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जीवन शैली में बदलाव से दूर होगा जलवायु संकट

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:15 PM IST

एक अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण को असाधारण नुकसान हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्रीय, स्वच्छ जल और तटीय एवं खुले सागर के जलीय पारिस्थितिकीतंत्र को भारी नुकसान पहुंचा है। इन समस्याओं से निपटने के लिए नीतिगत स्तर पर शुरू किया प्रयास आपूर्ति पक्ष में बदलाव लाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इन बदलावों में कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले उत्पादों पर जोर दिया जा रहा है। खासकर कम बिजली या ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले उपकरणों के निर्माण एवं इनके उपयोग की विशेष हिमायत की जा रही है।
जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है उसे देखते हुए मांग के मोर्चे पर भी उतना ही ध्यान देने की की आवश्यकता महसूस की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2021 में यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) में शामिल पक्षों की ग्लासगो में हुई बैठक में ‘पर्यावरण अनुकूल जीवन-शैली’ अभियान में यही दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया था। जीवन-शैली पर ध्यान इस पक्ष पर जोर देने का प्रयास है कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन की समस्या का निवारण केवल आपूर्ति के मोर्चे पर तकनीकी बदलाव लाकर नहीं किया जा सकता है बल्कि मांग के स्तर पर भी व्यवहारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है। हाल में चीन के एक शोध संगठन के अध्ययन में 116 देशों के लिए वस्तुवार उपभोग आंकड़ों का इस्तेमाल कर उपभोग से जुड़ी आदतों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव का अनुमान लगाया गया है।
वैश्विक स्तर पर दुनिया की कुल आबादी में 10 प्रतिशत सबसे धनी लोग 47 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। इनमें भी सर्वाधिक धनी 1 प्रतिशत 15 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। बीच की 40 प्रतिशत आबादी 43 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है इसलिए इस समूह का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कमोबेश वैश्विक औसत जितना है। सर्वाधिक गरीब 50 प्रतिशत लोग केवल 10 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। लिहाजा यह कहा जा सकता है कि दुनिया की आबादी में सर्वाधिक धनाढ्य 1 प्रतिशत लोगों का प्रति व्यक्ति उपभोग सर्वाधिक 50 प्रतिशत गरीब लोगों के प्रति व्यक्ति उपभोग की तुलना में 75 प्रतिशत अधिक है।
अमीर एवं गरीब लोगों के भौगोलिक वितरण में काफी असमानता है। सहारा मरुस्थलीय देशों में रहने वाली ज्यादातर आबादी सबसे कम कार्बन उत्सर्जन करने वाली 50 प्रतिशत जनसंख्या में आती है। दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में आधी से अधिक आबादी कम कार्बन उत्सर्जन करने वाली 50 प्रतिशत जनसंख्या में आती है। मगर पश्चिम देशों एवं सोवियत संघ के पूर्व देशों में 10 प्रतिशत से कम आबादी इस 50 प्रतिशत आबादी का हिस्सा है। इन देशों में अधिकांश आबादी बीच की 40 प्रतिशत आबादी का हिस्सा है। सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी पश्चिमी देशों और अमेरिका में अधिक है। अमेरिका में करीब 60 प्रतिशत राष्ट्रीय आबादी सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली 10 प्रतिशत आबादी का हिस्सा है।
प्रति डॉलर व्यय निम्रतम से उच्चतम आय वाले वर्गों में अलग-अलग है। ज्यादातर ऊंचे एवं मध्य-आय वाले देशों में कार्बन उत्सर्जन करने की रफ्तार उच्च आय समूह से निम्र आय वर्ग समूह में कम होती जाती है। भारत में इसका उलटा है। व्यय के लिहाज से कार्बन उत्सर्जन आय वर्गों के साथ बढ़ता जाता है और सबसे निचले आय वर्ग की तुलना में यह शीर्ष आय वर्ग में दोगुना है। इसका कारण यह है कि अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले उत्पादों जैसे कार एवं वातानुकूलित मशीनों का इस्तेमाल ज्यादातर शीर्ष आय वर्ग वाले लोग करते हैं।
ये आंकड़े इस ओर इशारा देते हैं कि जीवन शैली में बदलाव का अभियान दुनिया की 10 प्रतिशत सबसे धनी आबादी पर केंद्रित होना चाहिए। इनमें आधे लोग विकसित देशों में रहते हैं। ये आंकड़े यह भी बताते हैं कि कई देशों में एक असंतुलन की स्थिति जरूर बनेगी जब प्रति व्यक्ति धनाढ्य लोगों का कार्बन उत्सर्जन में कमी पर जोर दिया जाएगा और गरीब लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए उन्हें अधिक उत्सर्जन की इजाजत दी जाएगी। भारत इन्हीं देशों में एक है। क्या धनी देश इस बदलाव को स्वीकार करेंगे? 1992 में उपभोक्तावाद पर तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था, ‘अमेरिकी जीवन शैली पर किसी तरह का वाद-विवाद नहीं हो सकता।’
वास्तव में अमेरिका की जीवन शैली वैश्विक समस्या बन गई है। वहां की जीवन शैली के आधार पर ज्यादातर देशों में जीवन यापन मानक और उपभोक्ता व्यवहार तय हो रहे हैं। इस अंधाधुंध उपभोक्तावाद और मुनाफा कमाने की होड़ में बदलाव की जरूरत है। यह धनी देशों के साथ सभी देशों में होना चाहिए। 30 वर्ष पहले ‘रियो ऌऌपृथ्वी शिखर सम्मेलन’ में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश व्यावहारिक एवं दीर्घ अवधि के लिए अनुकूल उपभोग को बढ़ावा देने पर सहमत हुए थे। इनमें लोगों एवं परिवारों के लिए पर्यावरण के अनुकूल उपभोग से जुड़े कदम उठाना शामिल था। यह यूनएनएफसीसीसी की आगामी बैठकों में इस लक्ष्य को साधने का एक शुरुआती बिंदु हो सकता है। अगर भारत को वैश्विक स्तर पर इस अभियान को आगे बढ़ाना है तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए कदमों का साक्ष्य पेश करना होगा। शुरुआत के तौर पर सरकार को उत्पाद एवं आय समूह के आधार पर श्रेणीबद्ध व्यय से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन पर सर्वेक्षण शुरू करना चाहिए। यह व्यावहारिक एवं दीर्घकालिक जीवन-शैली तैयार करने का खाका उपलब्ध करा सकता है।
कार्बन उत्सर्जन अधिक करने वाले उपकरणों पर कर लगाने के लिए जिंसों की कीमतें प्रभावित करना एक अच्छा कदम नहीं माना जा सकता है। इससे धनी एवं गरीब लोगों के उपभोग में थोड़ी असमानता लाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। उदाहरण के लिए निजी वाहनों का इस्तेमाल रोकने के लिए पेट्रोल के दाम बढ़ाने से धनी लोगों पर न्यूनतम प्रभाव होगा जबकि मध्यम वर्ग पर असर अधिक होगा। परिवहन के लिए सार्वजनक साधनों पर निर्भर रहने वाले कम आय वर्ग के लोगों पर असर सर्वाधिक होगा। सार्वजनिक सड़कों पर निजी कारों के इस्तेमाल की खुली छूट पर पाबंदी लगाना एक रास्ता हो सकता है।
भारत में वर्तमान समय में पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली रखने के लिए कुछ खास उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इनमें कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अनिवार्य उत्पादन मानक तय करना, पर्यावरण के अनुकूल सुरक्षित उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खरीद कार्यक्रम शुरू  करना और कार्बन उत्सर्जन की मात्रा दिखाने के लिए उत्पादों पर लेबल लगाना आदि शामिल हैं। इनके अलावा सूचना तंत्र के माध्यम से उपभोक्ता का व्यवहार बदलना, अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन कम करना और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के कूड़े का अनिवार्य पुनर्चक्रीकरण आदि जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने के लिए धनी लोगों के उपभोग ढर्रों में बदलाव उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना आपूर्ति मोर्चे पर नए प्रयोग आवश्यक हैं। यह जलवायु परिवर्तन के विषय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी है और यूएनएफसीसीसी में यह लक्ष्य हासिल करने की दिशा में कदम उठाना भारत के लिए बिल्कुल वाजिब है।

First Published : April 4, 2022 | 11:25 PM IST