किराना दुकानें एक ऐसी प्रजाति हैं जो सन 1991 के बाद उभरे नए खुदरा कारोबारी स्वरूपों से मिल रही तमाम चुनौतियों के बीच भी फलती-फूलती रही हैं। लेकिन अब क्विक कॉमर्स के उभार के साथ उनको असली चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। फ्लिपकार्ट मिनट्स जो इस क्षेत्र में सबसे नया प्रवेशकर्ता है उसका कहना है कि वह इसे छोटे शहरों तक ले जाएगा और अन्य शायद उसका अनुसरण करेंगे।
क्विक कॉमर्स पुरानी किराना दुकानों का ही कहीं अधिक ताकतवर स्वरूप है। अपने अच्छे दिनों में किराना दुकानें ही भारत में क्विक कॉमर्स की रीढ़ की तरह थीं। वे हमारे पास-पड़ोस में और घर के आसपास ही मौजूद रहतीं और केवल एक फोन कॉल पर ऑर्डर हमारे घर पहुंचा दिया करती थीं। आप किसी को दुकान भेजकर 10 मिनट से भी कम समय में सामान मंगवा सकते थे। ये किराना दुकानदार ग्राहकों से एक खास किस्म के रिश्ते में बंधे रहते थे।
उन दिनों मेरा नियमित किराना दुकान मालिक मुझे फोन करके पूछता था कि क्या मैं कहीं और से खरीद रहा हूं, क्योंकि उसने देखा कि मेरी खरीदारी में पांच महंगे खाद्य पदार्थ गायब थे (दरअसल मेरा एक बच्चा कॉलेज के लिए घर छोड़ चुका था)। उसने मुझे उधार की सुविधा दी, मेरी दुर्लभ लेकिन पसंदीदा चाय ब्रांड के दो पैक सुरक्षित रखे। अगर मैं सतर्क नहीं रहती तो वह हर मौके पर मुझसे अतिरिक्त कमाई करने की कोशिश करता था, फिर भी हमारे बीच गहरा रिश्ता था।
पिछले 20 वर्षों में अचल संपत्ति कीमतों में तेजी आई और इसके चलते किराना दुकानें उच्च आय वाले प्रमुख इलाकों से बाहर हो गईं। इससे उनकी आपूर्ति सेवा प्रभावित हुई। जैसे-जैसे नए ब्रांड बढ़े कार्यशील पूंजी की जरूरत भी बढ़ी। बड़े किराना स्टोर आधुनिक होने लगे, बड़ी कंपनियों द्वारा उन्हें अपने डिजिटल वितरण नेटवर्क में खींचा गया और उन्हें डेटा व ग्राहक प्रबंधन उपकरण दिए गए। हालांकि उनकी ग्राहक सेवा कमजोर पड़ने लगी। उनका कारोबारी मॉडल इस पर आधारित था कि मालिक दुकान में बैठा रहे लेकिन अगली पीढ़ी ऐसा करने को तैयार नहीं है।
क्विक कॉमर्स इसका फायदा उठाने के लिए सामने आया। उन्होंने एक जाने पहचाने काम को करने का एक नया और बेहतर तरीका पेश किया। क्विक कॉमर्स ताजा फल-सब्जी, कुछ टिकाऊ सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स, सभी चीजें उपलब्ध कराता है। ये ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें किराना दुकान नहीं संभाल सकतीं। इसके अलावा वे बहुत तेजी से सामान पहुंचाकर एक विशिष्ट अनुभव प्रदान करते हैं। पश्चिम के सुपर मार्केट जैसे आधुनिक व्यापार के उलट क्विक कॉमर्स ग्राहकों से यह अपेक्षा नहीं करता कि वे स्टोर पर जाएं, लेबल लगे गलियारों के बीच से रास्ता निकालें और बिल भुगतान के लिए कतार लगाकर खड़े हों।
लेकिन ग्राहक ने इस आधुनिकता का मूल्य किराना से भी बदतर माना। आधुनिक व्यापार का आर्थिक मॉडल (बड़े पैमाने पर काम करों, सस्ता खरीदो और सस्ता बेचो) भारत में अच्छी तरह काम नहीं कर पाया क्योंकि मांग की विविधता और अचल संपत्ति की लागत बहुत अधिक थी। भारत के लिए विशेष रूप से बनाई गई अवधारणाओं जैसे बिग बाजार आदि ने थोड़ी पकड़ बनाई लेकिन वे पैमाने को सहारा देने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
क्विक कॉमर्स की ताकत उसका काफी सक्षम और पूरी तरह डिजिटल अंतिम छोर समर्थन है। सैद्धांतिक रूप से यह पैमाने और समझदारी भरे उत्पाद मिश्रण प्रबंधन के साथ आय अर्जित करेगा। हमने बार-बार देखा है कि भारतीय बाजार अन्य बाजारों की तरह विकसित नहीं होते।
भारत के उपभोक्ता बाजार का सबसे बड़ा आकर्षण वे उत्पाद हैं जो बेहतर कार्यक्षमता प्रदान करते हैं। अन्य देशों में जो पैकेट बंद खाद्य क्रांति आई थी वह यहां नहीं आई। एमेजॉन इंटरनेट पर एक बड़े पारंपरिक बाजार का कहीं अधिक बेहतर स्वरूप देता है। क्विक कॉमर्स इस बात को स्वीकार करता है कि हम कितने असंगठित हैं।
भारत की विशालता और क्विक कॉमर्स कंपनियों की रणनीतिक पसंद के कारण किराना दुकानें बनी रहेंगी। हालांकि, कई दुकानें बंद हो जाएंगी और अन्य व्यवसायों की ओर मुड़ेंगी खासकर जब संपन्न उपभोक्ता दूर चले जाएंगे। आज जो नए, रोमांचक और छोटी चुनौती देने वाले ब्रांड्स उभर रहे हैं वे किराना दुकानों के जरिये व्यापक वितरण का कठिन रास्ता नहीं अपना रहे। इसके बजाय वे क्विक कॉमर्स द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे अपेक्षाकृत संपन्न और बढ़ते उपभोक्ता वर्ग पर ही ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
हमारा विशाल उपभोक्ता भारत अब और भी अधिक विशाल और ताकतवर हो गया है मानो उसे और ऊर्जा मिल गई हो। 1990 के दशक के उदारीकरण के पहले चरण में कीमतें घटीं और गुणवत्ता बढ़ी क्योंकि कर कम हुए और प्रतिस्पर्धा बढ़ी। उसके बाद आए चीनी उत्पादों ने बेहतर कीमत-प्रदर्शन अनुपात और रोजमर्रा के कई नए उत्पाद दिए जो पहले देखने को नहीं मिले थे। फिर आया एमेजॉन जो अपने विशाल उत्पाद-संग्रह, कीमतों और किसी भी नापसंद चीज को लौटाने की सुविधा के कारण अलग दिखा। और अब आया है क्विक कॉमर्स।
भले ही अंततः क्विक कॉमर्स पर कुछ हद तक लगाम लग जाए लेकिन ऐसा होगा तो इसलिए कि आपूर्तिकर्ताओं में विस्तार के लंबे दौर तक टिके रहने की क्षमता या धैर्य की कमी पड़ जाए या वे अपने कारोबार को अधिक लाभांश और बड़े टिकट आकार वाले उत्पादों की ओर मोड़ दें। उपभोक्ता भारत बहुत दिलचस्प तरीकों से छलांग लगाता है। वह विकास के उन कई चरणों को छोड़ देता है, जिनसे दूसरे बाजार गुजरे हैं। यदि आप उसे ऐसा मूल्य दें जिसे ग्राहक वास्तव में बेहतर माने और उससे यह अपेक्षा न करें कि वह अपनी आदतें या तौर-तरीके बदले तो आपकी सफलता तय है।