हाल ही में दो ऐसे फैसले आए हैं जिन्होंने उपभोक्ताओं के अधिकारों को और मजबूती देने का काम किया है।
पहला फैसला राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग की ओर से भारतीय रिजर्व बैंक बनाम ईश्वरप्पा मामले में दिया गया था जिसमें रिजर्व बैंक की इस बात के लिए आलोचना की गई थी कि वह छोटी श्रेणी के जमाकर्ताओं की परेशानियों को और बढ़ा रहा है।
दूसरा फैसला उच्चतम न्यायालय ने जमीन के एक मालिक के मामले में सुनाया था जिसने अपनी जमीन पर अपार्टमेंट बनाने के लिए बिल्डर के साथ समझौता किया था। आरबीआई के मामले से यह पता चलता है कि कैसे केंद्रीय बैंक के ढीले रवैये से मध्यम वर्ग के जमाकर्ताओं को परेशानी उठानी पड़ी थी।
इस दर्जे के उपभोक्ता अपनी जिंदगी भर की कमाई में से थोड़ा बहुत बचा कर फिक्स्ड डिपॉजिट में लगाते हैं और अगर उसके बाद उन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़े तो निश्चित तौर पर यह दुख पहुंचाने वाला है। बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट की धारा 35 ए के तहत आरबीआई को यह अधिकार है कि वह ऐसे वाणिज्यिक बैंकों पर रोक के आदेश जारी कर सकता है और चाहे तो जामाकर्ताओं के भुगतान पर रोक भी लगा सकता है अगर केंद्रीय बैंक को यह लगता है कि कोई बैंक ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा है।
कुछ ऐसे ही मामले में आरबीआई ने हुबली में महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक के खिलाफ आदेश जारी किया था। बात 2004 की है। इस मामले में जमाकर्ताओं के भुगतान पर आरबीआई ने रोक लगा दी थी। तब से ही जमाकर्ता लगातार विभिन्न जिला उपभोक्ता फोरम, कर्नाटक राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाते रहे हैं। आरबीआई और को-ऑपरेटिव बैंक की यह दलील थी कि इस मामले में उपभोक्ता मंच को फैसला देने का कोई अधिकार नहीं है। पर हर बार उनकी दलील को खारिज कर दिया गया।
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस बारे में जो फैसला सुनाया उससे उम्मीद है कि निवेशकों की परेशानियां खत्म हो सकेंगी, अगर खुद बैंक ही उच्चतम न्यायालय में भुगतान को और टालने के लिए अपील करे तो यह अलग बात है। इस फैसले में कहा गया कि निवेशकों को जो परेशानी हुई, उसकी वजह यह थी कि आरबीआई ने धारा 35 ए का इस्तेमाल करते हुए बैंक के खिलाफ आदेश जारी किया था। आरबीआई आदेश जारी की चुपचाप बैठी रहा और मामले में आगे कोई कार्रवाई भी नहीं की गई।
न तो आदेश को वापस लिया गया और न ही संबंधित बैंकों को यह अनुमति दी गई कि वे उपभोक्ताओं को उनकी रकम का भुगतान कर सकें। उलटे इस मामले में आरबीआई चार साल तक जमाकर्ताओं के साथ आरोप प्रत्यारोप का खेल खेलता रहा और इससे कई निवेशक परेशान होते रहे। आयोग ने इसे दुखद घटनाक्रम करार दिया। इस फैसले में डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऐक्ट की खामियों के बारे में बताया गया। यूं तो इस ऐक्ट में छोटे जमाकर्ताओं को एक लाख रुपये तक की गारंटी के भुगतान का प्रावधान है।
पर इस सुनवाई में साफ किया गया कि कुछ पेंच लगाकर कैसे इस अधिकार को रोके रखने की कोशिश की गई थी। फैसले में साफ किया गया, ‘इस कानून का उल्लेख सिर्फ कागजों पर ही है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसे इस तरीके से तैयार किया गया है कि बीमा कवर का फायदा तभी हो सकता है जब धारा 16 के तहत वापसी के आदेश ले लिये जाएं या फिर तरलता प्रदान करने के आदेश दे दिए जाएं। ऐसे में भले ही कहा जाए कि बीमा कवर छोटे निवेशकों के हित को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया है पर इससे अंतत: छोटे निवेशकों को निराशा और परेशानी ही होती है क्योंकि बैंक से उन्हें तब तक रकम की प्राप्ति नहीं हो सकती है जब तक आरबीआई की ओर से तरलता का आदेश जारी नहीं किया जाता।
या फिर जब तक आरबीआई बैंकों को इस दिशा में आगे काम करने की इजाजत नहीं देता है। इस मामले से पता चलता है कि अगर आरबीआई चुपचाप बैठा रहे और किसी मामले में त्वरित कदम न उठाए तो कैसे छोटे निवेशकों को परेशानी उठानी पड़ सकती है। आखिर किस तरह उन्हें अपने फिक्स्ड डिपॉजिट की रकम को पाने के लिए इधर से उधर चक्कर लगाना पड़ सकता है। धारा 35 ए के तहत आरबीआई ने जो आदेश जारी किया था उससे निवेशकों को अपनी जमा राशि को पाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। और क्रेडिट इंश्योरेंस कंपनियां ऐसे में मौके का नाजायज फायदा उठाती हैं। इससे साफ होता है कि ब्यूरोक्रेसी किसी भी स्तर पर कार्यवाही में अड़चन डाल सकती है। ‘
आयोग ने बैंक के लिक्विडेटर को आदेश दिया कि वह जमाकर्ताओं को उनके पैसे का भुगतान करें और इस रकम की वापसी वे क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन से करें। आयोग ने बैंकिंग रेग्युलेशन ऐक्ट और क्रेडिट गारंटी ऐक्ट को और कारगर बनाने के लिए उनमें कुछ बदलाव करने का सुझाव भी दिया। आयोग ने उच्चतम न्यायालय के उस फैसले को याद किया जो 1994 में लखनऊ विकास प्राधिकरण के मामले में दिया गया था जिसमें कहा गया था कि, उपभोक्ता संरक्षण कानून का महत्त्व तभी है जब वह समाज कल्याण को बढ़ावा दे सके और उपभोक्ताओं को यह अवसर प्रदान कर सके कि वे सीधे बाजार की अर्थव्यवस्था में भागीदारी कर सकें।’
फकीर चंद बनाम उप्पल एजेंसी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने एक और महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया था। इस फैसले में उपभोक्ता शब्द की वास्तविक परिभाषा को स्पष्ट किया गया था। इसके अर्थ को और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई थी। अगर जमीन का कोई मालिक किसी फ्लैट के निर्माण के लिए बिल्डर के साथ संयुक्त रूप से करार करता है तो यह बहुत ही सामान्य सी बात है। अगर समझौते के बाद बिल्डर म्युनिसिपल कानून का उल्लंघन करते हुए कोई कदम उठाता है तो क्या ऐसे में जमीन का मालिक उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। इस मामले में दो तरह के फैसले आए।
उपभोक्ता अदालत ने कहा कि जमीन का मालिक ऐसे में अदालत में अपील नहीं कर सकता जबकि उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जमीन का मालिक अपील कर सकता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भले ही समझौते को संयुक्त उद्यम का नाम दिया जाता है फिर भी कई मामलों में ऐसा न हो यह भी संभव है। कोई संयुक्त उद्यम दो भागीदारों के बीच व्यापारिक समझौता है। ऐसे में जमीन का मालिक कोई उपभोक्ता नहीं है। पर अगर वह सिर्फ कॉन्ट्रैक्टर की भूमिका निभाता है तो उसे यह हक है कि वह उपभोक्ता मंच का दरवाजा खटखटा सके। तब उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि दिल्ली स्थित उपभोक्ता मंच अपने फैसले पर फिर से विचार करे।