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Editorial: नया द्विपक्षीय दौर

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अब वह समय नहीं रहा जब बहुपक्षीय स्तर पर आसानी से मुद्दों को वीटो कर दिया जाता था। अब यह आवश्यक है कि रियायत दी जाएं और बहुपक्षीय स्तर पर मोलभाव किया जाए।

Last Updated- March 02, 2025 | 9:53 PM IST
Nirmala Sitharaman
बिजनेस स्ट्रैंडर्ड हिन्दी

गत सप्ताह बिज़नेस स्टैंडर्ड के आयोजन ‘मंथन’ में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने द्विपक्षीय वार्ताओं और समझौतों के बढ़ते महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीयता ‘एक तरह से समाप्त’ हो गई है। उन्होंने दलील दी कि ऐसी स्थिति में भारत को व्यापार, निवेश और रणनीतिक रिश्तों में ऐसे द्विपक्षीय समझौतों पर जोर देना होगा। भारत के हितों को प्राथमिकता देने के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों को इस तरह से आकार देना आवश्यक होगा। सीतारमण की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब यूरोपीय आयोग भारत की यात्रा पर है और जिसके परिणामस्वरूप द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के लिए आकांक्षी समयसीमा की घोषणा की गई। ऐसे मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना उस ‘रीसेट’ के लिए आवश्यक होगा जिसके बारे में सीतारमण ने बात की।

सीतारमण ने वैश्विक शासन के बदलते परिदृश्य पर जो दृष्टिकोण पेश किया है उसका समर्थन करने वाले कई प्रमाण मौजूद हैं। बीते दशक में दुनिया के कई हिस्सों में लोकलुभावन आंदोलनों ने उस आधार को चुनौती दी है जिस पर वैश्वीकरण को अंजाम दिया गया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था भी इसी पर आधारित थी। यहां तक कि बहुपक्षीयता में बहुत अधिक भरोसा करने वाले लोग भी विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संस्थानों में चीन के भारी प्रभाव को देखकर निराश हैं। विश्व व्यापार संगठन भी चीन द्वारा अपने निर्यात क्षेत्रों को दी जा रही छिपी हुई सब्सिडी पर लगाम लगा पाने में विफल रहा। ऐसे में वह विश्व व्यापार के लिए समान क्षेत्र नहीं निर्मित कर पाया। परंतु बहुपक्षीय व्यवस्था को सबसे बड़ा झटका इसके मुख्य गारंटर और प्रायोजक अमेरिका के पाला बदलने से लगा।

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अधीन अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते से दूरी बना ली है। अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन की अपील संस्था में कर्मचारी रखने से इनकार करने के बाद यह संस्था नख दंत विहीन हो गई है। विभिन्न देशों पर मनमाना टैरिफ लागू करने से विश्व व्यापार के बुनियादी सिद्धांतों को नुकसान पहुंचा है। यह अच्छी खबर नहीं है। बहुपक्षीय संस्थानों और नियम आधारित व्यवस्था यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में बड़े देश, छोटे देशों के साथ किस तरह का आचरण करते हैं इस पर कुछ नियंत्रण कायम किया जा सके। समान द्विपक्षीय समझौते बहुत कम होते हैं क्योंकि वार्ता में शामिल पक्षों का आकार और उनकी ताकत भी ध्यान में रखी जाती है। भारत विश्व व्यापार में बहुत मजबूत उपस्थिति नहीं रखता है और वह ऐसी स्थिति में नहीं है कि जहां वह अपनी प्राथमिकता को द्विपक्षीय ढंग से आरोपित कर सके।

बहरहाल, उसे वर्तमान वैश्विक हालात से निपटने के लिए बेहतर से बेहतर तैयारी करनी चाहिए। उसे उन बहुलवादी संस्थानों में शामिल होना चाहिए जो बहुपक्षीय संस्थानों का अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए विश्व व्यापार संस्था की स्वैच्छिक बहुपक्षीय अंतरिम अपील मध्यस्थता व्यवस्था। इसे द्विपक्षीय वार्ताओं के लिए उपलब्ध संसाधनों और क्षमताओं का भी विस्तार करने की आवश्यकता है। सरकार को अंतरविभागीय प्रक्रिया गठित करनी चाहिए ताकि अन्य मंत्रालयों या विभागों से संबंधित मुद्दों या विनियमों पर राजनयिकों या आर्थिक संबंधों के अफसरशाहों द्वारा ऐसी वार्ताओं में चर्चा किए जाने पर होने वाली देरी को कम से कम किया जा सके। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे यह चिह्नित करना होगा कि उसे ऐसी द्विपक्षीय चर्चाओं में अधिक से अधिक लक्षित रियायत देनी होगी। अब वह समय नहीं रहा जब बहुपक्षीय स्तर पर आसानी से मुद्दों को वीटो कर दिया जाता था। अब यह आवश्यक है कि रियायत दी जाएं और बहुपक्षीय स्तर पर मोलभाव किया जाए।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता इस नए द्विपक्षीय दौर में भारत की प्रतिबद्धता के लिए परीक्षण का विषय होगा। इस समझौते को लेकर उच्च स्तरीय राजनीतिक ऊर्जा और ध्यान स्वागतयोग्य है और इस वर्ष के अंत तक इसे पूरा करने के वादे पर खरा उतरने का हरसंभव प्रयास होना चाहिए।

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First Published - March 2, 2025 | 9:53 PM IST

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