Budget 2026: सरकार ने रविवार को डिविडेंड और म्युचुअल फंड इनकम से संबंधित ब्याज खर्चों पर मिलने वाली कटौती को खत्म करने का प्रस्ताव रखा। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस प्रस्ताव से वह मौजूदा प्रावधान खत्म हो जाएगा, जिसके तहत डिविडेंड या म्युचुअल फंड आय के 20 फीसदी तक के ब्याज खर्चों पर कटौती की अनुमति मिलती थी।
आम बजट 2026-27 के अनुसार, ”यह प्रस्ताव है कि डिविडेंड इनकम या म्युचुअल फंड की यूनिट्स से होने वाली कमाई के संबंध में किए गए किसी भी ब्याज खर्च पर कोई कटौती नहीं दी जाएगी। साथ ही, एक तय सीमा तक ऐसी कटौती की अनुमति देने वाले मौजूदा प्रावधान को हटाने का भी प्रस्ताव है।”
यह बदलाव आयकर अधिनियम, 2025 का हिस्सा है, जो एक अप्रैल, 2026 से प्रभावी होगा।
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अब अगर निवेशक लोन लेकर निवेश करते हैं, तो उनके लोन के ब्याज जैसे खर्चों को डिविडेंड या म्युचुअल फंड आय से घटाया नहीं जाएगा। इससे ऐसी आय पर टैक्स योग्य रकम प्रभावी रूप से बढ़ जाएगी।
सैमको सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट राज गैकर ने कहा, “यह बदलाव निवेशकों के लिए टैक्स का बोझ बढ़ाएगा। अब डिविडेंड और म्युचुअल फंड से होने वाली आय पर ब्याज खर्च घटाने की अनुमति नहीं होगी। इसका मतलब है कि इस आय पर पूरा टैक्स देना होगा, बिना किसी कटौती के।”
उन्होंने आगे कहा कि जो निवेशक उधार लेकर निवेश करते हैं, उन पर इसका असर ज्यादा पड़ेगा। इससे डिविडेंड आधारित और नियमित आय देने वाली निवेश रणनीतियों से मिलने वाला नेट रिटर्न घट जाएगा। नतीजतन, ऐसी निवेश योजनाएं अब पहले के मुकाबले कम आकर्षक हो जाएंगी।
चलिए, इसे एक उदाहरण से आसान भाषा में समझते हैं। बीपीएन फिनकैप के डायरेक्टर ए. के. निगम कहते हैं, मान लीजिए आपने डिविडेंड देने वाले म्युचुअल फंड में निवेश करने के लिए ₹10 लाख का लोन लिया। इस लोन पर 8 फीसदी ब्याज है, यानी सालाना ₹80,000 ब्याज देना होता है। इस निवेश से आपको साल में ₹1 लाख का डिविडेंड मिलता है।
पहले के नियम के अनुसार
डिविडेंड इनकम: ₹1 लाख (टैक्स के दायरे में)
ब्याज की कटौती: ₹80,000 (टैक्सेबल आय कम हो जाती थी)
टैक्सेबल आय: ₹1 लाख – ₹80,000 = ₹20,000
बजट प्रस्ताव के बाद
डिविडेंड इनकम: ₹1 लाख (टैक्स के दायरे में)
ब्याज पर कोई टैक्स कटौती नहीं
टैक्सेबल आय: ₹1 लाख
ब्याज पर मिलने वाली टैक्स कटौती हटने से अब आपकी टैक्सेबल आय बढ़ जाती है। इससे आप हाई टैक्स स्लैब में जा सकते हैं या आपकी कुल टैक्स देनदारी बढ़ सकती है।
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गैकर कहते हैं, निवेश रणनीति के नजरिए से देखें तो निवेशक अब ऐसी एसेट्स की ओर रुख कर सकते हैं, जिनमें नियमित आय के बजाय पूंजी वृद्धि (कैपिटल एप्रिसिएशन) पर ज्यादा जोर होता है। इस बदलाव से उधार लेकर निवेश करने (लेवरेज्ड इन्वेस्टिंग) को भी हतोत्साहित किया जाएगा, क्योंकि अब ब्याज खर्च को टैक्स से एडजस्ट नहीं किया जा सकेगा, जिससे जोखिम के मुकाबले मिलने वाला रिटर्न घट जाएगा।
कुल मिलाकर, यह कदम कम कर्ज और मजबूत बैलेंस शीट को बढ़ावा देता है। साथ ही यह निवेशकों को टैक्स दक्षता और लंबी अवधि में वैल्यू क्रिएशन पर ज्यादा ध्यान देते हुए अपने पोर्टफोलियो की बनावट पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित करता है।