वर्ष 1990 में खाड़ी क्षेत्र में हुए युद्ध के कारण भारत में गंभीर तेल संकट उत्पन्न हुआ, जिसने 1991 के वित्तीय संकट को जन्म दिया। इस वर्ष की शुरुआत में ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले के कारण हुए व्यवधान से अब तक कम नुकसान हुआ है। भारत की अर्थव्यवस्था अब कहीं अधिक मजबूत है, और तेल की कीमतें भी पहले की तरह लंबे समय तक उच्च स्तर पर नहीं रही हैं। वैसे तेल आयात पर निर्भरता 1990 में 50 फीसदी से कम से बढ़कर अब लगभग 90 फीसदी हो जाने के कारण जोखिम बना हुआ है।
युद्ध शुरू होने पर होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से प्रतिदिन लगभग 150-200 लाख बैरल (एमबीडी) तेल अवरुद्ध हो गया, जो वैश्विक स्तर पर व्यापार किए जाने वाले तेल का लगभग 20 फीसदी था। हालांकि, शुरुआत में ईरान द्वारा केवल खाड़ी अरब देशों से होने वाले निर्यात को अवरुद्ध किया गया था, जबकि प्रतिदिन लगभग 15 लाख बैरल ईरानी तेल चीन के ग्राहकों को भेजा जाता रहा, जो अमेरिकी प्रतिबंधों से अप्रभावित थे। मार्च के मध्य में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के सदस्य देशों ने रणनीतिक भंडारों से 40 करोड़ बैरल तेल की समन्वित निकासी की व्यवस्था की। सऊदी अरब ने लाल सागर तक जाने वाली पाइपलाइनों का तेजी से नवीनीकरण और पुनः संचालन किया।
संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अरब सागर पर स्थित टर्मिनलों के उपयोग से वैकल्पिक निकास मार्गों पर बमबारी के ईरानी प्रयासों के बावजूद, विश्व बाजारों में प्रतिदिन लगभग 50-70 लाख बैरल तेल की आपूर्ति फिर से शुरू हो गई। अप्रैल के मध्य में अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों की सफल ‘जवाबी-नाकाबंदी’ से ईरान के निर्यात पर रोक लगने के बाद तेल की कीमतों में फिर से तेजी से वृद्धि हुई।
लेकिन तब तक, दुनिया के सबसे बड़े आयातक चीन ने अपने विशाल रणनीतिक भंडारों से तेल निकालना शुरू कर दिया था और तेल आयात में हर दिन 40 लाख बैरल से अधिक की कमी कर दी थी। चीन से मांग में कमी के कारण भारत सहित सभी आयातकों के लिए कीमतों में और अधिक उछाल नहीं आई। शांति वार्ता में प्रगति के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बार-बार किए गए दावे भी तेल बाजार की भावना को संतुलित करने के उद्देश्य से प्रतीत होते थे।
इस बार तेल संकट से निपटने के लिए भारत की तैयारी स्पष्ट रूप से बेहतर साबित हुई। आयात स्रोतों के विविधीकरण ने यह सुनिश्चित किया कि कच्चे तेल की खेप भारत के बंदरगाहों पर लगातार पहुंचती रहे। वर्ष 1990 के विपरीत, अब हमारे पास कुछ हफ्तों के लिए पर्याप्त स्टॉक है, जो अधिकतर भारत की विश्वस्तरीय शोधन कंपनियों के वाणिज्यिक भंडार में है, और रणनीतिक भंडार से एक सप्ताह से अधिक की आवश्यकता पूरी हो सकती है। लेकिन हमारी ऊर्जा समस्याएं केवल तेल तक ही सीमित नहीं हैं। ये तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) तक भी फैली हुई हैं।
लगभग आधी एलपीजी आयात की जा रही थी, जिसमें से अधिकांश खाड़ी देशों से आती थी। पिछले दशक में, बढ़ती मांग के कारण आयात क्षमता लगभग तीन गुना बढ़ गई है। अमेरिका से आने वाली वैकल्पिक एलपीजी आपूर्ति से आपूर्ति में आई कमी पूरी नहीं हो सकी। तब सरकार ने एलपीजी नियंत्रण आदेश लागू किया, जिसके चलते तेल रिफाइनरियों ने एलपीजी उत्पादन को अधिकतम करने के लिए तकनीकी दक्षता का भरपूर इस्तेमाल किया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एलपीजी का उत्पादन 35,000 टन से बढ़कर 54,000 टन प्रतिदिन हो गया। इससे प्रोपीलीन जैसे पेट्रोकेमिकल उत्पादन में कमी आई, जिससे रासायनिक उद्योगों पर असर पड़ा, लेकिन घरेलू आपूर्ति काफी हद तक सुरक्षित रही।
सरकार ने प्रशासनिक उपायों के जरिये एलपीजी और पेट्रोल की कीमतों को भी नियंत्रण में रखा। इससे तेल विपणन कंपनियों को भारी नुकसान हुआ है । वित्त मंत्रालय ने कंपनियों को राहत देने के लिए पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में कमी की घोषणा की है, जिससे सरकारी खजाने पर भारी असर पड़ेगा। युद्धविराम से तेल की कीमतों में गिरावट आने से राहत मिली।
हालांकि, अब ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता देनी होगी। सबसे पहला काम भारत की आयात पर निर्भरता को कम करना है, जिसके लिए सरकार के समग्र प्रयासों से घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की सराहनीय पहल अपने आप में अपर्याप्त हैं। यदि तेल उद्योग विकास उपकर (जिसका उपयोग तेल उद्योग विकास के लिए नहीं किया जाता) को हटा दिया जाए, तो ओएनजीसी का अन्वेषण बजट दोगुना हो सकता है! नियामक और कानूनी मुद्दे जो अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों को भारत के अन्वेषण क्षेत्र से दूर रखते हैं, उनका समाधान करना होगा।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में काफी वृद्धि करनी होगी। चीन के पास रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडारों में 1 अरब बैरल से अधिक का भंडार है, जो हमारे वर्तमान भंडारों से 10 गुना अधिक है। एलपीजी और प्राकृतिक गैस के लिए अतिरिक्त क्रायोजेनिक भंडारण टैंक विभिन्न स्थानों पर विकसित किए जाने चाहिए। भारत में कोयले का गैसीकरण चीन की तुलना में 5 फीसदी से भी कम है, और इसके लिए केवल नीतिगत घोषणाओं की नहीं, बल्कि कार्यान्वयन में प्राथमिकता की आवश्यकता है।
चीन द्वारा क्षेत्रीय पहल शुरू करने से पहले, हमें अपने आसपास के देशों की ईंधन सुरक्षा के लिए सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। श्रीलंका के बहुचर्चित त्रिंकोमाली तेल भंडार में 80 लाख बैरल से अधिक तेल का भंडारण किया जा सकता है, जो देश की लगभग दो महीने की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। श्रीलंका पेट्रोल और डीजल की बिक्री में भारी कटौती करके 2022 जैसे आर्थिक संकट से बाल-बाल बचा है।
त्रिंकोमाली भंडार के पुनर्विकास के लिए एक सहयोगात्मक परियोजना श्रीलंका और मालदीव दोनों के लिए बफर स्टॉक प्रदान कर सकती है, और भारत में स्थानीय आपातकालीन आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में दशकों के प्रयासों के बावजूद, तेल आने वाले कुछ दशकों तक सभी देशों के लिए ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत बना रहेगा। हम होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने वाले किसी भी युद्ध को ध्यान में रखते हुए तैयारी करनी होगी।
(लेखक पूर्व राजनयिक हैं)