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टायर फर्मों के शेयरों पर महंगे कच्चे तेल का असर संभव

उद्योग का राजस्व पिछले दो साल में 20 फीसदी बढ़ा है और इस वृद्धि में 10 फीसदी का योगदान बढ़ते वॉल्यूम का रहा है

Last Updated- September 24, 2023 | 9:56 PM IST
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टायर उत्पादक कंपनियों के शेयरों ने पिछले छह महीने से औसतन 45 फीसदी रिटर्न दिया है। पिछले डेढ़ महीने में अपोलो टायर्स में हालांकि थोड़ी गिरावट आई है, ऐसे में उसका रिटर्न 16 फीसदी तक सीमित रह गया है। लेकिन एमआरएफ, सिएट टायर्स और जेके टायर ऐंड इंडस्ट्रीज ने इस अवधि में 30 फीसदी से ज्यादा रिटर्न दिया है।

उत्पादन से जुड़े अवरोध और यूरोप में सुस्त मांग (जहां बिक्री स्थिर रहने की आशंका है) और उच्च मूल्यांकन का अपोलो टायर्स के कमजोर प्रदर्शन में अहम योगदान रहा है। टायर क्षेत्र के लाभ की वजह वृद्धि के मजबूत ट्रेंड को बताई जा सकती है, जिसे रीप्लेसमेंट मार्केट से सहारा मिला है और बिक्री में इसकी हिस्सेदारी दो तिहाई से ज्यादा रही है।

आईआईएफएल रिसर्च के मुताबिक, उद्योग का राजस्व पिछले दो साल में 20 फीसदी बढ़ा है। इस वृद्धि में 10 फीसदी का योगदान बढ़ते वॉल्यूम का रहा है, बाकी योगदान कीमत में हुई खासी बढ़ोतरी का है। क्रिसिल रेटिंग्स का अनुमान है कि भारतीय टायर निर्माताओं के उत्पादन वॉल्यूम की वृद्धि सालाना आधार पर 6 से 8 फीसदी पर पहुंचेगी और 2023-24 में यह 27 लाख टन की नई ऊंचाई पर होगी। यह बढ़ोतरी प्राथमिक तौर पर रीप्लेसमेंट बिक्री में हो रहे इजाफे और वाणिज्यिक वाहनों व यात्री वाहनों की सतत मांग से होने की संभावना है।

उत्पादन वॉल्यूम में वृद्धि 2021-22 और 2022-23 के क्रमश: 14 फीसदी व 11 फीसदी से धीमी रहेगी, लेकिन यह दशक के औसत 4 फीसदी से ज्यादा होगी। रेटिंग फर्म इसकी वजह पर्सनल मोबिलिटी को दी जा रही तरजीह और महामारी के बाद वाणिज्यिक वाहनों के वॉल्यूम में हो रहे सुधार को बताती है।

क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक पूनम उपाध्याय ने कहा, हमारा अनुमान है कि मौजूदा वित्त वर्ष में रीप्लेसमेंट मांग में 7 से 9 फीसदी की वृद्धि होगी, मुख्य रूप से वाणिज्यिक वाहन सेगमेंट से। इसे बुनियादी ढांचे में हो रहे निवेश और बसों के बेड़े के बढ़ते इस्तेमाल से सहारा मिलेगा क्योंकि महामारी के बाद ज्यादा लोग अपने कार्यस्थल पर लौट रहे हैं। यात्री वाहनों व दोपहिया से रीप्लेसमेंट मांग भी जोर पकड़ेगी।

इस तेजी की प्राथमिक वजह मार्जिन में सुधार है। कच्चे माल की कम लागत से होने वाले फायदे के कारण सकल मार्जिन अप्रैल-जून तिमाही में 360 से 940 आधार अंक तक बढ़ा है। यह मार्जिन कई तिमाही के उच्चस्तर पर पहुंचा है। इसे पहले जनवरी मार्च तिमाही में यह 750 से 800 आधार अंक बढ़ा था। आईआईएफएल रिसर्च से यह जानकारी मिली। प्रति टन परिचालन मार्जिन भी कई साल के उच्चस्तर पर पहुंच चुका है।

हालांकि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ रही है और प्राकृतिक रबर भी महंगा हो रहा है, ऐसे में मार्जिन पर दबाव पड़ने की आशंका है।

इस महीने एक रिपोर्ट में कोटक इंस्टिट्यूशनल इक्विटीज के ऋषि वोरा और प्रवीण पोरेड्डी कहा था, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक रबर और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें आगामी तिमाहियों में टायर कंपनियों के लाभ पर असर डालेगी। हमारा विश्लेषण बताता है कि टायर कंपनियों (सिएट, एमआरएफ और अपोलो) का सकल मार्जिन वित्त वर्ष 24 की पहली तिमाही के मुकाबले आगामी तिमाहियों में 300 से 400 आधार अंक घट सकता है, अगर जिंस की कीमतें मौजूदा स्तर पर टिकी रहती है।

कच्चे तेल का डेरिवेटिव कच्चे माल की लागत में आधे का योगदान करता है और बाकी आधी हिस्सेदारी प्राकृतिक संसाधनों की होती है।

ब्रोकरेज के मुताबिक, अगर कंपनियां कीमतों में इजाफा नहीं करती है तो मौजूदा हाजिर कीमत पर उनकी 2024-25 की प्रति शेयर आय के अनुमान पर 10 से 30 फीसदी की कमी का जोखिम है।

टायर कंपनियां कई तरह के अवरोध का सामना कर रही है और मूल्यांकन उनकी लंबी अवधि के औसत से ऊपर है, यह मानते हुए जोखिम-प्रतिफल अनुपात प्रतिकूल नजर आ रहा है। इन शेयरों पर विचार से पहले निवेशकों को मांग व मार्जिन के मामले में स्पष्ट ट्रेंड के प्रतीक्षा की सलाह दी जाती है।

First Published - September 24, 2023 | 9:56 PM IST

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