टैक्स बचत के नाम पर अक्सर लोग Section 80C जैसे विकल्पों पर नजर जमाते हैं, लेकिन असल में कई छिपी हुई लागतें आपके रिटर्न को चुपके से काटती रहती हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश सुराना कहते हैं कि ये खर्चे शुरुआत में दिखते नहीं हैं, लेकिन लंबे समय में टैक्स बचत की पूरी स्ट्रैटजी को कमजोर कर देते हैं।
सबसे पहले बात करते हैं सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) की। जब आप इक्विटी शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड खरीदते-बेचते हैं, तो हर ट्रेड पर STT लगता है। इसे किसी भी तरह से डिडक्शन में नहीं जोड़ा जा सकता। छोटे-छोटे ट्रेड्स में ये रकम मामूली लगती है, लेकिन अगर आप बार-बार खरीद-बिक्री करते हैं तो ये लागत जमा होकर रिटर्न को काफी घटा देती है।
इसके अलावा स्टैंप ड्यूटी और ट्रांजेक्शन चार्जेस भी हैं। म्यूचुअल फंड खरीदते वक्त या स्टॉक ट्रेड करते समय ये चार्ज लगते हैं। शुरुआत में ये छोटे लगते हैं, लेकिन बार-बार निवेश करने पर ये आपकी कुल लागत बढ़ाते हैं और नेट गेन कम कर देते हैं।
एग्जिट लोड भी एक बड़ी समस्या है। ELSS समेत कई म्यूचुअल फंड्स में अगर आप समय से पहले यूनिट्स रिडीम करते हैं तो 1 प्रतिशत तक का एग्जिट लोड कट जाता है। ये नियम जल्दबाजी में निकलने से रोकता तो है, लेकिन अगर आपको पैसे की जरूरत पड़ जाए तो रिटर्न घट जाता है।
सबसे खतरनाक है एक्सपेंस रेशियो। ये फंड हाउस हर साल चार्ज करता है और सीधे NAV से कट जाता है। 1-2 प्रतिशत का फर्क भी कंपाउंडिंग के जरिए लंबे समय में बहुत बड़ा अंतर पैदा कर देता है। सस्ता फंड चुनने में ये अंतर समझना जरूरी है।
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ये लागतें सिर्फ शेयर या म्यूचुअल फंड तक सीमित नहीं हैं। होम लोन में प्री-पेमेंट या फोरक्लोजर चार्ज भी टैक्स बेनिफिट को बेअसर कर सकता है। अगर आप लोन जल्दी चुकाते हैं तो ब्याज पर मिलने वाली डिडक्शन कम हो जाती है और साथ में चार्ज भी देना पड़ता है।
डिमैट अकाउंट मेंटेनेंस चार्ज (AMC) और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के सालाना फीस भी धीरे-धीरे पोर्टफोलियो को खा जाते हैं। ये हर साल कटते रहते हैं और रिटर्न पर असर डालते हैं।
अगर आप लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत विदेश में निवेश कर रहे हैं तो फॉरेक्स कन्वर्जन और रेमिटेंस चार्ज भी जुड़ जाते हैं। करेंसी बदलने का स्प्रेड और बैंक फीस रिटर्न को और कम कर देते हैं।
सुरेश सुराना के मुताबिक, टैक्स बचत वाले निवेश को सिर्फ डिडक्शन से नहीं आंकना चाहिए। असली मायने में वो पैसा है जो सभी खर्चे और टैक्स कटने के बाद आपके पास बचता है। बार-बार खरीद-बिक्री करना, बिना सोचे स्विच करना या जल्दी निकाल लेना इन सब लागतों को बढ़ा देता है।
सुराना के मुताबिक, इसलिए बेहतर है कि लंबे समय तक होल्ड करें, फंड चुनते वक्त एक्सपेंस रेशियो अच्छे से चेक करें, अनावश्यक स्विचिंग से बचें और हर प्रोडक्ट की पूरी फीस स्ट्रक्चर समझ लें। कुल मिलाकर, टैक्स प्लानिंग सिर्फ सही स्कीम चुनने तक नहीं है, बल्कि उसकी असली लागत समझने तक है। इससे लंबे समय में आपकी कमाई ज्यादा मजबूत हो सकती है।