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देशज भाषाओं में शिक्षा वास्तविकता से परे

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 4:01 AM IST

मोदी सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के एक पहलू को लेकर बहस छिड़ गई है। नई नीति में कहा गया है कि बच्चों को कक्षा 5 तक और संभव हो तो कक्षा 8 तक की शुरुआती शिक्षा उनकी मातृभाषा, क्षेत्रीय या घरेलू भाषा (इसका जो भी अर्थ हो) में दी जानी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि यह आरएसएस का हिंदीकरण है। जबकि इसका बचाव करने वालों का कहना है बच्चे अपनी स्थानीय भाषा में बेहतर ढंग से शिक्षा हासिल करते हैं। कहा जा रहा है कि यह केवल एक अनुशंसा है, ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।
परंतु यह पहली ऐसी शिक्षा नीति है जिसका क्रियान्वयन पूर्ण बहुमत वाली राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी सरकार कर रही है। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में इसे अनिवार्य बनाना संभव भी नहीं था। शिक्षा समवर्ती सूची में है। लेकिन देश के अधिकांश राज्य जिनमें कई अहम राज्य शामिल हैं, भाजपा शासित भी हैं।
अनिवार्यता हो या नहीं लेकिन कोशिश यही है कि स्थानीय भाषाओं को अंग्रेजी पर वरीयता दी जाए। शिक्षा नीति मेंं तीन भाषाओं का फॉर्मूला यह भी कहता है कि इन तीनों मेंं कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी चाहिए। कहने का आशय यह है कि अंग्रेजी विदेशी भाषा है। हमें विचार तो करना था कि ऐसी मूर्खतापूर्ण परिभाषाएं अमेरिकी भी प्रयोग करते हैं। भले ही उन्हें खुद ठीक से हिज्जे न आते हों लेकिन वे अमेरिका में आने वाले विदेशी छात्रों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेजी की टोफल नामक परीक्षा पास करें। अंग्रेजी अब एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है और अलग-अलग देश में इसके अलग-अलग रूप प्रचलित हैं। भारत में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक इसके नाना स्वरूप हैं।
अब जबकि हिंदी या स्थानीय भाषाओं को लेकर मोदी सरकार का रुख स्पष्ट है तो काफी संभव है कि अधिकांश राज्य सरकारें भी उस पर अमल करेंगी। उनके विद्यालयों में अवमानना का साहस तो नहीं ही है, शायद निजी विद्यालयों को भी ऐसा करने को कहा जाए।
लोग फिर कुछ न कुछ तरीका निकालने का प्रयास करेंगे: ताकतवर से ताकतवर सरकार भी बाजार की ताकतों से नहीं लड़ सकती। यदि उपभोक्ता किसी चीज को शिद्दत से चाहेगा तो वह उसे मिलेगी। मसलन भारतीय मां-बाप को अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय मिलेंगे। तब अल्पसंख्यक संस्थान और कॉन्वेंट जैसे भ्रामक जुमले सामने आएंगे। कॉन्वेंट तो अब देश के अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का समानार्थी बन चुका है। आपको देश भर में गैर ईसाई संतों मसलन कबीर, तुकाराम और रविदास के नाम पर भी कॉन्वेंट विद्यालय मिलेंगे।
यदि आपको लगता है कि मोदी सरकार यह काम राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है तो इसे जांचने की आवश्यकता है। क्योंकि बीते दशकोंं के दौरान हमारे राजनेता जान चुके हैं कि क्या कारगर है और क्या नहीं। उन्हें पता है कि मतदाताओं को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय चाहिए। ऐसे में संभव है कि वे सार्वजनिक रूप से एक बात कहें लेकिन हकीकत में उसका उलटा करें।
वैचारिक आग्रहों से इतर हमारे धरती से जुड़े राजनेताओं को यह बात अच्छी तरह पता है कि मतदाता अपने बच्चों की शिक्षा के लिए तीन चीजें चाहते हैं: अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी।
बीते 25 वर्ष से अधिक समय में चुनावों के दौरान दूरदराज इलाकों के भ्रमण कर और जमीनी राजनीति की परख कर मैंने ‘राइटिंग ऑन द वाल’ नामक शृंखला लिखी। यह एक रूपक है जिसका अर्थ है लोगों की इच्छाओं को समझने के लिए अपने आंख, कान और नाक खुले रखना। इसके बाद आप देखते हैं कि प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक प्रत्याशी उन्हें क्या पेशकश कर रहा है। जो जनता की चाह को समझता है वही जीतता है। अगर आप इस बात को समझ जाएं तो चुनाव के बारे में सटीक अनुमान लगा सकते हैं। इसके साथ केवल एक शर्त है कि ऐसा करते समय आप अपने पूर्वग्रहों को दूर रखें। एक धुर हिंदीभाषी के रूप में यह मेरी प्रतिष्ठा को भी स्थापित करता है।
लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं का पहला संदेश हमने दीवारों पर ही पढ़ा। खासतौर पर बिहार मेंं 2005 में हुए दो चुनावों में जिनमें पहला चुनाव अनिर्णायक रहा था। लालू प्रसाद अपने पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक की बदौलत सत्ता में थे और कोई नहीं मान रहा था कि नीतीश कुमार उन्हें हटा सकते हैं। लालू का सामाजिक न्याय का विचार अभी भी ऊंची जातियों को परास्त करने के लिए पिछड़ों को सशक्त बनाने पर केंद्रित था। उनकी पसंदीदा कहावत थी-फिर से समय आ गया है, अपनी लाठी को तेल पिलाओ। राजनीतिक जानकारोंं ने कहा कि इस नारे मेंं अपील है और नीतीश कुमार के लिए गुंजाइश नहीं थी। खासकर इस कमजोर दलील के साथ कि : लाठी मेंं तेल पिलाकर मजबूत बनने का जमाना गया, अब कलम में स्याही भरकर मजबूती हासिल की जाती है।
हो सकता है ज्ञानी लोग उन पर हंसे हों लेकिन आखिरकार उन्होंने लालू को हरा दिया और तब से वह मुख्यमंत्री हैं। नीतीश कुमार लगातार जीत रहे हैं क्योंकि वह जनता की नब्ज को पहचानते हैं। अब नवाकांक्षाओं की बाढ़ है और उसे शिक्षा के ईंधन की आवश्यकता है। परंतु आप मुझसे पूछ सकते हैं कि इसका शिक्षा के माध्यम से क्या ताल्लुक? यह बात हमें पश्चिम बंगाल के 2011 के चुनाव प्रचार की याद दिलाती है। बिहार के 2005 के नीतीश बनाम लालू की तरह यहां चुनाव ममता बनाम वाम मोर्चे में था। वाम मोर्चा वहां 34 वर्ष से सत्ता पर काबिज था।
हमने ममता बनर्जी को दुर्गापुर के निकट बरजोरा नामक स्थान पर पकड़ा। वह पश्चिम बंगाल का बेहद गरीब इलाका है। ममता बनर्जी के हाथ में माइक था और वह मंच पर इधर से उधर चहलकदमी कर रही थीं। अचानक उन्होंने गुनगुनाना शुरू कर दिया और जनता बेहद उत्साहित थी। वह गा रही थीं ‘अ ए अजगर आश्चे तेरे’ और जनता जोश के साथ दोहराती, ‘आ आमती खाबो पेड़े’ (यानी अगर अजगर आपकी ओर आ रहा है, पेड़ से आम तोड़ो और खा लो)। परंतु वे गरीब लोग इसे लेकर इतने जोश में क्यों थे? वह लोगों को याद दिला रही थीं कि दशकों तक वाम मोर्चे ने पीढ़ी दर पीढ़ी उनके बच्चों को बांग्ला माध्यम से पढऩे पर मजबूर किया और उनके खुद के बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हैं और ट्विंकल, ट्विंकल लिटल स्टार गाते हैं। उन्होंने कहा कि नतीजा यही है कि उनके बच्चे चपरासी की नौकरी के लिए गिड़गिड़ाते हैं जबकि कॉमरेडों के बच्चे इंगलैंड जाकर बैरिस्टर बनते हैं। उस चुनाव में जीतने वाली ममता आज भी सत्ता में हैं और वाम दल उनकी चिंता में कहीं नहीं हैं।
ये दो ऐसे नेता हैं जो जमीनी हकीकत को समझते हैं। एक ने ज्ञान और शिक्षा के वादे पर चुनाव जीता तो दूसरे ने अंग्रेजी माध्यम का हवाला दिया। उनके मतदाता सामाजिक बुर्जआ वर्ग से नहीं आते। उस वर्ग के लोग वोट देने नहीं जाते। आप चाहें तो मुंबई के मालाबार हिल इलाके का मत प्रतिशत जांच सकते हैं।
चूंकि हम प्राय: तीन उदाहरणों के नियम का पालन करते हैं इसलिए मैं एक और उदाहरण दूंगा। खासतौर पर इसलिए कि हमारे तीनों उदाहरण अलग-अलग दलों और विचारधाराओं से आते हैं। योगी आदित्यनाथ ने सन 2017 में आदेश पारित करके कहा कि 5,000 सरकारी प्राथमिक शालाओं को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में तब्दील किया जाएगा। क्या योगी बुर्जुआ हैं? अंग्रेजी को लेकर आसक्त हैं? पश्चिमीकृत हैं? भूरे साहब हैं? जी नहीं बल्कि वह भगवाधारी संत हैं। वह धरती से जुड़े हुए व्यक्ति हैं। उन्हें पता है कि उनके मतदाताओं को क्या चाहिए। ऐसे में अगर सरकार विचारधारा के चलते देशज भाषाई माध्यम से पढ़ाई पर जोर देगी तो उसे इस हकीकत से टकराना होगा।

First Published : August 2, 2020 | 11:03 PM IST