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विनिर्माण क्षमता का विस्तार: Apple से बढ़ी चीन की धमक भारत के लिए अहम सबक

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एक कंपनी ने चीन को manufacturing महाशक्ति बना दिया। अब भारत को विविधीकरण की लहर का लाभ उठाकर वही करना होगा।

Last Updated- June 18, 2025 | 11:33 PM IST
apple
प्रतीकात्मक तस्वीर

मैं इन दिनों एक बेहतरीन किताब पढ़ रहा हूं- ‘ऐपल इन चाइना – द कैप्चर ऑफ द वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट कंपनी।’ किताब फाइनैंशियल टाइम्स के पत्रकार पैट्रिक मैकगी ने लिखी है, जो सैन फ्रांसिस्को में रहते हैं और ऐपल पर खबरें करते हैं। किताब में दो दिलचस्प बाते हैं। पहली, 1996 में दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुकी ऐपल कैसे महज 15 सालों में दुनिया की सबसे कीमती कंपनी बन गई। दूसरी, कैसे ऐपल ने चीन को तीसरी दुनिया के कम कौशल वाले विनिर्माण केंद्र से दुनिया के सबसे बड़े और बेहतरीन विनिर्माण केंद्र में बदल दिया। ऐपल कंपनी जब बनी थी तो उत्पादन खुद ही करना चाहती थी। मगर लागत के बोझ और दूसरी कंपनियों के साथ होड़ की वजह से उसने ठेके पर काम कराना शुरू कर दिया।

पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे ऐपल पर्सनल कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों में आखिरी थी, जो ठेके पर विनिर्माण कराती थी। शुरू में उसने ठेका कोरिया की एलजी को दिया, जो यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका में फैली थी। किताब बताती है कि कैसे फॉक्सकॉन और टेरी गौ आए और कैसे ताइवान से शुरू होकर समूचा विनिर्माण चीन में ही होने लगा। लेखक बताते हैं कि चीन को विनिर्माण में अग्रणी बनाने और वहां कुशल तथा बेहतर आपूर्ति श्रृंखला बनाने में ऐपल ने कितनी अहम भूमिका निभाई।

आईफोन दुनिया में आज तक आए उत्पादों में शायद सबसे अनूठा और कामयाब है। 2007 में 50 लाख आईफोन बिके थे मगर 2015 में आंकड़ा 23 करोड़ तक पहुंच गया। अभी तक कुल 3 ट्रिलियन डॉलर के आईफोन बेचे जा चुके हैं। दुनिया के स्मार्टफोन बाजार में इसकी हिस्सेदारी केवल 20 फीसदी है मगर बाजार के कुल मुनाफे का 80 फीसदी इसी के पास आता है। अन्य उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के उलट इसके दाम केवल बढ़े हैं। पहला आईफोन 499 डॉलर का था और आज इसकी कीमत 1,000 डॉलर से अधिक है।

लेखक ने विभिन्न साक्षात्कारों में कहा है कि ऐपल अपने आपूर्तिकर्ताओं के जरिये चीन में करीब 30 लाख लोगों को रोजगार देता है। ऐपल ने वहां करीब 2.8 करोड़ कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया। इधर भारत में समूचा आईटी सेवा उद्योग केवल 60 लाख लोगों को रोजगार देता है।

2015 तक ऐपल चीन में सालाना 55 अरब डॉलर लगा रही थी और 2018 तक उसने वहां 18 अरब डॉलर मूल्य की विशेष मशीनरी भी लगाई। गुणवत्ता से मोह के कारण उसने विनिर्माण तकनीक और गुणवत्ता मानक के प्रशिक्षण पर भी भारी धनराशि खर्च की। किताब बताती है कि आपूर्तिकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के लिए ऐपल ने कैसे हजारों इंजीनियर भेजे और कुछ को तो वहीं तैनात कर दिया।

अब हमें महसूस हुआ कि चीन विनिर्माण में इतना आगे इसलिए है क्योंकि उसके आपूर्तिकर्ताओं को ऐपल से प्रशिक्षण मिला। ऐपल अपने आकार (उत्पादन के चरम पर चीन 250 अरब डॉलर से अधिक कीमत के 50 करोड़ आई-गैजेट बना रहा था), गुणवत्ता और फिनिश पर ध्यान तथा आपूर्ति श्रृंखला को सहारा देकर प्रशिक्षित करने की इच्छा के कारण अनूठी कंपनी थी। आपूर्ति भले ही ताइवान की कंपनी फॉक्सकॉन कर रही थी मगर उत्पाद और कल-पुर्जे चीन में ही तैयार हो रहे थे। अब चीन की आपूर्ति श्रृंखला दुनिया में सबसे किफायती और बेहतरीन है। किसी अन्य देश के पास इतने बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण आईफोन तैयार करने की क्षमता नहीं है।

मैकगी कहते हैं कि इस विनिर्माण कौशल ने ही ड्रोन तथा इलेक्ट्रिक वाहन जैसे क्षेत्रों में चीन का दबदबा कायम करा दिया। चीन के स्मार्टफोन उद्योग यानी हुआवे, शाओमी, ओपो और वीवो की विश्व बाजार में 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी है। इसकी जड़ें भी उसी आपूर्ति श्रृंखला में तलाश की जा सकती हैं। पुस्तक यह भी बताती है कि ऐपल के सामने कैसी चुनौतियां हैं। उसे विविधता लाने की जरूरत है क्योंकि उसके सामने भूराजनीतिक चुनौतियां हैं। लेकिन वह चीन को नाराज नहीं कर सकता है, जबकि निर्यात पर नियंत्रण और वीजा प्रतिबंध के जरिये चीन विविधता लाने ही नहीं दे रहा।

भारत के लिए यह चौंकाने वाली बात है कि कैसे एक विश्वस्तरीय बहुराष्ट्रीय संस्थान श्रेष्ठ विनिर्माण का पूरा माहौल तैयार कर देता है। अन्य वैश्विक दिग्गज भी आपूर्ति श्रृंखला पर ऐसा ही असर डाल सकते हैं। स्मार्टफोन निर्माण के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) की नीति अच्छी है। जैसे-जैसे ऐपल का पैमाना बढ़ेगा, लागत और कम होगी। हमें कंपनियों का भारत में स्वागत करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। किताब भी बताती है कि चीन में ऐपल को कैसे मदद मिली थी। उसे रियायती जमीन से किफायती श्रम तक सब दिया गया। हमें समझना चाहिए कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में दाखिल होने का शानदार मौका हमारे पास है। आर्थिक नजरिये से ऐपल के पास चीन से बाहर जाने की कोई वजह नहीं है। गुणवत्ता या लागत के मामले में उसके लिए चीन की जगह कोई नहीं ले सकता।

यह बदलाव भू-राजनीति की वजह से आ रहा है। नई आपूर्ति श्रृंखला तैयार करना आसान नहीं होगा। ऐपल ऐसा करेगी क्योंकि उसके पास कोई चारा ही नहीं है। भारत इसका स्वाभाविक ठिकाना है मगर हमें भी समझना पड़ेगा कि हमारी तकदीर कितनी अच्छी है और देश के लिए यह कितना अच्छा होगा। हमें यह भी समझना होगा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पहुंचे बगैर हम विश्वस्तरीय विनिर्माता नहीं बन सकते।

हमें विभिन्न क्षेत्रों की ऐसी अग्रणी कंपनियां तलाशनी होंगी, जो खुद बहुत कम उत्पादन करती हों, जैसे अपैरल और फुटवियर में नाइकी या स्पेशियलिटी केमिकल्स में सिंजेंटा। इनमें से कई कंपनियां खुद बहुत कम उत्पादन करती हैं और चीन से बहुत अधिक उत्पादन कराती हैं। उन पर आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने के दबाव के बीच भारत पीएलआई के जरिये खुद को विकल्प बनाकर पेश कर सकता है। ऐपल ने दिखा ही दिया है कि एक बड़ी कंपनी पूरी आपूर्ति श्रृंखला की सूरत बदल सकती है।

ऐपल उपकरणों की अंतिम चरण की असेंबलिंग का कुछ काम भारत में करने लगी है। उसके कलपुर्जे भी यहां बनने लगे तो बड़ी कामयाबी होगी। इसमें भी पीएलआई मददगार हो सकती है। भारत में उत्पादन ले जाने के हर प्रयास का चीन विरोध करेगा। इसलिए इस काम में कई साल लग सकते हैं और हमें अधीरता से बचना होगा।

मुनाफे पर नजर वाले कुछ भारतीय समूह ऐपल के लिए आपूर्ति श्रृंखला बनाने के इच्छुक होंगे। हमें चीन से सीखना चाहिए। ऐपल को आपूर्ति से ज्यादा पैसा बेशक न मिले मगर हमें वैश्विक आपूर्तिकर्ता बनने का कौशल और क्षमता मिल जाएंगे।

चीन ने ऐपल की सफलता का फायदा उठाकर उन्नत विनिर्माण तंत्र बना लिया। केवल एक कंपनी की बदौलत वह दुनिया में उच्चस्तरीय निर्माण का केंद्र बन गया। हमें भी उसी तरह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में विविधता की लहर का पूरा फायदा उठाना चाहिए ताकि हम अपनी विनिर्माण और आपूति श्रृंखला व्यवस्था कायम कर सकें। हमारे पास एक विशिष्ट अवसर है और हमें सरकार के हर स्तर पर हर नीतिगत कदम उठाना चाहिए ताकि यह संभव हो सके। हमें दूसरा मौका नहीं मिलेगा।

(लेखक अमांसा कैपिटल से जुड़े हैं)

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First Published - June 18, 2025 | 10:21 PM IST

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