उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कर्जदारों के संपत्ति अधिकारों को पुख्ता किया है। उसमें कहा गया है कि बैंक और वित्तीय संस्थान जिस वाहन के लिए कर्ज देते हैं, उन्हें उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बगैर महज वसूली एजेंटों के जरिये जब्त नहीं कर सकते। सावित्री देवी बनाम आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड एवं अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित ने कहा कि उचित सूचना और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना वाहन को जबरदस्ती जब्त करना संविधान के अनुच्छेद 300ए का उल्लंघन होगा।
करंजावाला ऐंड कंपनी की पार्टनर मनमीत कौर समझाती हैं, ‘अदालत ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी करार या समझौते के प्रावधान वैधानिक आदेशों या किसी व्यक्ति के संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करने वाले संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर हावी नहीं हो सकते।’
कर्जदार को डिफॉल्टर तब माना जाता है जब वह निर्धारित समय के भीतर कर्ज की किस्तें नहीं चुका पाता। कौर कहती हैं, ‘वाहन ऋण में डिफॉल्ट आम तौर पर मासिक किस्त यानी ईएमआई नहीं चुकाने पर होता है। इससे ऋण खाता अनियमित हो जाता है, उस पर बकाया हो जाता है और वसूली के लिए कार्यवाही की जा सकती है।’
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अनुच्छेद 300ए के तहत प्रावधान है कि कानूनी प्राधिकरण के अलावा कोई भी किसी व्यक्ति को संपत्ति के उसके अधिकार से वंचित नहीं कर सकता। वाहन के साथ बैंक का वित्तीय हित जुड़ा हो सकता है मगर जब तक कानून के तहत जब्ती नहीं हो तब तक कर्जदार को वाहन अपने कब्जे में रखने और इस्तेमाल करने का हक है। बीएमआर लीगल के पार्टनर शैंकी अग्रवाल कहते हैं, ‘यह प्रावधान तब जरूरी हो जाता है, जब कर्जदार की रोजी-रोटी वाहन से ही चलती हो।’
वाहन जब्त करना हो तो पहले कर्जदार को किस्त अदायगी में चूक होने, देय राशि और नहीं चुकाने पर नतीजों के बारे में नोटिस भेजा जाना चाहिए। अग्रवाल कहते हैं कानून के तहत नोटिसों की कोई संख्या तय नहीं की गई है मगर कम से कम तीन नोटिस देने जरूरी हैं – डिफॉल्ट या अदायगी का नोटिस, जब्ती का नोटिस और नीलामी से पहले नोटिस। नोटिस में कर्जदार को बकाया चुकाने, इस बारे में अपना पक्ष रखने और कानूनी रास्ता अपनाने का मौका दिया जाना चाहिए।
यहां मसला यह नहीं होता कि वाहन को कहां उठाया गया बल्कि मुद्दा यह है कि किस तरह उठाया गया। कर्ज देने वाली संस्था कर्जदार को सड़क पर रोककर वाहन नहीं ले सकती, कानूनी मंजूरी के बगैर उसके घर या दफ्तर में नहीं घुस सकती।
अग्रवाल समझाते हैं, ‘वाहन लेना है तो शांतिपूर्ण तरीके से और सही दस्तावेज और नोटिस के साथ लिया जाना चाहिए। वसूली एजेंटों के पास वैध पहचान और वाहन उठाने का लिखित अधिकार होना चाहिए। कर्जदार को यह भी बताया जाना चाहिए कि वाहन कहां रखा जा रहा है और उसे छुड़ाया कैसे जाएगा।’
वसूली एजेंट बकाया रकम के बारे में कर्जदार से बात करने, निपटारे की बातचीत करने और शांतिपूर्ण तरीके से वाहन उठाने में बैंक या संस्था की मदद कर सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के मुताबिक वसूली एजेंटों को अपनी पहचान बतानी होगी, वैध अधिकार पत्र रखना होगा और कर्जदार को पूरा सम्मान देना होगा। उन्हें डराने-धमकाने, उत्पीड़न करने, अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने, सार्वजनिक अपमान करने या उनके साथ जोर-जबरदस्ती करने की सख्त मनाही है।
किंग स्टब ऐंड कासिवा एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज के पार्टनर सिद्धार्थ कर्नानी ने कहा, ‘वसूली एजेंटो की हरकतों पर बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को ही जबाव देना पड़ता है और उनकी किसी भी गलत हरकत की जिम्मेदारी लेने से वे बच नहीं सकते।’
वाहन सौंपने से पहले कर्जदार को ऋणदाता से ऑथराइजेशन का दस्तावेज, बकाया रकम का ब्योरा और जब्ती के नोटिस की प्रति जरूर लेनी चाहिए। कर्नानी का सुझाव है, ‘अगर खुद वाहन सौंप रहे हैं तो कब्जे की लिखित पावती (एक्नॉलिजमेंट) और वाहन की हालत तथा उसमें मौजूद सामान की फेहरिस्त जरूर ले लेनी चाहिए।’
अगर कोई वाहन जबरदस्ती उठाया जा रहा है तो कर्जदार को उस घटना के फोटो, वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, गवाहों की जानकारी, कॉल रिकॉर्डिंग, मेसेज, ईमेल जैसे सभी सबूत संभालकर रखने चाहिए। साथ ही उसे लोन डॉक्यूमेंट, अदायगी के रिकॉर्ड और कर्ज देने वाली संस्था तथा वसूली एजेंट के पास से आया किसी भी तरह का संदेश, चिट्ठी, ईमेल आदि भी रखने चाहिए। कर्णानी समझाते हैं, ‘इस रिकॉर्ड से यह तय करना आसान हो जाएगा कि कर्ज देने वाली संस्था ने कानूनी प्रक्रिया का ठीक से पालन किया था या नहीं।’