केंद्र सरकार अक्टूबर में अगले वर्ष के बजट निर्माण और चालू वर्ष के संशोधित अनुमान पेश करने की कवायद शुरू कर रही है। इस प्रक्रिया में सरकार पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बेहतर स्थिति में नजर आ रही है। राजकोषीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और राजस्व संग्रह में सुधार ने अधिकांश विश्लेषकों को चकित कर दिया है। जुलाई के अंत तक सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए अपने बजट अनुमान का 37 फीसदी राजस्व संग्रहित कर लिया। गत वित्त वर्ष में वह बजट अनुमान का केवल 11 फीसदी हासिल कर सकी थी। यह सच है कि बीता वर्ष सामान्य वर्ष नहीं था और कोविड-19 महामारी के कारण लगे प्रतिबंधों ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया लेकिन जुलाई 2019-20 तक जो एक सामान्य वर्ष था, उस वर्ष भी बजट अनुमान का केवल 20 फीसदी ही हासिल हो सका था। अनुमान से बेहतर राजस्व संग्रह के कारण राजस्व घाटा भी सीमित रहा है। सरकार का लक्ष्य राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 6.8 फीसदी तक सीमित रखने का है जबकि गत वर्ष यह जीडीपी के 9.5 फीसदी के बराबर था।
अग्रिम कर के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि राजस्व संग्रह में वृद्धि मजबूत बनी हुई है। बहरहाल, केंद्र सरकार के वित्तीय प्रबंधन में सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी। जैसा कि वित्त सचिव टी वी सोमनाथन ने हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में कहा है कि सरकार का व्यय भी बजट अनुमान से ऊपर जा रहा है। उदाहरण के लिए सरकार ने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण दोबारा शुरू किया जिसकी लागत करीब एक लाख करोड़ रुपये आने की आशा है। उर्वरक सब्सिडी में 15,000 करोड़ रुपये जाने का अनुमान है। वाणिज्य मंत्रालय चालू वर्ष में करीब 56,000 करोड़ रुपये के निर्यात प्रोत्साहन को भी मंजूरी दे रहा है। मांग तेज करने के लिए व्यय बढ़ाने के बारे में सोमनाथन ने सही कहा कि एक जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यय कार्यक्रमों को रोकना आसान नहीं है। बहरहाल, मौजूदा हालात में सरकार बिना स्थायी कार्यक्रमों के व्यय को बढ़ा सकती है, नकदी हस्तांतरण जैसे कार्यक्रम इसके उदाहरण हैं। पूंजीगत व्यय को बढ़ाना भी एक संभावना हो सकती है। चालू वित्त वर्ष में यह पीछे रहा है। उच्च कर संग्रह के बावजूद सरकार अतिरिक्त व्यय की प्रतिबद्धता जताने में हिचक रही है क्योंकि गैर कर प्राप्तियां बजट अनुमान से कम रह सकती हैं। उदाहरण के लिए विनिवेश लक्ष्य हासिल होने की संभावना नहीं है।
चूंकि राजस्व संग्रह बजट अनुमान से काफी अधिक रहने की संभावना है इसलिए सरकार अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश का इस्तेमाल पूंजीगत व्यय बढ़ाने में कर सकती है। सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी मध्यम अवधि के राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की राह तैयार करना। केंद्र सरकार को राज्यों की राजकोषीय चिंताओं का भी शमन करना होगा। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में कमी के लिए किए जाने वाले क्षतिपूर्ति भुगतान का अगले जुलाई से अंत हो जाएगा जिससे कई राज्यों का राजकोषीय जोखिम बढ़ेगा। क्षतिपूर्ति प्रणाली व्यावहारिक नहीं रहेगी क्योंकि जून 2022 के बाद उपकर संग्रह का इस्तेमाल गत और मौजूदा वित्त वर्ष में क्षतिपूर्ति की खातिर लिए गए कर्ज का भुगतान करने में किया जाएगा। ऐसे में सरकार को अन्य तरीके तलाशने होंगे। जीएसटी परिषद को दरों को यथाशीघ्र तार्किक बनाना चाहिए और उन्हें राजस्व प्रतिपूर्ति स्तर पर ले जाना चाहिए। इससे न केवल राज्यों की राजकोषीय स्थिति में सुधार होगा बल्कि केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति में भी स्थिरता आएगी। इससे मध्यम अवधि में सुदृढ़ीकरण का खाका तैयार करने में भी सहायता मिलेगी। सरकारी व्यय में लचीलापन मध्यम अवधि में सुधार के लिए मददगार होगा।