देश की आर्थिक गतिविधियां कोविड के कारण लगे झटके से उबरने की प्रक्रिया में हैं और माना जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष के अंत तक 7.5 फीसदी की गिरावट दर्ज करेगी। अगले वर्ष जबरदस्त सुधार देखने को मिल सकता है क्योंकि आधार कम रहेगा लेकिन मध्यम अवधि में भारत का तेज वृद्धि की राह पर लौटना मुश्किल है। भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर कोविड संकट शुरू होने के पहले ही आरंभ हो गया था। सरकारी वित्त पर दबाव और बैंकिंग तंत्र की कमजोरी जैसी दिक्कतें और बढ़ी ही हैं। सतत रूप से उच्च वृद्धि दर हासिल करने में कठिनाई की एक और वजह है व्यापार को लेकर हमारा रुख। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत अब क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में शामिल होने का पूरी तरह अनिच्छुक हो चुका है। इस समूह के सदस्यों ने गत माह बिना भारत के समझौते पर हस्ताक्षर किए। अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने सरकार को सलाह दी थी कि वह इस समूह से बाहर न निकले।
आरसेप सबसे बड़ा कारोबारी समूह होने के साथ-साथ शायद दुनिया का सबसे बढिय़ा कारोबारी समूह भी है। एक अनुमान के मुताबिक इसके भागीदार देशों ने सन 2019 में वैश्विक उत्पादन में 30 फीसदी का योगदान किया जो 2030 तक बढ़कर 50 फीसदी पहुंच जाएगा। व्यापार की बात करें तो आरसेप के सदस्यों ने 2019 में 5 लाख करोड़ रुपये मूल्य की वस्तुओं का आयात किया जबकि उत्तरी अमेरिका के देशों ने 3 लाख करोड़ रुपये मूल्य का आयात किया। विश्व व्यापार में आरसेप देशों की हिस्सेदारी समय के साथ बढ़ रही है। इस समूह में शामिल न होने की हम क्या कीमत चुका रहे हैं, उसे इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। भारत की कारोबारी नीतियां लगातार संरक्षणवादी होती जा रही हैं। उदाहरण के लिए सन 2014 के बाद से 70 फीसदी आयात के लिए शुल्क बढ़ाया जा चुका है।
उच्च शुल्क दर और संरक्षणवादी नीतियां भारत को महंगी अर्थव्यवस्था में तब्दील कर देंगी। परिणामस्वरूप भारतीय कंपनियों के लिए वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करना कठिन होता जाएगा। व्यापार बढ़ाने के लिए वैश्विक मूल्य शृंखला के साथ एकीकृत होना अब आवश्यक हो चुका है। लेकिन आयात पर उच्च शुल्क दर और अन्य प्रतिबंधों के जरिये ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि वैश्विक मूल्य शृंखला में शामिल होने के लिए वस्तुओं का तेज आवागमन आवश्यक है। हाल के वर्षों में मूल्य शृंखला में भारत की हिस्सेदारी कम हुई है। यह समझना भी महत्त्वपूर्ण है कि निवेश ही व्यापार को गति देगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऐसे देशों को वरीयता देंगी जो व्यापार को लेकर खुलापन रखते हैं। ऐसा इसलिए ताकि मूल्य शृंखला का लाभ ले सकें। भारत में निवेश प्रभावित होगा और उसमें कमी आएगी। इसका असर घरेलू उपभोक्ताओं और कुछ निर्यातकों पर पड़ेगा। लब्बोलुआब यह है कि भारत खुद को अलग-थलग कर रहा है और यह दीर्घावधि की वृद्धि के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सन 1991 के सुधारों के बाद व्यापारिक गतिरोध कम करने से भारत को उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल करने में मदद मिली थी।
निश्चित तौर पर आरसेप के अधिकांश देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा है और उसे प्रतिस्पर्धा में सुधार करने की आवश्यकता है। परंतु शुल्क दरों में इजाफा करने से ऐसा नहीं होने वाला। आरसेप ने एक अवसर अवश्य मुहैया कराया था। अब कहा जा रहा है कि भारत अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौतों पर काम करेगा। परंतु ऐसे समझौते अभी नजर नहीं आ रहे हैं, लगता नहीं कि वे आरसेप से अधिक फायदेमंद होंगे। आरसेप से बाहर होने के बाद भारत अपनी शर्तों पर बातचीत करने की स्थिति में नहीं रह जाएगा। भारत खराब कारोबारी नीतियों का शिकार हो रहा है और उसे तेज आर्थिक वृद्धि का एक और अवसर गंवाने के पहले व्यापक समीक्षा करनी होगी।