विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) लाभांश पर कर संबंधी मामले पर पुनर्विचार करने के लिए सरकार तक पहुंच गए हैं।
पिछले साल के केंद्रीय बजट ने कर की मात्रा को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी थी, जो अनिवासी भारतीयों को दिए गए लाभांश से संबंधित था। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि धारा 195 के तहत सटीक कर की दर निर्दिष्ट नहीं की गई थी, जिसमें स्रोत पर अप्रत्यक्ष कर (टीडीएस) या अनिवासियों के लिए कर पर रोक शामिल है।
वित्त अधिनियम 2020 ने स्पष्ट किया था कि धारा 195 के तहत अनिवासियों को भुगतान किए गए लाभांश के लिए 20 प्रतिशत से अधिक अधिभार और उपकर की एक कर दर लागू की जाएगी। इसके अलावा, भारत ने जिन देशों के साथ दोहरा कराधान समझौता (डीटीएए) किया है, वहां के निवासियों के लिए भी कम दरें लागू की जा सकती हैं।
लेकिन जब एफपीआई को अनिवासियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, तो इन पर कर की दरों को आयकर अधिनियम की एक अलग धारा 196 डी के तहत प्रदान किया जाता है। यह खंड भुगतान किए गए लाभांश पर 20 प्रतिशत (अधिभार एवं उपकर अतिरिक्त) की दर निर्दिष्ट करता है। हालांकि, मौजूदा कर संधि के कारण अगर एफपीआई की कर देयता कम हो, तो भी यह कम दर उपलब्ध नहीं कराता।
बाजार पर्यवेक्षकों के अनुसार, सरकार इस वर्ष के बजट में इस विसंगति को ठीक करने पर विचार कर सकती है।
वर्तमान में, कंपनियां एफपीआई को दिए गए लाभांश पर 20 प्रतिशत से अधिक अधिभार एवं उपकर की दर से कर लगाती हैं, भले ही वे उस क्षेत्राधिकार से निवेश करें जिसके साथ भारत ने डीटीएए समझौता किया हुआ है।
नंगिया एंडरसन में पार्टनर सुनील गिदवानी कहते हैं, ‘वर्तमान कानून एक कंपनी को उस दर पर कर कटौती करने की अनुमति नहीं देते, जिस पर वह अंतत: एफपीआई के लिए कर योग्य है। संधि की अलग-अलग दरें हैं, जो आईटी कानून की धारा 196-डी के तहत लगाए जाने के लिए आवश्यक 20 प्रतिशत से कम हो सकती हैं।’