बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शुक्रवार को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को नकद बाजार में किए गए लेनदेन की शुद्ध राशि उसी दिन दिए जाने का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद तरलता का दबाव घटाना और फंडों की लागत कम करना है, खास तौर से सूचकांक पुनर्संतुलन के दिनों जैसे ज्यादा कारोबार वाले सत्र के दौरान।
मौजूदा व्यवस्था के तहत एफपीआई को सभी खरीद-बिक्री का निपटान सकल आधार पर करना होता है, भले ही खरीद और बिक्री मूल्य एक दूसरे के बराबार हों। इससे अक्सर फंडिंग की लागत बढ़ जाती है और परिचालन में परेशानी होती है। एफपीआई ने पिछले साल नियामक से इस तरह की छूट की मांग की थी। यह प्रस्ताव अनुपालन की जरूरतों को आसान बनाने और एफपीआई की सदस्यता प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए सेबी के व्यापक उपायों का हिस्सा है और यह पिछले साल भारतीय शेयरों से रिकॉर्ड निकासी के बीच आया है।
हालांकि कस्टोडियन क्लियरिंग कॉरपोरेशनों के साथ उनकी निपटान देनदारी को पूरा करते हैं, लेकिन एफपीआई को खरीद सौदों के लिए अलग से धन जुटाने और बिक्री सौदों के लिए प्रतिभूतियां देने की जरूरत होती है। सेबी ने पाया कि इस कारण अक्सर एफपीआई का कम से कम एक दिन के लिए निवेश कम रह जाता है और विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव और अल्पकालिक क्रेडिट पर निर्भरता के कारण अतिरिक्त लागत आती हैं।
सेबी ने कहा, इस संदर्भ में कोष की नेटिंग का अर्थ है किसी विशेष दिन नकदी बाजार में बिक्री से प्राप्त रकम का उपयोग उसी दिन एफपीआई द्वारा नकद बाजार में की गई खरीद की फंडिंग के लिए करना, इस तरह एफपीआई को केवल शुद्ध रकम की देनदारी पूरी करनी होगी।
हालांकि, इस प्रस्ताव में नेटिंग को केवल सीधे लेन-देन तक सीमित रखा गया है। इसमें एक प्रतिभूति की खरीद और दूसरी प्रतिभूति की बिक्री को समायोजित करके शुद्ध रकम की देनदारी निकाली जाती है। जहां कोई विदेशी निवेशक (एफपीआई) एक ही निपटान चक्र के भीतर किसी एक प्रतिभूति की खरीद और बिक्री करता है तो वहां नेटिंग की अनुमति नहीं होगी। ऐसे लेन-देन का निपटान सकल आधार पर ही होता रहेगा। सेबी ने कहा कि यह एक सुरक्षा उपाय है जो बड़े निवेशकों द्वारा बाजार में हेरफेर या अत्यधिक सौदे करने के जोखिमों को कम करने में मददगार होगा। भारत में नकद बाजार में टी+1 निपटान चक्र का पालन किया जाता है।
नियामक ने संभावित परिचालन जोखिमों के संबंध में कस्टोडियनों, क्लियरिंग कॉरपोरेशनों और स्टॉक एक्सचेंजों की चिंता को माना। इन चिंताओं में बिक्री सौदे की पुष्टि न होने पर कारोबार की अस्वीकृति की अधिक संभावना, एफपीआई से संरक्षकों की ओर स्थानांतरित होने वाले निपटान जोखिम में वृद्धि और व्यस्त कारोबारी अवधि के दौरान सिस्टम पर दबाव शामिल हैं।
सेबी ने कहा कि मौजूदा सुरक्षा उपायों के जरिए इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया गया है। इन उपायों में क्लियरिंग कॉरपोरेशनों के डिफॉल्ट वॉटरफॉल मैकेनिज्म और कोर सेटलमेंट गारंटी फंड शामिल हैं। नियामक ने यह भी बताया कि कस्टोडियन पहले से ही क्लियरिंग कॉरपोरेशनों के साथ अपने दायित्वों का निपटान शुद्ध आधार पर करते हैं। इसका मतलब है कि प्रस्तावित बदलाव से क्लियरिंग कॉरपोरेशनों के जोखिम में कोई खास वृद्धि नहीं होगी। लेकिन कस्टोडियनों को शुद्ध दायित्वों के आधार पर सत्यापन को सक्षम बनाने के लिए अपने सिस्टम को अपग्रेड करने की जरूरत होगी।
अहम बात यह है कि सेबी ने स्पष्ट किया कि एफपीआई और कस्टोडियन के बीच प्रतिभूतियों का निपटान सकल आधार पर जारी रहेगा। परिणामस्वरूप, प्रतिभूति लेनदेन कर और स्टाम्प शुल्क में कोई बदलाव नहीं होगा और डिलिवरी आधारित लेनदेन पर ये लागू होते रहेंगे।
इस प्रस्ताव के क्रियान्वयन के लिए सेबी और भारतीय रिज़र्व बैंक दोनों की तरफ से संशोधन की आवश्यकता होगी। हाल के महीनों में, सेबी ने एफपीआई को शामिल करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कई पहल शुरू की हैं। इनमें डिजिटल हस्ताक्षरों का उपयोग, स्वागत-एफआई (एक जगह सुविधा) और केवल भारत सरकार के बॉन्डों में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए पंजीकरण के सरल नियम शामिल हैं।