प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
बाउंस्ड चेक सुनकर ज्यादातर लोग सोचते हैं कि बस बैंक में थोड़ी सी परेशानी है। लेकिन सच ये है कि अगर इसे अनदेखा कर दिया तो ये नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 के सेक्शन 138 के तहत आपराधिक केस बन सकता है।
एक्सपर्ट्स की मानें तो ऐसे मामलों में जेल जाना बहुत कम होता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रतीक झा बताते हैं कि ज्यादातर केस तब खत्म हो जाते हैं जब चेक देने वाला व्यक्ति 15 दिनों के अंदर पूरा पैसा चुका देता है। कोर्ट में ऐसे हजारों मामले आते हैं और ज्यादातर पैसे चुकाने से सेटल हो जाते हैं। जेल तब होती है जब कोई बार-बार चेक बाउंस करे या जानबूझकर टालमटोल करे।
Aeddhaas Legal LLP के पार्टनर यथार्थ रोहिला इसे ‘क्वासी-क्रिमिनल’ कहते हैं। यानी ये मूल रूप से सिविल मसला है, लेकिन पेमेंट की सख्ती बनाए रखने के लिए इसे क्रिमिनल बना दिया गया है। अगर कोई छोटी-मोटी तकनीकी गलती हो तो आरोपी बच सकता है, लेकिन अगर डॉक्यूमेंट सारे हो तो सजा भी मिल सकती है।
SKV Law Offices की वकील प्रिया धनखड़ कहती हैं कि चेक जारी होना, बाउंस होना और लीगल नोटिस मिलना साबित हो जाए तो कोर्ट अक्सर दोषी ठहराने की तरफ बढ़ता है। फिर भी जेल बहुत कम होती है। ज्यादातर मामलों में कंपेंसेशन ही होता है।
दिल्ली हाई कोर्ट के वकील साई तेजा के मुताबिक, अगर कोई जानबूझकर धोखा दे, बार-बार चेक बाउंस करे या देरी करने की कोशिश करे तो कोर्ट ज्यादा सख्त हो जाता है। PSL Advocates & Solicitors के पार्टनर विपुल जय कहते हैं कि आदतन डिफॉल्ट करने वाले, बड़ी रकम के चेक या जानबूझकर स्टॉप-पेमेंट करने वालों पर कोर्ट की नजर ज्यादा रहती है।
नोटिस मिलने के बाद 15 दिन में पेमेंट कर देना सबसे बड़ा सबक है। प्रतीक झा कहते हैं कि कई लोग इसे बस दबाव बनाने की तरकीब समझते हैं, लेकिन इस दौरान पैसा चुकाने से पूरा झगड़ा खत्म हो सकता है। यथार्थ रोहिला चेताते हैं कि पेमेंट न करने पर चेक की रकम से दोगुना तक क्लेम हो सकता है, साथ में ब्याज और कोर्ट के खर्चे भी जुड़ जाते हैं।
प्रिया धनखड़ बताती हैं कि व्हाट्सएप पर भी अगर कोई बात मान ले तो डिफेंस कमजोर पड़ जाता है। Accord Juris के अलाय रजवी कहते हैं कि चुप रहने से मामला बढ़ता है, समन आता है और फिर कोर्ट के जरिए दबाव बन सकता है।
Also Read: बैंकों ने फंड जुटाने के लिए झोंकी ताकत: फरवरी के महज 10 दिनों में जारी किए ₹1.21 लाख करोड़ के सीडी
ऐसे मामले में कोर्ट के अलावा बैंक भी सख्त हो जाते हैं। प्रतीक झा के अनुसार बैंक चेक बुक बंद कर सकते हैं या अकाउंट को फ्लैग कर सकते हैं। अलाय रजवी बताते हैं कि हर बाउंस पर 500 से 1000 रुपये तक पेनल्टी लगती है और बार-बार होने पर सुविधाएं रोक दी जाती हैं।
प्रिया धनखड़ कहती हैं कि चेक बाउंस अपने आप क्रेडिट ब्यूरो में रिपोर्ट नहीं होता। लेकिन अगर ये लोन की EMI का चेक हो तो मिस्ड पेमेंट से क्रेडिट स्कोर गिर सकता है। यथार्थ रोहिला और विपुल जय दोनों मानते हैं कि EMI चेक बाउंस होने से आगे लोन लेना मुश्किल हो जाता है।
तारीख आने के बाद पोस्ट-डेटेड चेक बिल्कुल आम चेक की तरह माना जाता है। प्रिया धनखड़ कहती हैं कि यह पूरी तरह कानूनी रूप से वैध होता है। विपुल जय के मुताबिक, अगर तारीख के बाद चेक बाउंस हो जाए और पीछे कोई वैध कर्ज हो, तो सेक्शन 138 लागू हो सकता है।
यथार्थ रोहिला बताते हैं कि कानून यह मानकर चलता है कि साइन किया हुआ चेक किसी वैध देनदारी के लिए ही दिया गया है। वहीं विपुल जय कहते हैं कि अगर चेक पर ‘सिक्योरिटी’ भी लिखा हो, तब भी जिम्मेदारी बन सकती है, बशर्ते असली भुगतान की देनदारी तय हो चुकी हो।
कुल मिलाकर एक्सपर्ट्स की साफ सलाह है कि बाउंस्ड चेक को हल्के में लेना बड़ी गलती हो सकती है।