बिजली के लिए एक केंद्रीकृत बाजार बनाने को लेकर उभरता विवाद संघीय रिश्तों में ऐसा तनाव दर्शाता है जिसे टाला जा सकता है। ‘एक राष्ट्र, एक ग्रिड, एक फ्रीक्वेंसी’ की गत वर्ष अक्टूबर में घोषित अवधारणा 2021 की उस राष्ट्रीय बिजली नीति का हिस्सा है जिसमें अल्पावधि के बिजली बाजारों की पहुंच को 2023-24 तक दोगुना करने की बात कही गई है। सैद्धांतिक तौर पर यह बात समझदारी भरी प्रतीत होती है लेकिन ऐसी कई वजह हैं जिनके चलते शायद यह कारगर साबित न हो। इस नीति का लक्ष्य है उपभोक्ताओं के लिए बिजली की कीमत कम करना लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने की प्रक्रिया दिक्कतदेह नजर आती है।
यह नीति बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण (मार्केट बेस्ड इकनॉमिक डिस्पैच यानी एमबीईडी) पर आधारित है जिसके तहत बिजली मंत्रालय की योजना एक केंद्रीय शेड्यूलिंग और पूलिंग व्यवस्था कायम करने की है जो समुचित कीमत पर बिजली का आवंटन करेगी। इस दौरान सबसे कम लागत और सर्वाधिक किफायत वाले उत्पादकों को प्राथमिकता दी जाएगी जबकि महंगे उत्पादकों को तवज्जो नहीं दी जाएगी। इस अनिवार्य व्यवस्था का लक्ष्य है उपभोक्ताओं की बिजली खरीद की लागत को शुरुआत में 5 फीसदी तक कम करना ताकि वर्तमान विकेंद्रीकृत एवं स्वैच्छिक व्यवस्था को प्रतिस्थापित किया जा सके।
वर्तमान व्यवस्था राज्यों के लोड डिस्पैच केंद्रों की मदद से संचालित होती है जो क्षेत्रीय लोड डिस्पैच केंद्रों से संबद्ध हैं और अंतत: राष्ट्रीय लोड डिस्पैच केंद्रों से जुड़े हैं जो एक अंतरक्षेत्रीय बिजली ग्रिड तैयार करते हैं। प्रभावी तौर पर देखें तो हर राज्य और क्षेत्र मांग और उत्पादन की निगरानी करता है और उनमें संतुलन कायम करके रखता है।
इस मौजूदा व्यवस्था को जो यकीनन अपूर्ण है, एक केंद्रीय व्यवस्था के जरिये प्रतिस्थापित करना बिजली बाजार की दो अहम लेकिन जानी-पहचानी हकीकतों की अनदेखी करता है। पहली बात तो यह कि बिजली उत्पादक अपनी अधिकांश क्षमता का सौदा दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौतों के तहत करते हैं। राज्यों की वितरण कंपनियों के साथ ये सौदे प्राय: 25 वर्ष तक की अवधि के लिए किए जाते हैं।
इन दीर्घकालिक सौदों में एमबीईडी न्यूनतम लागत मूल्य के साथ कैसे आएगा यह अभी स्पष्ट नहीं है। सैद्धांतिक तौर पर किफायती बिजली उत्पादक एमबीईडी व्यवस्था को तरजीह दे सकते हैं लेकिन फिलहाल जो हालात हैं उनके मुताबिक तो वे ऐसी स्थिति में रहेंगे जहां वे 13 फीसदी से भी कम बिजली इस केंद्रीकृत नेटवर्क के हवाले कर पाएंगे। वे अल्पावधि और मध्यम अवधि के द्विपक्षीय सौदे भी करते हैं और उनके पास अग्रिम और तात्कालिक बाजार के लिए भी सीमित बिजली उपलब्ध रहती है।
दूसरी बड़ी और पुरानी समस्या है राज्यों की वह प्रवृत्ति जिसके तहत उनमें राजनीतिक रूप से संवेदनशील समूहों को लागत से कम दर पर बिजली देने की आदत होती है। राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों की खस्ता हालत की यह एक बड़ी वजह है। इन कंपनियों का वर्तमान संयुक्त बकाया करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये है। बीते एक दशक के दौरान इन समस्याओं को हल करने के लिए कई केंद्रीय योजनाएं पेश की गईं और उनमें से लगभग आधी विफल साबित हुईं। इनमें से नवीनतम योजना है वितरण क्षेत्र में सुधार की योजना। ऐसे में एमबीईडी का क्रियान्वयन राज्य सरकारों पर निर्भर है कि वे यह राजनीतिक साहस जुटाएं कि बिजली को समुचित आर्थिक कीमत पर बेचा जा सके। भारत दशकों से ऐसा नहीं कर पाया है।
आखिर में एमबीईडी संवैधानिक समस्याएं भी पैदा कर सकता है। बिजली अनुवर्ती सूची में है और केंद्रीकृत मूल्य और आपूर्ति के निर्णय राज्यों की स्वायत्तता का हनन करेंगे। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि एमबीईडी प्रणाली के पहले चरण की समय सीमा को इस वर्ष 1 अप्रैल की तारीख से आगे बढ़ा दिया गया है। अभी तक किसी नई तारीख की घोषणा नहीं की गई है। इससे संकेत मिलता है कि शायद इसके क्रियान्वयन में व्यावहारिक दिक्कतें हैं।