इलेस्ट्रेशन- अजय कुमार मोहंती
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को देश में राजनीतिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। कहा जा रहा है कि इस समझौते के जरिये राष्ट्रीय हित का ‘पूर्ण समर्पण’ कर दिया गया है। किसानों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों ने भारत को चेतावनी दी कि भारत रूसी तेल खरीद बंद कर रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता कर रहा है।
यह व्यापारिक नजरिया सही नहीं है कि निर्यात पुरस्कार है और आयात एक तरह की कीमत जो अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है। बुनियादी स्तर पर देखें तो अंतरराष्ट्रीय कारोबार में पुरस्कार है आयात यानी विदेश से होने वाली खरीद और भारतीय कंपनियों की उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि। हर व्यापार समझौते का मूल्य इस बात से आंका जाता है कि उससे भारतीय व्यापार गतिरोध में क्या कमी आएगी?
मध्यवर्ती वस्तुओं और मशीनरी पर ऊंचा शुल्क भारतीय कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ाने वाला है। गैर सक्षम घरेलू क्षेत्रों को संरक्षण देकर हम अप्रत्यक्ष रूप से सक्षम कंपनियों पर कर लगाते हैं। उदारीकरण को ‘समर्पण’बताने वाली धारणा में यह माना जाता है कि यथास्थिति ही सबसे बेहतर थी। यह सच नहीं है।
यथास्थिति की काफी ऊंची कीमत चुकानी होती है। कम प्रतिस्पर्धा वाला माहौल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण की प्रक्रिया को बाधित करता है और देश की आर्थिक वृद्धि को भी। अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं पर शुल्क समाप्त करने या घटाने की प्रतिबद्धता उत्पादकता को झकझोरने वाला है। जब भारतीय निर्माता अमेरिका से उच्च-प्रौद्योगिकी मशीनरी, मध्यवर्ती इनपुट और घटक बिना अत्यधिक शुल्क की रुकावट के आयात कर सकते हैं, तो उनकी लागत कम हो जाती है।
अर्थशास्त्रियों के एक सिद्धांत के अनुसार आयात पर कर वास्तव में निर्यात पर कर के समान है। आयात बाधाओं को कम करके हम भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सुधार रहे हैं। इससे भारतीय श्रम और पूंजी का आवंटन गैर-प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों से हटकर उन क्षेत्रों में होता है जिसमें भारत वास्तव में अच्छा है, और इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि होती है।
खाद्य पदार्थों पर शुल्क प्रतिग्रामी है। इसका असमान रूप से असर गरीबों पर पड़ता है। ये लोग भोजन के शुद्ध खरीदार होते हैं। राजनीतिक विचारकों को भूस्वामी किसान परिवारों के समूह के आकार की तुलना उन गरीब लोगों की संख्या से करनी चाहिए जो भोजन खरीदते हैं। खाद्य शुल्क बड़े भू-स्वामित्व को उसी तरह लाभ पहुंचाते हैं जैसे कच्चे माल पर सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य करते हैं। गरीबों के लिए बेहतर पोषण से मिलने वाले सकारात्मक बाह्य प्रभावों का पूरा तर्क खाद्य व्यापार बाधाओं को कम करने से मिलने वाले लाभों में बदल जाता है। अब जो समस्या सामने आएगी वह है श्रेष्ठ आर्थिक ज्ञान (मसलन तीन हालिया व्यापार समझौतों यानी अमेरिका,यूरोपीय संघ और ब्रिटेन मेंं) और बहुपक्षीय स्तर पर लागू पुराने भारतीय समाजवाद के बीच असंगति।
भारत लंबे समय से विश्व व्यापार संगठन में फंसा रहा है। विश्व व्यापार समझौते यानी डब्ल्यूटीए में विकास हेतु निवेश सुविधा (आईएफडी) समझौते पर विचार कीजिए। इस पहल का उद्देश्य निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाना और पारदर्शिता में सुधार करना है। फिर भी,भारत ने इसे अपनाने पर रोक लगा दी है। इसी समय, अमेरिका के साथ संयुक्त वक्तव्य भारत की पूंजी और प्रौद्योगिकी आकर्षित करने की मंशा को उजागर करता है, जिसमें ऊर्जा,विमान और प्रौद्योगिकी उत्पादों सहित 500 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान खरीदने की इच्छा भी शामिल है। द्विपक्षीय स्तर पर सक्रिय रूप से निवेश आमंत्रित करना, जबकि बहुपक्षीय स्तर पर संरचनात्मक रूप से निवेश सुविधा का विरोध करना, असंगत है।
डिजिटल क्षेत्र में भी ऐसा ही पाखंड है। द्विपक्षीय समझौता संवेदनशील तकनीक, ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट्स और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस अधोसंरचना आदि के क्षेत्र में सहयोग पर जोर देता है। दूसरी तरफ, डब्ल्यूटीओ में भारत लगातार इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क के स्थायी स्थगन को अपनाने का विरोध करता रहता है। हम डिजिटल अर्थव्यवस्था का हार्डवेयर यानी डेटा-सेंटर उपकरण और चिप्स आयात करना चाहते हैं, जबकि उस सॉफ्टवेयर और डेटा प्रवाह पर कर लगाने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं जो हार्डवेयर को उपयोगी बनाता है।
वर्तमान समझौता एक अंतरिम समझौता है। इसमें बहुत सारे इरादे शामिल हैं लेकिन वे कानूनी बाध्यताएं नहीं हैं। ट्रंप के दौर में यह जोखिम भरा हो सकता है। इसके अलावा, हमें इस पर अधिक सोचना होगा कि किसके पास किस पर नियंत्रण है। पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता केंद्रीय नियोजन की ओर वापसी है। सरकारें सामान नहीं खरीदते, कंपनियां खरीदती हैं। हम यह आशा ही कर सकते हैं कि अधिकारी खरीद लक्ष्य निर्धारित न करें।
गैर शुल्क बाधाओं पर दृष्टिकोण को विकसित करने की आवश्यकता है। वर्तमान प्रतिबद्धता चिकित्सा उपकरणों और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में मानकों और परीक्षण आवश्यकताओं पर केवल छह माह की समीक्षा के लिए है। समीक्षा सुधार नहीं है। एक उच्च-गुणवत्ता वाला द्विपक्षीय व्यापार समझौता नियामक सामंजस्य के लिए विशिष्ट समयसीमा वाली बाध्यकारी व्यवस्था की मांग करता है। चिकित्सा उपकरणों या उच्च-स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक्स के व्यापार में टकराव का बिंदु अक्सर शुल्क नहीं होता, बल्कि मनमाने परीक्षण और प्रमाणन मानक होते हैं,जो वास्तविक संरक्षणवाद और कानून के शासन की अनुपस्थिति के रूप में कार्य करते हैं।
इसी तरह, डिजिटल अर्थव्यवस्था को केवल अस्पष्ट सहयोग से अधिक की आवश्यकता है। भारत ने डिजिटल व्यापार पर नियमों को लेकर वार्ता करने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन अभी तक सीमा-पार डेटा प्रवाह या अनिवार्य सोर्स कोड खुलासे पर बाध्यकारी प्रावधानों पर सहमति नहीं दी है। आधुनिक मुक्त व्यापार समझौते में, जैसे यूएस-मेक्सिको-कनाडा समझौता,ये मानक स्तंभ हैं।
इनके बिना तकनीकी साझेदारी घरेलू नियामक मनमानी और ट्रंप की अप्रत्याशित प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयों के प्रति असुरक्षित रहती है। स्रोत के नियमों को लेकर भी कई बाधाएं हैं। जैसे-जैसे आपूर्ति श्रृंखलाएं चीन से अलग होती हैं, अमेरिका घुसपैठ करने वाली जांच की मांग करेगा। इससे भारतीय कंपनियों को उस पारदर्शिता और अनुपालन को स्वीकार करना होगा जो वे सामान्यतः नहीं करतीं। इसे लागू करने के लिए राज्य की क्षमता आवश्यक होगी। सत्यापन प्रक्रिया इंस्पेक्टर राज का अगला दौर नहीं बननी चाहिए, जिसमें विलंब, अनुपालन लागत और भ्रष्टाचार शामिल हों।
यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ एफटीए और अमेरिका के साथ व्यापार समझौता मिलकर भारतीय उदारीकरण की एक अच्छी लहर निर्मित कर सकते हैं। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ समझौते जिस मैत्रीपूर्ण राजनीतिक वातावरण में किए गए हैं, उन्हें वास्तविक गहन समझौतों में बदलना आवश्यक है। हमें अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि के दस्तावेज पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें भारतीय व्यापार बाधाओं का उल्लेख है।
भारत के लिए यह आधुनिक व्यापार अर्थशास्त्र का ज्ञान है, जो भारतीय संरक्षणवाद का विश्लेषण और दस्तावेजीकरण करता है। यह लगातार बनी हुई एक समस्या है, जो ट्रंप की अगली प्रतिक्रिया को जन्म दे सकती है। भारत में हमें इस दस्तावेज को एक लक्ष्य की तरह लेना चाहिए, जिस पर निशाना साधकर भारत की आर्थिक नीति का आधुनिकीकरण किया जा सके।
इस दस्तावेज में कौन-कौन से बदलाव आवश्यक हैं ताकि यह एक ऐसे भारत को दर्शाए जो परिष्कृत व्यापार नीति रखता है? ऐसा करने से हमें दोहरा लाभ मिलेगा। पहला, हम अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव को कम करेंगे। दूसरा, हम बेहतर भारतीय जीडीपी वृद्धि की नींव रखेंगे।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम के शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)