कर्नाटक की राजधानी और देश के स्टार्टअप और टेक उद्यमिता का इंजन बेंगलूरु अपने बेहतरीन मौसम के लिए भी जाना जाता है। यह देश के बड़े शहरों में सबसे अच्छा है। यह अपने आप में बड़ी बात है लेकिन महत्त्वाकांक्षी, सुशिक्षित और उद्यमी लोगों के लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं है।
मौसम के अलावा यहां बहुत कुछ है: बेहतरीन शैक्षणिक संस्थान जो नए उद्यमों, रोजगारों, नए बन रहे आवास तथा बेहतर होते बुनियादी ढांचे के लिए लोग उपलब्ध कराते हैं।
बेंगलूरु की सबसे बड़ी उपलब्धि है खुशहाल युवा और समावेशी सामाजिक संस्कृति। यदि रोजगार, उद्यमिता और चकाचौंध के मामले में अतीत में मुंबई भारत का सपनों का शहर था तो अब वह जगह बेंगलूरु ने ले ली है। दो दशकों से यानी जब से मैंने अक्सर बेंगलूरु की यात्रा शुरू की, मैंने यही पाया कि देश के किसी भी अन्य हिस्से में अगर आप अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं तो आपको बेंगलूरु आकर जरूर अच्छा लगेगा।
वर्षों पहले एक बार जब मॉनसून देर से आने वाला था और उत्तर भारत गर्मियों में तप रहा था तब बेंगलूरु की यात्रा के दौरान रात को तूफान आया और मुझे उस सप्ताह के स्तंभ का विषय मिल गया: बेंगलूरु, द फील-गुड सिटी। मैंने लिखा था कि अगर अमेरिका की तरह हमने भी अपने शहरों और प्रांतों को नाम देना शुरू किया, मसलन न्यूयॉर्क, ‘द बिग ऐपल’, शिकागो, ‘द विंडी सिटी’, वर्जीनिया ‘फॉर लवर्स’ तो बेंगलूरु को ‘फील-गुड सिटी’ के अलावा भला क्या कहेंगे।
यही कारण है कि कर्नाटक तथा उसकी राजधानी में हो रहा विभाजनकारी घटनाक्रम सही नहीं प्रतीत हो रहा। भाषाई विभाजन की राजनीति और श्रम संगठनों की सक्रियता ने एक समय बंबई के जादू को लगभग नष्ट ही कर दिया था। बेंगलूरु में ऐसा नहीं होना चाहिए। देश की शीर्ष बायोटेक उद्यमी किरण मजूमदार शॉ की भी यही चिंता है और इसीलिए उन्होंने ट्वीट करके मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई से अपील की और कहा कि वह हस्तक्षेप करें। यह अपील तब की गई जब सामुदायिक विभाजन से जुड़े कई कदमों के बाद हिंदू मंदिरों और धार्मिक आयोजनों से मुस्लिम कारोबारियों को प्रतिबंधित करने की बात उठी। इसके बाद हलाल उत्पादों के बहिष्कार की मांग उठी। कर्नाटक के सामान्य मुस्लिमों के लिए यह आर्थिक भेदभाव की तरह था। जबकि व्यापक तौर पर इसे सामाजिक समरसता के लिए सीधे खतरे के रूप में देखा जा सकता है जिसके पीछे स्पष्ट रूप से राजनीतिक कारण हैं। राज्य में करीब एक वर्ष बाद विधानसभा चुनाव होने हैं।
कर्नाटक में भाजपा ने दलबदल करा कर कांग्रेस-जेडीएस गठजोड़ से सत्ता छीनी और कार्यकाल के बीच में अपने मुख्यमंत्री बदले। वहां पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं है और मुख्यमंत्री को भी अपेक्षाकृत कमजोर माना जा रहा है। कर्नाटक उन राज्यों की तरह नहीं है जहां पार्टी आसानी से विपक्षी दलों को धूल चटा सकती है, खासकर कांगे्रस को। यही कारण है कि पार्टी को ध्रुवीकरण की शरण में जाना पड़ रहा है। आखिर जो फॉर्मूला गुजरात और उत्तर प्रदेश में कारगर है वह कर्नाटक में भी कारगर होना चाहिए।
यह कारगर हो सकता है और राजनीति में सही तरीका वही होता है जो आपको चुनाव जितवाये। ऐसे में नैतिकता और सामाजिक प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया जाता। बीते एक दशक से भाजपा की रणनीति यही रही है, तीव्र हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करना और ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों को मिलने वाले मुस्लिम मतों के लाभ को अप्रासंगिक बना देना। कई राज्यों में यदि उसे 50 फीसदी हिंदू मत मिल जाते हैं तो भी वह चुनाव जीत जाती है, भले ही मुस्लिम समुदाय किसी को वोट दे।
भाजपा इस बात को लेकर भी सचेत है कि यह फॉर्मूला 2018 के पिछले विधानसभा चुनाव में पूरी तरह कारगर नहीं रहा था। उतार-चढ़ाव वाली राजनीति के लिए चर्चित कर्नाटक में उसका मुकाबला सत्ताधारी दल से था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 चुनावी रैलियों को संबोधित किया, फिर भी भाजपा सत्ता में नहीं आ सकी।
एक वर्ष बाद दलबदल करवा कर पार्टी दोबारा सत्ता में आई। वह एक कमजोर मुख्यमंत्री के साथ सत्ता में है जिसके पूर्ववर्ती येदियुरप्पा खामोश लेकिन असंतुष्ट हैं। उनके पास तगड़ा लिंगायत वोट बैंक है जिसके बिना भाजपा शून्य है। येदियुरप्पा की तरह बोम्मई भी लिंगायत हैं लेकिन उनके पास खास जनाधार नहीं है।
भाजपा हर चुनाव को जीवन मरण का प्रश्न बनाकर लड़ती है, भले ही वह नगर निकाय का चुनाव क्यों न हो। हम तेलंगाना के स्थानीय निकाय चुनाव में ऐसा देख चुके हैं। कर्नाटक दक्षिण में पार्टी का इकलौता दुर्ग है और अगर विभाजनकारी राजनीति 2023 में उसका बेड़ा पार लगाती है तो बुरा क्या है?
यह विभाजन सामाजिक तानेबाने को नुकसान पहुंचा रहा है और बेंगलूरु के अरबों डॉलर के नए विचार मस्तिष्क में लेकर चलने वाले युवाओं को असंतुलित कर सकता है। इस सिलसिले में भाजपा के उभरते सितारे और बेंगलूरु दक्षिण के सांसद तेजस्वी सूर्या की बात को ही याद करें तो उन्होंने कहा था कि उनका शहर देश के 40 फीसदी यूनिकॉर्न और उस दिशा में बढ़ रहे स्टार्टअप का शहर है। यूनिकॉर्न उन स्टार्टअप को कहते हैं जिनका मूल्यांकन 100 अरब डॉलर से अधिक हो। ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश के 95 में से 37 यूनिकॉर्न बेंगलूरु में हैं। मुंबई में 17, गुरुग्राम में 13, दिल्ली और नोएडा में 4-4 यानी इन जगहों पर कुल मिलाकर 38 यूनिकॉर्न हैं।
यदि आप बेंगलूरु आते हैं तो आपको आशावाद का असर और भावना दोनों महसूस होंगे। यहां की वाणिज्यिक इमारतों से लेकर आईटी पार्क और रेस्टोरेंट, बार, पब तथा हवाई अड्डे के प्रतीक्षालय तक आपको तमाम युवा दिखेंगे जो अपने लैपटॉप में नए उत्पाद डिजाइन करने, सौदे करने और नए सपनों की पटकथा लिखने में व्यस्त हैं। वे रील देखने में समय बरबाद करते नहीं दिखेंगे जैसी कि प्रधानमंत्री मोदी ने परीक्षा की तैयारी करने वाले बच्चों को सलाह दी।
क्या हम ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रहे हैं? हालिया घटनाओं पर नजर डालिए। हिजाब विवाद, उसके बाद मंदिर में व्यापारियों पर प्रतिबंध- कहीं भी अपना कारोबार करना लोगों का बुनियादी अधिकार है। पशुओं से जुड़े नए कानून बनाए गए, हलाल मांस का बहिष्कार आदि सभी एक ही तरह के कदम हैं। राज्य में हाल में कथित लव जिहाद की घटनाएं भी दिखी हैं। एक मुस्लिम युवक की इसलिए हत्या कर दी गई कि वह एक हिंदू युवती के साथ था। युवती के परिजन को गिरफ्तार भी किया गया।
कोई भी यह कह सकता है कि उद्यमिता और निवेश के फलने-फूलने का सामाजिक तानेबाने से क्या संबंध है? इसके लिए हम विभिन्न देशों पर नजर डाल सकते हैं। आज पाकिस्तान में कौन पैसा, उद्यम या अपनी रचनात्मकता लगाएगा? या म्यांमार में? राजपक्षे के नेतृत्व वाली सिंहली बहुल सरकार के आने के बाद श्रीलंका पर कितना बुरा असर हुआ? उपमहाद्वीप के उद्यमियों के लिए इस्लामिक शासन के बावजूद संयुक्त अरब अमीरात, खासकर दुबई इतना आकर्षक क्यों है?
आज की रचनात्मक, युवा उद्यमिता ही अरबों डॉलर के स्टार्टअप तैयार करती है और किसी देश की वृद्धि को बल देती है। खासकर भारत जैसे देश की वृद्धि को जहां प्राकृतिक संसाधनों की कमी है। सामाजिक एकता, समरसता, समावेशी संस्कृति आदि से ही सकारात्मक माहौल तैयार होता है। अगर कर्नाटक की राजनीति के चलते बेंगलूरु के इन सबसे वंचित होने के हालात बनते हैं तो यह यकीनन अच्छा नहीं है। अगर यह सब ऐसे मुख्यमंत्री के रहते हो रहा है जिसे अपना राजनीतिक कद और विरासत पूर्व मुख्यमंत्री पिता एस आर बोम्मई से मिले हैं तो और भी दुखद है। उनके पिता एमएन रॉय के शिष्य और धुर मानवतावादी थे। ऐसे लोग किसी धर्म में यकीन नहीं रखते और मनुष्यों को सभी देवताओं से ऊपर रखते हैं।