हाल ही में संपन्न हुए वित्त वर्ष 2021-22 में नरेंद्र मोदी सरकार का सकल कर राजस्व संग्रह 34 फीसदी बढ़कर 27 लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। इस तरह की वार्षिक वृद्धि बीते चार दशक में देखने को नहीं मिली थी। 2021-22 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार या कहें उसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) करीब 19 फीसदी बढ़ा। ऐसे में केंद्र सरकार के सकल कर राजस्व में हुए इजाफे ने सरकार के भीतर और बाहर जश्न का माहौल बना दिया।
लेकिन इस परिणाम का व्यापक संदर्भ में आकलन करना भी महत्त्वपूर्ण है ताकि कर संग्रह में सुधार की वास्तविक प्रकृति समझी जा सके। बीते आठ वर्षों में मोदी सरकार के कर संग्रह में हुई वृद्धि पर नजर डालते हैं। कर संग्रह 2014-15 के 12.45 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2021-22 में 27.07 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी इन आठ वर्षों में सालाना समेकित वार्षिक वृद्धि (सीएजीआर) 10 फीसदी रही।
परंतु यह दर मनमोहन सिंह सरकार के 2004-05 से 2013-14 तक के दस वर्ष में सकल कर राजस्व में हुई 14 फीसदी सीएजीआर से कम थी।
शायद मनमोहन सिंह सरकार की अवधि की तुलना मोदी के कार्यकाल से नहीं की जा सकती है। दरअसल सिंह के कार्यकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था को अमेरिकी वित्तीय संकट के विपरीत प्रभाव का सामना करना पड़ा था। उस वक्त अमेरिका ने नकदी कम की थी और कृषि संकट से भी जूझना पड़ा था। परंतु मोदी सरकार के आठ वर्ष के कार्यकाल में कहीं ज्यादा बड़े झटके लगे।2016 में नोटबंदी, 2017 में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की शुरुआत और फिर कोविड महामारी। इससे पता चल सकता है कि क्यों मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान कर संग्रह सिंह सरकार के 10 साल की तुलना में करीब 10 फीसदी गिरा। परंतु इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि मोदी सरकार के कार्यकाल में कर संग्रह की सालाना वृद्धि में गिरावट आई है।
बीते आठ वर्ष में कर संग्रह के प्रदर्शन को एक और तरीके से भी देखा जा सकता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में तीन वर्ष ऐसे रहे जब सकल कर राजस्व एक अंक में रहा और 2019-20 में यानी कोविड से पहले वाले वर्ष में तो यह गिरकर महज तीन फीसदी रह गया था। 2021-22 में 34 फीसदी की वार्षिक वृद्धि के पहले लगातार तीन वर्षों तक वृद्धि में गिरावट आई थी। गत वर्ष को छोड़ दिया जाए तो कर राजस्व वृद्धि मोदी सरकार के कार्यकाल के किसी भी वर्ष में 20 फीसदी का स्तर पार नहीं कर सकी।
इसके विपरीत सिंह सरकार ने अपने 10 वर्ष के कार्यकाल की मजबूत शुरुआत की थी और लगातार चार वर्षों तक उसका कर संग्रह 20 फीसदी से अधिक तेजी से बढ़ा। वैश्विक वित्तीय संकट के कारण उस वृद्धि में ठहराव आया और 2008-09 में कर संग्रह केवल दो फीसदी तथा 2009-10 में महज तीन फीसदी बढ़ा। इसके बाद बढ़ोतरी एक वर्ष के लिए सुधरी और सिंह सरकार के आखिरी तीन वर्षों में इसमें दोबारा गिरावट आ गई।
केंद्र सरकार के सकल कर संग्रह में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी कम होना हाल के वर्षों में चिंता का विषय रहा है। मनमोहन सिंह सरकार के शुरुआती तीन वर्षों में समस्या अधिक गंभीर थी। उस वक्त सकल कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी 44 फीसदी से 49 फीसदी थी। बाद के सात वर्षों में यह हिस्सेदारी 52 से 56 फीसदी के बीच रही जबकि 2009-10 में तो यह बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच गई थी।
मोदी सरकार के शुरुआती कुछ वर्षों में इसकी हालत सर्वाधिक बुरी रही। सकल कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी में निरंतर गिरावट आई और 2014-15 के 56 फीसदी से घटकर 2016-17 में यह 49 फीसदी रह गया। यह वही वर्ष था जब नोटबंदी हुई थी। इसके बाद कुछ सुधार हुआ लेकिन 2020-21 में कोविड के आगमन के बाद वह पुन: घटकर 46 फीसदी रह गई। 2021-22 में प्रत्यक्ष करों में अहम सुधार हुआ और वे सकल कर राजस्व का 52 फीसदी हो गये।
प्रत्यक्ष करों में उच्च हिस्सेदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार अपना प्रत्यक्ष कर आधार कितनी अच्छी तरह बढ़ाती है और क्या जीएसटी में सुधारों को तेज किया जा सकता है। प्रत्यक्ष कर में एक और ध्यान देने लायक रुझान है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। मनमोहन सिंह के समूचे कार्यकाल के दौरान और मोदी सरकार के शुरुआती दो वर्षों में यानी नोटबंदी के पहले तक प्रत्यक्ष करों में कॉर्पोरेशन कर की हिस्सेदारी 60 फीसदी से अधिक थी। लेकिन 2016-17 से प्रत्यक्ष करों में इसकी हिस्सेदारी घटते-घटते 2020-21 में 48 फीसदी पर आ गई। गत वर्ष इस रुख में बदलाव आया और कॉर्पोरेशन कर कुल प्रत्यक्ष करों में लगभग आधे का हिस्सेदार रहा।
सरकार के कर संग्रह संबंधी प्रदर्शन के आकलन का एक जांचा परखा तरीका यह जांचना है कि दीर्घावधि में नॉमिनल जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी की दिशा क्या रही है। इससे पता चलता है कि सरकार के कर संग्रह प्रयास आर्थिक वृद्धि के साथ तालमेल में रहे या नहीं और ये प्रभावी और किफायती रहे या नहीं। उस हिसाब से देखा जाए तो 2020-21 में नॉमिनल जीडीपी में सकल कर संग्रह की हिस्सेदारी 11.45 फीसदी थी जबकि पिछले वर्ष यह 10.10 फीसदी रही थी। यह यकीनन सुधार था, खासकर इसलिए कि यह रुझान में तब्दीली दर्शाता है। लगातार तीन वर्षों के आधार पर देखें तो 2017-18 के बाद से नॉमिनल जीडीपी में सकल कर संग्रह की हिस्सेदारी कम होती गई जबकि कर-जीडीपी अनुपात 11.23 फीसदी पहुंच गई।
जीडीपी में सकल कर संग्रह की हिस्सेदारी 2021-22 में 11.45 फीसदी तक बढ़ाना एक उपलब्धि है। हालांकि यह अब भी मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 2007-08 में हासिल 12 फीसदी हिस्सेदारी की तुलना में कम है। मोदी सरकार के सामने अब यह चुनौती है कि वह इस हिस्सेदारी को बढ़ा सके तो कम से कम बरकरार रखना सुनिश्चित कर सके। 2007-08 में 12 फीसदी का स्तर हासिल करने के बाद जीडीपी में करों की हिस्सेदारी अगले ही वर्ष घटकर 11 फीसदी रह गई थी। चुनौती यह होगी कि 2022-23 में इस प्रकार की गिरावट को टाला जा सके।