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कांग्रेस से कैसे छूटा राष्ट्रवाद का मुद्दा? 2014 के बाद की रणनीति पर पुनर्विचार

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कांग्रेस द्वारा राष्ट्रवाद को त्याग देना 2014 के बाद की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू है। वास्तविक कांग्रेस कभी भी भावुक उदारवादियों का दल नहीं रही है

Last Updated- July 05, 2026 | 10:01 PM IST
Congress
लोकसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी। फोटो: पीटीआई

राष्ट्रीय राजनीति में चल रहे मंथन के दो पहलू हैं और चिंता मत कीजिए मैं मंत्रिमंडल के संभावित विस्तार के बारे में बात नहीं कर रहा हूं। यह काम राजधानी के कमोबेश बेरोजगार अंदरूनी जानकारी वाले ज्ञानी लोगों के लिए छोड़ता हूं। मेरी रुचि दो ऐसी बातों में है जो विरोधाभासी नजर आती हैं लेकिन हैं नहीं। पहली बात यह कि भाजपा ने एक ऐसा राजनीतिक चमत्कार किया है कि वह लोक सभा में बहुमत से दूर रहने के बावजूद भारत को लगभग एकदलीय देश बनाने में कामयाब दिख रही है।

दूसरा चूंकि इसके लिए बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय दलों में विभाजन, उन्हें साथ लेने या नष्ट करने का सहारा लिया जा रहा है इसलिए कांग्रेस देश में इकलौता ऐसा विपक्ष है जो अक्ष्क्षुण है। ऐसे में भारतीय राजनीति द्विदलीय भी नजर आती है। यह एकदम सहज और सरल समीकरण होता अगर कांग्रेस एक मजबूत चुनौती नजर आती। ऐसी दो दलीय व्यवस्था भाजपा को रास आएगी क्योंकि उसे केवल मजबूत क्षेत्रीय दलों के सामने ही संघर्ष करना पड़ता है। उनमें से अधिकांश को उसने नष्ट कर दिया है और अब अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती है।

यहां तीन सवाल पैदा होते हैं। पहला, मोदी-शाह की भाजपा कांग्रेस को इतना सहज प्रतिद्वंद्वी क्यों मानती है? दूसरा, कांग्रेस में क्या कमी है कि वह विश्वसनीय चुनौती नहीं बन पा रही? और तीसरा, कांग्रेस खुद को कैसे खड़ा कर सकती है?

पहले सवाल का जवाब आसान है: भाजपा चार इंजनों के सहारे आगे बढ़ रही है: कट्टर हिंदुत्व, उससे भी कट्टर राष्ट्रवाद, सक्षम और निष्पक्ष जनकल्याण और जबरदस्त अधोसंरचना विकास जो सबको नजर आ रहा है। कांग्रेस के पास इसकी विश्वसनीय काट नहीं है। और दूसरे सवाल का जवाब इसी में निहित है। कांग्रेस के मुताबिक अगर भाजपा सब कुछ गलत कर रही है तो आखिर वह सत्ता में आकर क्या करेगी?

अर्थव्यवस्था, सामरिक मुद्दों और रक्षा मामलों पर कांग्रेस का रुख भाजपा से अलग कैसे होगा? वह चीन, अमेरिका और पश्चिम एशिया से कैसे निपटेगी? रक्षा पर वह कितना खर्च करेगी? बीजेपी के विकल्प के रूप में इसका नजरिया क्या है? यह कहना कि बीजेपी ‘भ्रष्ट, विकृत पूंजीवादी है और राष्ट्रीय हित से समझौता कर रही है’ राजनीतिक बयानबाजी के लिए तो ठीक है लेकिन आप अलग क्या करेंगे? यदि कांग्रेस खुद को एक विकल्प मानती है और चाहती है कि मतदाता भाजपा पर उसे तरजीह दें तो उसे बताना होगा कि वह भाजपा से अलग कैसे है? कांग्रेस को पहले इन सवालों का जवाब देना होगा। और फिर उन चार इंजनों का मुकाबला करना होगा जिनके बारे में हमने कहा था कि वे भाजपा के वाहन को चला रहे हैं।

पहला, हिंदुत्व। कांग्रेस को यहां भाजपा से होड़ करने की बात सोचनी भी नहीं चाहिए। यह भाजपा का ऐसा क्षेत्र है जहां कांग्रेस सेंध नहीं लगा सकती। भले ही उसका शीर्ष नेतृत्व कितने ही मंदिरों का भ्रमण क्यों न कर ले? यहां तक कि शिवसेना ने भी हार मान ली। उद्धव ठाकरे ने एक बार दार्शनिक अंदाज में मुझसे कहा था कि बाला साहेब (उनके पिता) ने महाराष्ट्रवाद से हिंदूवाद की ओर रुख करके गलती की थी। इसलिए क्योंकि इससे नरेंद्र मोदी को शिवसेना के क्षेत्र में घुसने और उस पर कब्जा करने का अवसर मिल गया।

कल्याणकारी योजनाओं पर कांग्रेस दुनिया भर के वादे कर सकती है। उसने यह कर्नाटक और तेलंगाना में सफलतापूर्वक किया है। लेकिन अधोसंरचना के क्षेत्र में उसे समस्या होगी। इन वर्षों में उसने बहुत सी बड़ी परियोजनाओं का विरोध किया है। निकोबार परियोजना उनमें नवीनतम है। धर्म उसकी पहुंच से बाहर है और कल्याण और विकास के मामले में भावुकता से काम नहीं चल सकता। ऐसे में कांग्रेस के पास केवल राष्ट्रवाद का विकल्प ही बचता है।

कांग्रेस द्वारा राष्ट्रवाद का त्याग 2014 के बाद की उसकी राजनीति का सबसे रोचक पहलू है। इसके कुछ नेता यूरोप के पर्यावरणवादी नेताओं की तरह दिखने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन वास्तविक कांग्रेस कभी भी अति उदार शांतिवादियों की पार्टी नहीं रही है। इसी दल ने 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पाकिस्तान को हराया और उसके दो टुकड़े कर दिए। इसी ने लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री रहते 1965 में पाकिस्तान को बुरी तरह पीछे पराजित किया जब वह कश्मीर पर कब्जा करने के इरादे से हमें जंग में घसीट ले गया था।

कांग्रेस ने पूर्वोत्तर विद्रोहों के खिलाफ भी कठोर संघर्ष किया। 5 मार्च 1966 को भारतीय वायुसेना को आइजोल की घेराबंदी तोड़ने और विद्रोहियों को रोकने के लिए भेजा गया। उस समय विद्रोही खजाने, असम राइफल्स बटालियन मुख्यालय और डिप्टी कमिश्नर के आवास पर कब्ज़ा करने की स्थिति में थे। अब भले ही कांग्रेस याद नहीं करना चाहती लेकिन यह तथ्य है कि उसने ऑपरेशन ब्लूस्टार में सेना को स्वर्ण मंदिर परिसर में भेजा, जिसके बाद ब्लैक थंडर 1 और 2 हुए।

पहले दो अभियान इंदिरा गांधी के समय हुए और अंतिम दो उनके बेटे राजीव गांधी के समय। इसके बाद कांग्रेस ने कश्मीर घाटी और पंजाब (1991-95) में आतंकवाद और अलगाववाद के दो सबसे रक्तरंजित चरणों का मुकाबला किया। यह पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में हुआ। यहां तक कि नागा विद्रोहियों के साथ युद्ध भी नेहरू के समय में ही सबसे कठोर तरीकों से लड़ा गया। उन्होंने गोवा को मुक्त कराने के लिए भी सेना भेजी।

कांग्रेस को अपने गैर-गांधी/नेहरू प्रधानमंत्री भले ही पसंद न हों लेकिन तथ्य यह है कि उसने कभी भी ऐसा नेता नहीं दिया जो राष्ट्रीय सुरक्षा पर कमजोर रहा हो। इसलिए यह आश्चर्यजनक है कि कठोर राष्ट्रवाद की मूल पार्टी आज अपना रास्ता खो चुकी है। उरी के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा के बाद बालाकोट बमबारी, पूर्वी लद्दाख/गलवान संकट से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक कांग्रेस ने केवल सवाल उठाकर और सबूत मांगकर अपने उद्देश्य को काफी नुकसान पहुंचाया है। कुछ मामलों में यह राहुल गांधी के करीबी लोगों ने किया। जैसे सैम पित्रोदा ने बालाकोट पर, दिग्विजय सिंह ने सर्जिकल स्ट्राइक पर। अब खुद राहुल यही कर रहे हैं।

उनके बयान जैसे ‘चीनी हमारे सैनिकों को पीट रहे हैं’ या ‘उन्होंने हमारी 2,000 किमी जमीन पर कब्ज़ा कर लिया है’ ने उन्हें अदालत की फटकार भी दिलाई। ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में उनका हस्तक्षेप इस बात पर अधिक था कि भारत ने कितने विमान खोए और क्यों? उन्होंने जयशंकर का 17 सेकंड का वीडियो ट्वीट कर पूछा कि भारत ने पाकिस्तान से क्यों कहा कि वह केवल आतंकी ठिकानों पर हमला करेगा और उसके सैन्य प्रतिष्ठानों पर नहीं।

मैं आपको बता सकता हूं कि उनकी दादी इन सबको कैसे संभालतीं। हर बार, वह भारतीय सशस्त्र बलों की भरपूर प्रशंसा से शुरुआत करतीं, उनकी सफलता का गुणगान करतीं और फिर मोदी सरकार पर उसकी अनेक विफलताओं के लिए हमला करतीं। पुलवामा में 300 किलो आरडीएक्स का पहुंचना, पहलगाम में सुरक्षा की कमी और शायद ऑपरेशन सिंदूर में शुरुआती बहुत नरम रुख। इसके बाद वह कहतीं कि हमारे शानदार और अजेय सशस्त्र बलों ने ‘इस अक्षम और गड़बड़ सरकार’ के बावजूद चमत्कार कर दिखाया, तो धन्यवाद हमारे सैनिकों, अधिकारियों, पायलटों और वायु सैनिकों। वह सशस्त्र बलों और सरकार को स्पष्ट रूप से अलग करतीं।

मौजूदा कांग्रेस किसी गलती से पीछे हटने का कौशल नहीं रखती। इसकी तुलना मोदी से कीजिए। 10 अगस्त, 2023 को लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव पर अपने जवाब में मोदी ने तीन असावधान बयान दिए थे: कच्चतीवु, 1966 में आइजोल पर वायुसेना की गोलीबारी और ऑपरेशन ब्लूस्टार (जिसे उन्होंने ‘अकाल तख्त पर हमला’ कहा)। बाद में उन्होंने इन बयानों के नुकसान को समझा। मिजो और ब्लूस्टार वाले बिंदु उन्होंने फिर कभी नहीं दोहराए। कच्चतीवु का मुद्दा भी भुला दिया गया है।

भारतीय राष्ट्रवाद अद्वितीय है। यह साझा इतिहास से निकलता है: प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक, स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान। भाजपा ने इसका हिंदूकरण कर दिया है। यहीं कांग्रेस को तर्क या वह अंतर मिल सकता है जो उसे दर्शाना है। लेकिन यदि वह अपने वर्तमान दृष्टिकोण पर अड़ी रहती है, यह कहते हुए कि भारत और उसकी सशस्त्र सेनाएं सिर्फ चीन और पाकिस्तान से हारती रहती हैं तो कोई प्रभावित नहीं होगा। मुझे डर है कि यह आज की दो-दलीय स्थिति को आसानी से एक-दलीय व्यवस्था में बदल सकता है।

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First Published - July 5, 2026 | 10:01 PM IST

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