चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर ने सभी अनुमानों का धता बता दिया। शुक्रवार को जारी आधिकारिक आकंड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में स्थिर कीमतों पर 8.2 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई। इस दमदार प्रदर्शन की बदौलत पहली छमाही में जीडीपी वृद्धि दर 8 प्रतिशत हो गई, जो पिछले साल 6.1 प्रतिशत थी।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में वृद्धि दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। विनिर्माण क्षेत्र 9.1 प्रतिशत तेजी से बढ़ा और निर्माण क्षेत्र में भी 7.2 प्रतिशत तेजी देखी गई। तृतीयक क्षेत्र ने भी 9 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर दर्ज की। इन क्षेत्रों के दमदार प्रदर्शन से अर्थव्यवस्था को ताकत मिली। व्यय के मामले में निजी खपत मजबूत हुई और 7.9 प्रतिशत बढ़ी जबकि निवेश वृद्धि थोड़ी धीमी होकर 7.3 प्रतिशत रही, जो पहली तिमाही में यह 7.8 प्रतिशत थी।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन असाधारण रहा है। यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि क्योंकि पिछले कुछ महीनों से बाहरी हालात देश-दुनिया के लिए अनुकूल नहीं रहे हैं। अमेरिका की व्यापार नीतियों से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता काफी बढ़ गई है। अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क लगाया है जिसका असर अब दिखने लगा है। लिहाजा अधिकांश अर्थशास्त्रियों को आशंका है कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में वृद्धि दर थोड़ी नरम हो जाएगी।
हालांकि,अच्छी बात यह है कि सरकार को जल्द ही अमेरिका के साथ व्यापार समझौता होने की उम्मीद है। एक द्विपक्षीय निवेश संधि पर भी बातचीत चल रही है जिससे मध्यम अवधि में निवेश में सुधार हो सकता है। घरेलू मोर्चे पर माल एवं सेवा कर (जीएसटी) दरों में संशोधन का असर दिसंबर तिमाही के आंकड़ों में दिखना चाहिए।
सरकार ने सितंबर में जीएसटी दरों में संशोधन किया था। इन सभी सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि पूरे वित्त वर्ष में वृद्धि दर 7 प्रतिशत से अधिक हो सकती है जिसे वर्तमान वैश्विक आर्थिक हालात को देखते हुए काफी उत्साहजनक माना जाएगा। सरकार द्वारा श्रम संहिताओं की अधिसूचना और पिछले सप्ताह आरबीआई द्वारा 9,000 से अधिक परिपत्रों और निर्देशों के समेकन जैसे उपाय भी कारोबार में सुगमता बढ़ाने में मददगार साबित होंगे।
हालांकि, वास्तविक दृष्टि से ये आंकड़े शानदार नजर आते हैं मगर नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर ने चिंता की वजह भी दे दी है। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में अर्थव्यवस्था की नॉमिनल वृद्धि दर 8.8 प्रतिशत ही रही। दूसरी तिमाही में नॉमिनल और वास्तविक वृद्धि दर के बीच अंतर केवल 50 आधार अंक रहा जिसकी वजह कम मुद्रास्फीति मानी जा रही है।
मगर कंपनियों की आय और कर राजस्व नॉमिनल वृद्धि दर से संबद्ध हैं। नॉमिनल वृद्धि दर मजबूत नहीं रहने से अर्थव्यवस्था पर कई तरह के असर दिख सकते हैं। उदाहरण के लिए अप्रैल-अक्टूबर अवधि में कर संग्रह में केवल 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि अक्टूबर में इसमें तेज वृद्धि हुई थी। पूरे वित्त वर्ष के लिए सकल कर राजस्व तभी हासिल हो पाएगा जब नवंबर-मार्च अवधि में कर संग्रह में 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज होगी। मगर यह फिलहाल काफी मुश्क्लि दिख रहा है।
सरकार ऋण-जीडीपी अनुपात साधने के लिए कदम बढ़ रही है, इसलिए मध्यम अवधि के लिहाज से नॉमिनल वृद्धि दर लगातार कम रहना जटिल स्थिति उत्पन्न कर सकता है। अगले साल जीडीपी आधार में प्रस्तावित संशोधन पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। हालांकि, फौरी तौर पर नीतिगत प्रश्न यह उठता है कि जीडीपी के ये आंकड़े मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के लिए क्या मायने रखते हैं जिसकी बैठक इस सप्ताह होनी है। इस बात का पहले भी जिक्र हो चुका है कि एमपीसी का निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि मुद्रास्फीति के आंकड़ों ने आने वाली तिमाहियों के लिए संभावनाओं को कैसे प्रभावित किया है। वर्तमान आर्थिक वृद्धि दर को ध्यान में रखते हुए ब्याज दर में 25आधार अंक की कमी से कोई बड़ा अंतर आने की संभावना नहीं है।