चाहे जितना मासूम समय हो लेकिन पंजाब में कोई इस बात पर यकीन नहीं करेगा कि हनी त्रेहन/दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज का ओटीटी पर रिलीज होना और उसे अचानक हटा दिया जाना बिना किसी राजनीतिक निहितार्थ के उठाया गया कदम था।
षडयंत्र सिद्धांतों के इस दौर में पंजाब में हर व्यक्ति इस मामले में अपनी राय रखता है। अगर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस फिल्म को रोकना चाहती तो जिस तरह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने 127 कट प्रस्तावित किए थे वैसे ही वह ज़ी को यह संदेश दे सकती थी कि इसे जारी नहीं किया जाए। ज़ी का स्वामित्व भी भाजपा के करीबी व्यक्ति के पास ही है। तब इसे 48 घंटे में क्यों हटाया गया?
यह बात सभी जानते हैं कि एक बार डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने के बाद इसे बड़े पैमाने पर देखा जाएगा। विवाद से यह और अधिक चर्चा में आएगी। पंजाब में अगले वर्ष के आरंभ में चुनाव होने हैं और सवाल यह है कि इस विवाद से सबसे अधिक फायदा किसे होगा? या सबसे अधिक नुकसान किसे होगा? जैसा कि अक्सर होता है। एक परिणाम दूसरे की ओर ले जाता है।
आइए उन चार बातों के बारे में जानते हैं जो इस फिल्म के कारण हो सकती हैं।
पहली बात, यह फिल्म केवल उस व्यक्ति पर केंद्रित है जिसने पंजाब में उग्रवाद समाप्त होने के बाद ‘फर्जी’ मुठभेड़ों की जांच शुरू की। ऐसा करके यह फिल्म एक पीढ़ी पुराने दर्द को उभार सकती है। इससे लोगों में नए सिरे से गुस्सा पैदा हो सकता है।
दूसरा, उग्रवादियों को नायक की तरह पेश करने की कोशिश की गई है वह भी बिना छिपाए। ध्यान दीजिए कि 31 अगस्त 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को मानव बम की मदद से मारे जाने को किस प्रकार दर्शाया गया है। इस दृश्य के पार्श्व में सिखों की शहादत का एक प्रमुख गीत गाया जा रहा है।
तीसरा, इसके कारण युवा सिखों में नाराजगी पैदा होना तय है जिनकी आतंकवाद के उस दशक के साथ कोई स्मृति नहीं है, लेकिन जाट खासतौर पर प्रभावित होंगे खासकर अधिक धार्मिक और रूढ़िवादी जाट। उनका एक बड़ा हिस्सा पंजाब के उन सीमावर्ती जिलों में रहता है जिन्हें शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) का गढ़ माना जाता है।
चौथी बात यह फिल्म परदे पर बेहद उबाऊ नजर आती है। ऐसा लगता है मानो वह उग्रवादियों और पुलिस की कोई निजी लड़ाई हो। हम जनसंख्या के उस हिस्से के बारे में जानते हैं जो इससे सबसे अधिक भड़केगा। वह जाट सिखों का अपेक्षाकृत रूढ़िवादी धड़ा, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाला।
इसके परिणामस्वरूप उनका वोट कहां जा सकता है? शिरोमणि अकाली दल जिसके पास पारंपरिक रूप से उनका वोट होता था, उसकी हालत काफी समय से खुद खस्ता है। 2024 के लोक सभा चुनाव में उसे तरन तारन/ खडूर साहिब विधान सभा चुनाव में जेल में बंद कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह के हाथों बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। फरीदकोट सीट भी कट्टरपंथियों ने जीत ली।
वहां इंदिरा गांधी के हत्यारों में से एक बेअंत सिंह के बेटे सरबजीत सिंह खालसा को जीत मिली। मतदाताओं का यह वर्ग पहले ही मुख्य धारा के राजनेताओं खासकर अकाली नेताओं से नाराज है। इसलिए यह मुश्किल है कि वही मतदाता जो सतलुज से और अधिक नाराज होगा वह अकाली दल की और लौटेगा बल्कि उनके कट्टरपंथियों के साथ बने रहने की संभावना अधिक है। चूंकि यह धड़ा कांग्रेस या आम आदमी पार्टी के पास नहीं जाएगा इसलिए केवल एक ही दल है जिसे फायदा मिलेगा।
इसे इस तरह देखिए। पंजाब में सत्ता तीन स्थापित शक्तियों के बीच घूमती रही है: कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी। कट्टरपंथी चौथी ताकत हैं लेकिन सीमित। यहां तक कि गठबंधन सहयोगी बनने के लिए भी उग्रपंथियों को यह जरूरत होगी कि अकाली एक-तिहाई सीटें जीतें जो असंभव-सा है। अकालियों में विश्वास रखने वालों का वोट बंट गया है। उन्हें और हाशिये पर धकेला जा सकता है। आम आदमी पार्टी को सत्ता-विरोधी लहर और सिख धार्मिक नेतृत्व के हमलों से जूझना है। कांग्रेस अपने ही भीतर संघर्ष कर रही है। इस उथलपुथल में यदि हिंदू वोट एकजुट होता है, तो केवल भाजपा को लाभ होगा।
पंजाब की राजनीति को इसकी जननांकिकी के नजरिये से देखें। आम धारणा के विपरीत पंजाब केवल सिख राज्य नहीं है। सिख 58 फीसदी हैं और बहुमत में हैं लेकिन हिंदू लगभग 40 फीसदी हैं और महत्त्वपूर्ण हैं। यदि सिख वोट खंडित हो जाए और हिंदू एकजुट हो जाएं तो राज्य एक अनदेखी दिशा ले सकता है। इसे और विस्तार से देखें। सिखों में लगभग 60 फीसदी जाट हैं यानी राज्य की कुल आबादी का लगभग एक-चौथाई। वे अकाली, कट्टरपंथी और कांग्रेस-विरोधी वोटों का बड़ा हिस्सा बनाते हैं।
यदि इसका अधिक हिस्सा उग्रपंथियों की ओर जाता है तो यह शिरोमणि अकाली दल को कमजोर कर देता है और आम आदमी पार्टी या कांग्रेस को लाभ पहुंचाता है। भाजपा हिंदुओं को एकजुट करना चाहती है जैसा कि उसने पश्चिम बंगाल और असम में किया। यदि उन्हें हिंदू वोट का 70 फीसदी मिल जाता है, तो पांचकोणीय मुकाबले में उनकी स्थिति मजबूत हो जाएगी।
पंजाब के दलित वोटों पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। ये सिख और हिंदू समुदायों से हैं और 33 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। सिखों में इनकी हिस्सेदारी 35 फीसदी है। पारंपरिक तौर पर इस तबके पर कांग्रेस की पकड़ थी और उसके बाद आम आदमी पार्टी ने इसमें सेंध लगाई। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस वोट बैंक पर बाबाओं और डेरों की पकड़ रही है। यही वजह है कि बलात्कार का दोषी गुरमीत राम रहीम किसी भी चुनाव के पहले पेरोल पर रिहा हो जाता है। यहां तक कि पंचायत चुनाव के पहले भी।
भाजपा लंबे समय से इस वोट बैंक को मजबूत कर रही है। अगले सप्ताह प्रधानमंत्री पंजाब का दौरा करेंगे। वे जालंधर जाएंगे और नए रेलवे स्टेशन का उद्घाटन करेंगे लेकिन डेरा सचखंड बल्लां का उनका संभावित दौरा राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कदम होगा। वह संत निरंजन दास का आसन है। वे रविदासिया दलित समुदाय के आध्यात्मिक नेता हैं। सटीक आंकड़े तो नहीं हैं लेकिन यह एक बड़ा समुदाय है जिसे हिंदी पट्टी में जाटव कहा जाता है। ये पंजाब के कुल दलितों का लगभग आधा हिस्सा हैं। इस गणतंत्र दिवस की सम्मान सूची में पद्मश्री पाने वालों में संत निरंजन का नाम भी था। आगे का गणित आप लगा लीजिए।
अगला कदम है चुनावी आंकड़े। कृषि बिलों के कारण अकाली दल के साथ पुराने गठबंधन के टूटने के बाद भाजपा ने पंजाब में अकेले जाने का निर्णय लिया। इसे अहंकारी और आत्मघाती माना गया। 2022 के विधान सभा चुनावों में भाजपा को केवल 6.6 फीसदी वोट मिले। लेकिन 2024 के लोक सभा चुनावों में यह बढ़कर 18.65 फीसदी हो गया। यह और भी प्रभावशाली लगता है क्योंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों लगभग 26 फीसदी पर थीं और अकालियों का वोट घटकर 13.48 फीसदी रह गया क्योंकि परंपरागत सिख वोट उग्रवादियों की ओर चला गया। अब वे गंभीर संकट में हैं। यही कारण है कि वे राज्य के हर गांव में सतलुज के शो आयोजित कर रहे हैं।
भाजपा को उम्मीद है कि यदि वह वोट प्रतिशत को 30 फीसदी तक ले जा सकी, उन 55 निर्वाचन क्षेत्रों में अधिकतम लाभ की बदौलत जहां हिंदुओं की उल्लेखनीय उपस्थिति है, और डेरे दलित वोट दिलवा सकें तो वे सबसे बड़ी पार्टी बन सकते हैं। यह गणित सरल लगता है और इस हद तक भाजपा इसे उग्रवाद की नई लहर के जोखिम के बावजूद सार्थक मान सकती है। उन्हें विश्वास है कि वे उग्रवाद समर्थन को जल्दी दबा देंगे और अगर 30 साल बाद एक और सतलुज जैसी फिल्म बनती है तो क्या फर्क पड़ता है।
ध्यान देने वाली बात है कि अकाली सतलुज का जश्न मना रहे हैं और अन्य चुप हैं। वहीं केवल भाजपा के रवनीत सिंह बिट्टू इसे चुनौती दे रहे हैं। आप इसे उनके पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते होने का श्रेय दे सकते हैं लेकिन यदि आप सोचते हैं कि कोई भाजपा नेता पार्टी की अनुमति के बिना ऐसा कदम उठाता है तो यह भोलेपन होगा।
यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह ज़ी5 पर सतलुज की नाटकीय रिलीज और फिर हटाने के लिए सबसे तार्किक व्याख्या लगती है। बस इतना है कि पंजाब के मतदाता हमें चौंका भी सकते हैं। सतलुज के नायक जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी ने लोक सभा चुनाव में दो बार तरन तारन/खडूर साहिब से चुनाव लड़ा।
1999 में अकाली दल के एक अलग हुए गुट से उनकी जमानत जब्त हो गई और फिर 2019 में वह तीसरे स्थान पर रहीं। जबकि कांग्रेस ने राज्य की सबसे धार्मिक सिख सीट जीती। 2019 में उन्हें पंजाब एकता पार्टी ने उम्मीदवार बनाया था जिसे सुखपाल सिंह खैरा ने आम आदमी पार्टी से अलग होकर बनाया था। खैरा अब कांग्रेस में हैं और उसके सबसे मुखर नेताओं में से एक हैं। अगर आप सोचते थे कि केवल बिहार की राजनीति ही जटिल है तो जान लीजिए कि पंजाब भी उतना ही उलझा हुआ है।