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वसीयत या ट्रस्ट: संपत्ति की सुरक्षा के लिए क्या है बेहतर विकल्प? जानें कानूनी विशेषज्ञों की राय

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एक्सपर्ट के मुताबिक, संपत्ति बंटवारे के लिए सिर्फ वसीयत ही नहीं, अब ट्रस्ट एक सुरक्षित विकल्प है। यह विवादों को टालने, कंट्रोल रखने और कानूनी सुरक्षा देने में मददगार है

Last Updated- March 21, 2026 | 7:39 PM IST
Will vs Trust
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

सिर्फ वसीयत बनाना काफी है या संपत्ति को संभालने के लिए कुछ और बेहतर तरीका भी है? बदलते दौर में जहां संपत्ति संभालना मुश्किल हो रहा है और परिवार बड़े व विविध हो गए हैं, वहां ट्रस्ट एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रहा है। यह न सिर्फ संपत्ति के बंटवारे को व्यवस्थित करता है, बल्कि उसे सुरक्षित और नियंत्रित भी रखता है। खासकर हाई-नेट-वर्थ परिवारों के लिए ट्रस्ट अब एक रणनीतिक फैसला बनता जा रहा है।

वसीयत और ट्रस्ट में क्या अंतर है?

वसीयत एक कानूनी दस्तावेज है, जो मौत के बाद असर में आता है और संपत्ति को वारिसों के नाम ट्रांसफर कर देता है। वहीं ट्रस्ट में ट्रस्टी संपत्ति को मैनेज करते हैं और लाभार्थियों को फायदा पहुंचाते हैं। यह अक्सर लंबे समय तक चलता है और कुछ खास शर्तों के साथ।

ट्रस्ट कब ज्यादा फायदेमंद होता है?

ट्रस्ट तब बेहतर विकल्प बनता है, जब परिवार को प्राइवेसी, कंट्रोल और संपत्ति की लंबी सुरक्षा चाहिए। खासकर तब जब वारिस छोटे हों, अनुभवहीन हों या कोई बिजनेस चल रहा हो।

डी.एम. हरिश एंड कंपनी की एडवोकेट खुशी परमार के मुताबिक, ट्रस्ट ऐसे परिवारों के लिए उपयोगी है जहां युवा वारिसों या बिजनेस की निरंतरता की बात हो।

Also Read: संपत्ति और परिवार का भविष्य सुरक्षित करना है? जानें भारत में ट्रस्ट बनाने की पूरी प्रक्रिया

कई स्थितियों में ट्रस्ट वसीयत से आगे निकल जाता है:

  • जटिल संपत्तियां जैसे कई प्रॉपर्टी, बिजनेस या विदेशी होल्डिंग्स
  • बड़े परिवार जहां झगड़े से बचना हो और संपत्ति बंटवारे से टुकड़े न हों
  • नियंत्रित विरासत, यानी एकमुश्त पैसा देने की बजाय किश्तों में
  • स्पेशल नीड्स वाले लोगों के लिए प्लानिंग, ताकि सरकारी लाभ प्रभावित न हों
  • प्राइवेसी की जरूरत, क्योंकि ट्रस्ट प्रोबेट प्रक्रिया से बचाता है जो पब्लिक होती है

प्रोबेट से बचाव और सुरक्षा

अकॉर्ड ज्यूरिस के मैनेजिंग पार्टनर अलाय रजवी बताते हैं कि ट्रस्ट प्रोबेट से बचाता है, जो महीनों-कई साल लग सकता है और काफी खर्चा भी आता है।

ट्रस्ट अच्छे से बनाया जाए तो मालिकाना हक और कंट्रोल अलग-अलग हो जाता है। इससे संपत्ति को क्रेडिटर्स, मुकदमों या वारिसों के गलत इस्तेमाल से बचाया जा सकता है। भारतीय कानून के तहत ट्रस्ट की संपत्ति सेटलर की निजी संपत्ति से अलग मानी जाती है, जो सुरक्षा देती है।

लेकिन इसकी सीमाएं भी हैं। रिवोकेबल ट्रस्ट में सुरक्षा कमजोर होती है क्योंकि बनाने वाला कंट्रोल रखता है। इर्रिवोकेबल ट्रस्ट ज्यादा मजबूत होते हैं, क्योंकि संपत्ति सेटलर की कानूनी मालिकाना हक से बाहर हो जाती है। फ्रॉडुलेंट ट्रांसफर को कोर्ट रद्द कर सकता है। ट्रस्ट क्रेडिटर्स को धोखा देने के लिए नहीं बनाया जा सकता, ऐसे फर्जी इंतजाम कोर्ट खारिज कर देते हैं। यह बात सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट तुषार कुमार ने कही है।

खर्चे की बात

वसीयत बनाने में शुरुआती खर्च कम होता है, कभी-कभी सिर्फ कुछ हजार रुपये। लेकिन बाद में प्रोबेट के कारण देरी और खर्चा हो सकता है। ट्रस्ट बनाने में शुरुआत में ज्यादा खर्च लगता है जिसमें ड्राफ्टिंग, रजिस्ट्रेशन, स्टांप ड्यूटी आदि शामिल है। साथ ही चलाने का एडमिनिस्ट्रेटिव खर्च भी लगता है।

लॉटाराजू की को-फाउंडर श्वेता टुंगारे ट्रस्ट को हाई-नेट-वर्थ लोगों के लिए स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टमेंट मानती हैं, खासकर जहां मुकदमेबाजी से बचना और सुचारू उत्तराधिकार जरूरी हो।

जबकि लेगम सोलिस के फाउंडर शशांक अग्रवाल कहते हैं कि वसीयत सस्ती है, लेकिन खराब तरीके से लिखी गई वसीयत अक्सर झगड़ों और कानूनी खर्चों में बदल जाती है।

आखिर चुनें क्या?

अगर आपकी संपत्ति कम है और आसानी से बांटी जा सकती है, तो वसीयत काफी है। लेकिन अगर कंट्रोल, सुरक्षा और निरंतरता चाहिए, खासकर बड़ी या जटिल संपत्ति के मामले में, तो ट्रस्ट बेहतर विकल्प है।

संक्षेप में, सरल उत्तराधिकार के लिए वसीयत ठीक है। लेकिन जब संपत्ति को सिर्फ बांटने नहीं, बल्कि मैनेज करने की जरूरत हो, तब ट्रस्ट काम आता है।

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First Published - March 21, 2026 | 7:39 PM IST

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