ रही होगी। टीकों की तादाद तथा कुल सुरक्षित लोगों के बीच इस अंतर के लिए सरकार का वह निर्णय भी उत्तरदायी है जिसके तहत उसने एस्ट्राजेनेका/कोविशील्ड टीके की दो खुराकों के बीच का अंतराल बढ़ा दिया था। टीकाकारण तेज होने से आर्थिक गतिविधियां शुरू करने और अर्थव्यवस्था में हालात बहाल करने में मदद मिली है। इस गति को बरकरार रखना होगा और आने वाले दिनों में इसमें और तेजी लाने का प्रयास होना चाहिए। जानकारी के मुताबिक राज्य सरकारों के पास अब सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा बनाए जा रहे कोविशील्ड टीके का पर्याप्त भंडार मौजूद है। सीरम इंस्टीट्यूट ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई है और अब वह हर महीने टीके की 22 करोड़ खुराक तैयार कर सकती है। इस समय रोज करीब 50 लाख टीके लगाए जा रहे हैं हालांकि यह आंकड़ा इस वर्ष के अंत तक टीका लगवाने में सक्षम सभी भारतीयों का टीकाकरण करने के सरकार के लक्ष्य को देखते हुए अभी भी कम ही है।
इसके बावजूद फिलहाल अधिक आश्वस्त होना सही नहीं। यह सही है कि 90 फीसदी खुराक में कोविशील्ड टीके का इस्तेमाल किया गया है लेकिन देश के कई हिस्सों में भारत बायोटेक की कोवैक्सीन का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। ओडिशा में भुवनेश्वर इसका उदाहरण है।
वैज्ञानिक इस बात को लेकर अभी भी चिंतित हैं कि कोवैक्सीन के तीसरे चरण के पूरे परीक्षण के आंकड़े साझा नहीं किए गए हैं। चूंकि एक तिहाई वयस्क अभी तक टीकाकृत नहीं हैं, ऐसे में देश में ऐसे भी तमाम हिस्से हैं जहां अगर कोविड महामारी पुन: फैली तो बहुत बड़ी तादाद में लोगों को अस्पताल में दाखिल होना पड़ सकता है और उनकी मृत्यु भी हो सकती है। हमें इस मुकाम तक पहुंचने की कीमत भी चुकानी पड़ी है। दूसरी लहर के शुरू होने पर टीकों का निर्यात बंद करना पड़ा। इससे अनेक विकासशील देशों को मुश्किल का सामना करना पड़ा क्योंकि वे वादे के मुताबिक टीकों की प्रतीक्षा कर रहे थे।
सरकार को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि लोग टीके की दूसरी खुराक लगवाने पहुंचें। ग्रामीण इलाकों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि पहली खुराक लगाने के बाद लोग सार्वजनिक सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में उन्हें दूसरी खुराक की जरूरत नहीं महसूस हो रही। इसके लिए आवश्यक प्रचार प्रसार की जरूरत है। इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जरूरत पडऩे पर बूस्टर खुराक भी दी जानी चाहिए। सरकार को बच्चों का टीकाकरण करने के दबाव में नहीं आना चाहिए। ऐसा तभी हो जब टीकों के सुरक्षित होने को लेकर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो।