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जोखिम में इजाफा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:45 PM IST

कई विश्लेषकों ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा आगामी वित्त वर्ष के लिए जारी मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमानों पर प्रश्नचिह्न लगाया है। दरें तय करने वाली समिति ने फरवरी में अपनी पिछली बैठक में अनुमान जताया था कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर अगले वित्त वर्ष में औसतन 4.5 फीसदी रहेगी। तब से अब तक के वैश्विक घटनाक्रम के कारण मुद्रास्फीति संबंधी जोखिम काफी बढ़ गए हैं और समिति को अपने अनुमानों को संशोधित करना होगा। एमपीसी और रिजर्व बैंक को अपना नीतिगत रुख भी समायोजित करना होगा और परिचालन में भी जरूरी बदलाव करने होंगे। फरवरी में मुद्रास्फीति की दर 6.07 फीसदी के साथ आठ वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई जो आरबीआई के तय दायरे से ऊपर थी। इस बीच थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर लगातार 11वें महीने दो अंकों में बनी रही। हालांकि एमपीसी भी सीपीआई को लक्ष्य बनाकर चलती है लेकिन डब्ल्यूपीआई का निरंतर ऊंचे स्तर पर बने रहना अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले मुद्रास्फीतिक दबाव को दर्शाता है।
निकट भविष्य में भी मुद्रास्फीति का दबाव बरकरार रहने की संभावना है। वैश्विक जिंस कीमतों खासकर कच्चे तेल के दाम में यूक्रेन पर रूसी आक्रमण और रूस पर असाधारण प्रतिबंध लागू किए जाने के बाद तेजी से बढ़ोतरी हुई है। हालांकि तेल संकट के कूटनीतिक हल की दिशा में आगे बढऩे के कारण तेल कीमतों में कमी आई है लेकिन निकट से मध्यम अवधि में कीमतों के तेज बने रहने की आशा है क्योंकि प्रतिबंध जल्दी समाप्त होने वाले नहीं हैं। हालांकि अंतिम निष्कर्षों के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह संकट कितना लंबा चलेगा? देश के आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए बेहतर यही होगा कि वे समायोजन शुरू कर दें। कच्चे तेल और जिंस की ऊंची कीमतों के कारण मुद्रास्फीति बढ़ेगी और वृद्धि में धीमापन आएगा। इससे सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ेगा।
उदाहरण के लिए तेल कंपनियों ने कीमतों में इजाफे का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला है। यह संभव है कि सरकार कीमतों में इजाफे का भार खुद उठाने की इच्छुक हो। सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क कम करने पर भी विचार कर सकती है। दोनों ही विकल्प बजट पर असर डालेंगे। यदि पूरी वृद्धि का बोझ खुदरा कीमतों पर डाल दिया जाए तो इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और उपभोक्ता मांग प्रभावित होगी। ऐसे में कोई आसान विकल्प नहीं है। सरकार को भी उर्वरक सब्सिडी में होने वाली अपरिहार्य वृद्धि को फंड करना होगा।
रिजर्व बैंक और एमपीसी को भी अनिवार्य बदलाव करने होंगे। केंद्रीय बैंक महामारी की शुरुआत के समय से ही आर्थिक गतिविधियों को समर्थन दे रहा है। इसके लिए ब्याज दरों को कम रखा गया और नकदी बढ़ाई गयी। यूक्रेन संकट के कारण मुद्रास्फीति का जोखिम बढऩे के पहले से ही केंद्रीय बैंक पीछे रहा है। मसलन अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इस सप्ताह दरों में इजाफा शुरू कर सकता है। उच्च मुद्रास्फीति की प्रतिक्रियास्वरूप अन्य केंद्रीय बैंक भी अतिरिक्त नकदी समायोजन समाप्त करने की प्रक्रिया में हैं। केंद्रीय बैंक भी व्यवस्था से अतिरिक्त नकदी हटा रहा है जिससे ब्याज दरों में इजाफा हो रहा है लेकिन उससे अब तक और अधिक कदम उठाए जाने की अपेक्षा थी। उदाहरण के लिए आरबीआई से आशा थी कि वह नीतिगत गलियारे को सामान्य बनाएगा। ऐसी स्थिति में बाजार दरें अधिक स्थिर होतीं। अतिरिक्त नकदी को हटाने में देरी से मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ सकता है और अर्थव्यवस्था की दीर्घावधि की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता से महामारी के प्रभाव से निपटने की आर्थिक प्रक्रिया प्रभावित होगी और वृहद आर्थिक चुनौतियां बढ़ेंगी।

First Published : March 15, 2022 | 11:11 PM IST