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Editorial: कम शुल्क से बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा, भारत को चाहिए स्थायी आयात सुधार

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भारतीय व्यवसायों को सामान्य रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी बनने के लिए कम शुल्क की आवश्यकता है

Last Updated- July 12, 2026 | 10:27 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर

केंद्र सरकार द्वारा कुछ वस्तुओं को सीमा शुल्क से छूट देने का निर्णय बिल्कुल सही समय पर लिया गया है। पिछले सप्ताह सरकार ने वाहन, औद्योगिक और चिकित्सा उपकरण, मोबाइल फोन और लीथियम-आयन सेल के निर्माण में उपयोग होने वाले कई पुर्जों और मशीनों पर सीमा शुल्क से छूट देने का फैसला किया। इन वस्तुओं पर लागू शुल्क 7.5 से 15 फीसदी के बीच था।

जैसा कि इस समाचार पत्र ने बताया था, लीथियम-आयन सेल उत्पादन में उपयोग होने वाली मशीनों की एक बड़ी सूची अब अंतिम उपयोग संबंधी अनिवार्यता के बिना शुल्क से मुक्त है। यह तर्क दिया गया है कि यह कदम घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को ऐसे समय में सहारा देने के लिए है जब पश्चिम एशिया संकट ने आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर दिया और लागत बढ़ा दी है। यह छूट मार्च 2029 के अंत तक प्रभावी रहेगी। 

हालांकि शुल्क छूट के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इसकी एक तय अंतिम तिथि आयात उदारीकरण के प्रति भारत की अंतर्निहित अनिच्छा को रेखांकित करती है। चिह्नित क्षेत्रों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान या भू-राजनीतिक तनाव के कारण ही ऐसी नीतिगत सहायता की आवश्यकता नहीं है। भारतीय व्यवसायों को सामान्य रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी बनने के लिए कम शुल्क की आवश्यकता है। छूट की तय अंतिम तिथि से केवल मौजूदा कंपनियों को ही लाभ होने की संभावना है और इन क्षेत्रों में नए निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा। आयात शुल्क कम करने के ठोस कारण हैं।

अर्थशास्त्रियों ने लंबे समय से साक्ष्यों के साथ यह तर्क दिया है कि आयात शुल्क प्रभावी रूप से निर्यात पर कर के रूप में कार्य करता है। भारत को अपनी शुल्क संरचना की व्यापक समीक्षा करने की आवश्यकता है। आयात पर कम प्रतिबंध, उत्पादन बढ़ाने और सामान्य रूप से निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता प्राप्त करने के लिए वैसे ही महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स और संबंधित उत्पादों के क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।  

नीति आयोग की 2024 की रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 70 फीसदी हिस्सा वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) वाले वस्तुओं का है। इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में यह 80 फीसदी तक पहुंच जाता है। इसलिए, यदि भारत को सामान्य रूप से जीवीसी में, और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के लिए, एकीकृत होना है, तो उसे एक प्रतिस्पर्धी शुल्क संरचना की आवश्यकता होगी। आयात प्रतिबंध और उच्च शुल्क बाधा पैदा करते हैं, जिससे जीवीसी में भागीदारी प्रभावित होती है।

नीति आयोग रिपोर्ट में सही ही कहा गया है कि भारत की शुल्क संरचना, जिसमें कई स्लैब हैं, अक्सर गलतफहमी और विवादों को जन्म देती है। बार-बार संशोधन भी समस्याएं पैदा करते हैं। ये सभी मुद्दे, जो भारतीय उत्पादकों और निर्यातकों को नुकसान पहुंचाते हैं, टाले जा सकते हैं। शुल्क और अन्य प्रकार के संरक्षण ने वास्तव में भारत को अपने औद्योगिक आधार को महत्त्वपूर्ण रूप से विस्तारित करने में मदद नहीं की है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब विदेशी या घरेलू व्यवसाय शुल्क संरक्षण के लाभ के साथ इनपुट या मशीनरी का उत्पादन शुरू करते हैं, तो वे अपने उत्पादों को आयात के समान कीमतों पर बेचते हैं। इस प्रकार, इससे निर्यातकों को लाभ नहीं होता है।

यह उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के उत्पादन और निर्यात में भारत ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है, जिसका आंशिक श्रेय ऐपल के आईफोन उत्पादन की सफलता को जाता है। विशेष रूप से, जहां 2025-26 में भारत के माल निर्यात में लगभग 1 फीसदी की वृद्धि हुई, वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 24 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई। इस प्रकार, इस क्षेत्र में भारत के लिए स्पष्ट अवसर मौजूद हैं। सहायक नीतियों के साथ, जैसे-जैसे उत्पादन और निर्यात का विस्तार होगा, पुर्जों के र्निर्माता भी इस अवसर का लाभ उठाने के लिए भारत में अपने परिचालन स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

व्यापार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का भी एक महत्त्वपूर्ण चालक है। भारत ने हाल के वर्षों में अपेक्षाकृत गहन व्यापार समझौते किए हैं, जिनमें ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ किए गए समझौते शामिल हैं। अमेरिका के साथ भी एक समझौता होने की संभावना है। हालांकि, इन व्यापार समझौतों का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को तैयार रहना होगा और मूल्य श्रृंखलाओं में मजबूत एकीकरण से दीर्घकालिक लाभ प्राप्त होंगे।

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First Published - July 12, 2026 | 10:27 PM IST

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